Wednesday, July 7, 2010
एक और शिकार ...
हाँ मगर ...
Monday, July 5, 2010
भाग्य विधता...
Sunday, July 4, 2010
जी हुजुर...
सूरत अच्छी थी, हमको पसंद आई
तय फिर हुआ, दो दिन बाद
मंदिर में लड़की दी जायगी दिखाई
पहुंचे जब हम वहां, न दिया कोई दिखाई
थोड़ी देर गए, परिवार संग देवी जी आई
देख कर लगा अटपटा,
घरेलू कपड़ो में एक दम सादी सी आई
औपचारिकताओं के बाद,
अकेले में बात करने की अनुमति पाई
सुनकर उनकी पहली ही बात,
जोर की हमको हंसी आई
बातो बातो में हुआ हम पर ज़ाहिर
देवी जी है हर काम में माहिर
कुछ ना-नुकर के बाद हाँ हुई
आननफानन में फिर कुछ रस्मे हुई
बड़ो ने मिलकर फिर तारीखे तय की
कहावत "दिन धरा और आया" रंग लाई
और दौड़ी दौड़ी शादी की तारीख आई
ख़ुशी-ख़ुशी वो बन दुल्हन घर हमारे आई
जिन्दगी बदल तब से अपनी है गई
आज़ादी की चिड़िया हो गई फुर
सुबह शाम हम बोलते है "जी हुजुर"...
याद तेरी और आई...
मयखाने का रास्ता याद आया
बैचैनी ज्यों ज्यों बढती गई
पैरों में तेजी और आती गई
चंद लम्हों में तय हुआ सफ़र
आ रहा था सामने मयखाना नज़र
क्या था लोगो का आलम वहां न पूछिए
बुतखानो में कम, भीड़ वहां ज्यादा पाई
हर मयकश के लबो पर फरयाद
बस एक ही बार बार आती थी
"बिछड़ा यार मिला दे ओये रब्बा !"
हालत अपनी भी कुछ जुदा न थी
दुआ करते खुदा से मय होटों से लगाई
लगा मय अपना ग़म गलत कर देगी
दवा पर अपने दर्द की कुछ हो न पाई
जितनी पी मय हमने, याद तेरी और आई...
--- अमित ०४/०७/२०१०
Tuesday, June 29, 2010
पहली बार देखा ...
यह करिश्मा हमने पहली बार देखा
जमीं पर चलता माहताब देखा
जो बस अकड़ता ही रहता था
उस आफताब को शरमाते देखा
शमा पर परवानो को जलते तो देखा था
माहताब पर उनको मरते, पहली बार देखा
जलने की चाह में,
आज हमने भी छु लिया माहताब को
फिर जमीं नाचते तारो को पहली बार देखा ...
(सोचा था बेगम को खुश करने के लिए कुछ अच्छा सा लिखूंगा, मगर हो कुछ और ही गया!!!)
--- अमित २९/०६/१०
Sunday, June 27, 2010
बदली फिज़ा...
बुलाये जो न आता था सावन
जाने का नाम अब न लेता है
सुनाया करता जो मधुर गीत
"जी" बस अब हमारे जलाता है
दोमासी होता था जो पतझड़
छह माह गये, अब भी इतराता है
बहार तो मानो, मुह ढक सो गई
जगाने का हर जातां बेकार जाता है
चाँद भी मानो कलाएं अपनी भुला
पूनम तो गली हमारी भूली
और मावस करती रोज ठिठोली
बस ये एक पुरवाई ही तो है
हालत जिसको हमारी समझ आई
सरे-शाम खूब यह बहती है
जानती है ये
मेरी महबूब, दूर -बहुत दूर रहती है ...
कला ...
दूर एक कोने में
लिए एक कुर्सी
बैठी थी वो !
हाथ में थी
चंद पेंसिले,
कुछ कागज़
और पास पड़े थे
कुछ नमूने
उसकी कला के
उतारे थे जो उसने
अभी कागज़ पर !
घिरी लोगो की बीच
तारो संग चाँद सी
नज़र वो आती थी,
लिए होंठों पे मुस्कान
बिजली से हाथ
उसके चले जाते थे,
देखते ही देखते
भाव आप के चेहरे के
कागज़ पर उतर आते थे !
सच ही कहा है लोगो ने
कला ,
छिप न कभी पाती है
रखो सात तालो में
रौशनी इसकी
फ़ैल ही जाती है !!!
( मोरिशस के प्रमुख बाज़ार में एक छोटी लड़की लोगो के पोट्रेट बना रही थी, उसकी कला और रफ़्तार पर )
Thursday, June 24, 2010
शायद कोई समझा दे ...
और कुछ बनाई
कविताये यार !
प्रतिकिर्याएं आई
खुशियाँ संग
अचरज भी लाई !
कुछ सरहानाये आई
दिल को मगर
आलोचनाये ज्यादा भायी !
अचरज था
हरियाली उनके हिस्से आई
जो थी गईं बनाई
और सुखा वहां पड़ा
जहाँ थी दिल की गहराई !
Friday, June 18, 2010
चंद कलियाँ गुलाब की...
रोज़ तोड़ लाता हूँ मैं
दिखती है इनमें मुझे
अब सूरत ज़नाब की !
चंद कलियाँ गुलाब की ...
जरुरी नहीं है अब मुझे
आब-बो-हवा कश्मीर की
महका रही है घर मेरा
ख़ुशबू ज़नाब की !
चंद कलियाँ गुलाब की ...
जायज है अब मस्रुह्फियत मेरी
चुन चुन के आ रही है
यादें ज़नाब की !
चंद कलियाँ गुलाब की ...
चर्चे है रोज़ मेरे बाज़ार में
दिखला रही है रंग मुझ पर
दीवानगी ज़नाब की !
चंद कलियाँ गुलाब की...
Monday, June 14, 2010
और हम बन गये कवि...
जीवन के अनमोल पल
सुझा न जब कोई उपाय
डायरी ली हमने एक बना
दर्ज हो रहे थे उसमें
जीवन के कुछ ख़ास पल
आलसी मन हमारा
भटकने अब लगा था
लिखना डायरी हमे
नीरस लगने लगा था
उपाय कुछ अब
एक तीर से दो शिकार
सा हमको करना था
हर घटना को हमने
विस्तृत से संछिप्त में समेटा
गद्द्य को पद्द्य में लपेटा
घटनाएं अब
कविताये बनने लगीं
नीरसता अब दूर हुई
आनंद कविता में अब आता हैं
हर गये दिन
यादों का एक अध्याय जुड़ जाता हैं ...
Sunday, June 13, 2010
क्या हैं कविता ...
यह सवाल कई बार
मैंने खुद से पूछा
आखिर क्या है कविता ?
एक ही जबाब हर बार मिला
आँख और जुबान है कविता
लगता अटपटा मेरा जबाब
गर करे जरा गौर
तो मायने रखता ये जबाब
यों तो आँखे रखते सभी
देखे जो सब से हटके
वही होता कवि ...
जज़्बात होते सबके पास
ब्यान करे जो उनको
वही होता कवि ...
मिलाया जब
अपनी आँख और जुबान को
बनी तब कविता
कहा इसीलिए
आँख और जुबान है कविता ...
--- अमित १४/०६/१०
आओ चले, करे सागर फतह ...
चढ़ चुके है हम पहाड़
फतह करना है अब सागर यार
रट सबने लगाई थी
जाना एक टापू पर है
होकर एक नाव में सवार
तैयारी की जिम्मेदारी
फिर सौपी गई हम पर
कमान हमने फिर संभाली
ले साथ एक दो का
तैयारी पूरी कर डाली
दिन, जगह सब तय था
इंतज़ार बस आने का था
दौड़ा-दौड़ा फिर दिन वो आया
सामान संभाले अपना
कारवां सागर तट पर आया
सागर से ज्यादा जोश
ले रहा हिचकोले था
और सागर भी स्वागत को
बाहें अपनी खोले था
"कोरल बेले" था उस नाव का नाम
सवार थे जिस पर हम
जैसे जैसे नाव सागर के भीतर जाती थी
लहरें अपना रूप दिखती थी
जोश अभी भी गरम था
पर देख बढ़ता जोश लहरों का
चुपके चुपके हो रहा अपना कम था
खाती हिचकोले नाव आगे जा रही थी
मस्ती अब जरा किश्तों में आ रही थी
सागर को अब मस्ती ज्यादा सूझी
लहर एक ऊँची , नाव से टकराई
वो देखो लड़कियों की फ़ौज
उड़ कर अपनी जगह से
नाव के फर्श पर आई
हालत लडको की भी पतली थी
बैठे जो नाव के किनारे थे
नज़र भीतर सीट से चुपके आ रहे थे
होले होले नाव अपनी टापू पर आई
जान में जान लोगो की आई
सागर फतह तो हमने कर लिया
पर प्रकर्ति के आगे हैसियत अपनी नज़र आई...
--- अमित १४ /०६/ २०१०
Friday, June 11, 2010
खुशियों के पल ...
बात एक छोटी सी है
जरा कम समझ आती है
करो अगर इंतज़ार
कभी खुशियाँ नहीं आती है
करते करते इंतज़ार
लाखो खुशियाँ रेत सी
हाथों से निकल जाती है
कुदरत का दिया हर पल
बहुत ही है अनमोल
अभी देखो निकल गया एक पल
अब न आयगा ये कल
साथ ये भी लाया था खुशिया
फर्क सिर्फ इतना है
किसी ने समझा और अपनाया
किसी ने न समझा और गवाया ...
--- अमित १०/०६/२०१०
Thursday, June 10, 2010
तुम्हारा संदेशा ...
खटखटाया था कल
दरवाजा किसी ने
और टूटी ख़ामोशी
जाने कितने दिन बाद
मेरे घर की
गये हो जब से तुम
सब खामोश हो गया
दिनों बीते आवाज़
अपनी भी सुने
घूम कर हर दिशा से
लौट आती है नज़रे
बस घर के दरवाजे पे
और जोहते है बाट
कान एक दस्तक को
छोड़ चुकी है साथ मेरा
परछाई भी अब
और लगी है
खोजने तुम को
हर सूं अब...
खोला जो दरवाजा
डाकिया आया था
ख़ुशी के एक लहर दौड़ गई
संदेशा वो तुम्हारा लाया था ...
--- अमित १०/०६/२०१०
प्यार का मरहम ...
हर बात ब्यान
लफ़्ज़ों से हो
यह जरुरी नहीं
हर ग़म का हिसाब
आसुओं से हो
जरुरत नही सहारे की
तेरे ज़ज्बातो को
पाने को राह
मेरे दिल की
उठी हर टीस
तेरे दिल की
तोडती दम अपना है
पा कर राह
मेरे दिल की
अहसास है मुझे
तेरे दिल से उठते
हर दर्द का
न तू घबरा
न हो बेचैन
तेरे इन हरे जख्मों
पर होगा
मेरे प्यार का मरहम ....
Tuesday, June 8, 2010
बाज़ार ...
यहाँ लगा है एक बाज़ार
बोलो क्या खरीदोगे ?
इज्ज़त किसी लड़की की लोंगे
या
दाम किसी खून का दोंगे ?
चोरी , डकैती और गबन
ये सब भी है अपने पास
आप जो करे मांग
"हवाले" के भी है हवाले
हमेशा खुला है हमारा बाज़ार
बे-धडक आये और
पसंद अपनी बताइए
पसंद आप की और
दाम हमारे है
बस दाम चुकाइए और
सामन साथ ले जाइए ...
(अपने देश की क़ानून और न्याय वयवस्था पर )
--- अमित ०७ /०६ /२०१०
Monday, June 7, 2010
तुम और मेरी ग़ज़ल...
एक ग़ज़ल
वादा झूठा नहीं था
मुझको मिली
तन्हाई भी थी
और हसीं
मौसम भी था
ख्यालो का आया
एक सैलाब भी था
बन कर लफ्ज़
उतर रहा था
हर ख्याल
मेरे कागज़ पर
और उतर गई
तुम बनकर एक
खूबसूरत ग़ज़ल
मेरे उस कागज़ पर
लगा फिर मुझको यों
ये बे-मानी है
लफ्जों में तुम को बंधना
हो न कितने ही
खूबसूरत ये लफ्ज़
ब्यान तुमको
कर न पाते है
यही सोच
उड़ा मैंने दिया कागज़ वो
और फ़ैल गई
खुशबू तुम्हारी
चारो ओर ...
Thursday, June 3, 2010
इंडियन मदर और मदर इंडिया ...
मगर अपने यहाँ
दो तरह की होती है
एक तो है " इंडियन मदर"
और दूजी "मदर इंडिया"
पहली तो भर पूर पाई जाती है
दूसरी संख्यों में पाई जाती है
आप कहेंगे
जरा अंतर तो बताइए !
अंतर बड़ा वाजिब है
जिसको दे बस "लाल" दिखाई
"इंडियन मदर" वो कहलाई
और जिसे ने किया
हरियाली पर "लाल" कुर्बान
"मदर इंडिया" है उसका नाम !
Thursday, May 27, 2010
अक्स मेरा...
एक आइना मैंने
दिखा रहा था सच मेरा
करता मैं क्या
बर्दाशत ही नहीं होता
आईने में
अक्स मेरा !!!
Saturday, May 15, 2010
कुछ समान अभी बाकी है ...
कुछ समान अभी बाकी है
इबारते लिखी है कुछ कागजों पे
कोरे कुछ कागज़ अभी बाकी हैं
दवात में जो थी कभी श्याही
सूख कब की वो चली
रगों में दौड़ता लहू अभी बाकी है
मेरे कमरे में
कुछ समान अभी बाकी है
मेरी मेज़ पर रखा है
अभी वो आधा टूटा चश्मा
साथ पड़ी किताबों से
धुल हटानी अभी बाकी है
मेरे कमरे में
कुछ समान अभी बाकी है
टंगा है जो उस खूंटी पर
मेरे थैले में
यादों के चाँद टुकड़े अभी बाकी है
लेकर कहाँ मुझे जाते हो
मुर्दा तो सिर्फ जिस्म है
रूह में जान अभी बाकी है
मेरे कमरे में
कुछ समान अभी बाकी है
Thursday, May 13, 2010
दो प्रशन ...
तेज़ाब किसी ने
एक लड़की पर
सुनकर हुआ दुःख !
लोगो की प्रतिकिर्या आई
निकम्मी है सरकार
निकम्मा है प्रशाशन
और लचीले है क़ानून
करेगा क्या इन "शैतानो" का !
सुनकर आया क्रोध
क्या है आधार
जो दे दोष दुसरो को !
प्रशन करता हूं मैं दो
नारी सबला है या अबला ?
अगर अबला है तो
बात बराबरी की क्यों ?
संरक्षण उसका जरुरी है
जिम्मेदारी पुरुष को दो !
गर सबला है नारी तो
जबाब करार नहीं देती क्यों
जब उठे आँखे और हाथ उस पर दो !
देती जब वो जीवन
हर क्यों न लेती "शैतान" का जीवन वो?
आते कहाँ से है "शैतान" वो
अगर मैं गलत नहीं
घरों में हमारे ही
पलते हैं "शैतान" वो !
लाल अपना प्यारा है सबको
लाडली अपनी प्यारी है सबको
लाडली किसी दुसरे की
काँटा क्यों बन जाती आँखों में वो?
क्यों नहीं देते हम ध्यान
क्यों नहीं कसते हम लगाम
निकलते है घर से जब लाडले के पाँव!
क्यों नहीं होता दमन "शैतानो" का घर में
जब दिखाई देते है पाँव पालने में !
Wednesday, May 12, 2010
नया अंकुर ...
तेज धुप
Monday, May 10, 2010
तुम याद आते हो...
जब पड़ती मेरे चेहरे पर ,
तुम याद आते हो !
आते-जाते चिडता है
अब मुझे घर का दरवाजा ,
तुम याद आते हो !
अमावास की काली रात
और पूनम की चांदनी
जलती मुझको,
तुम याद आते हो !
सुना रहता है अब आंगन मेरा,
तुम याद आते हो !
आँखों से माना दूर हो
ख्यालो से मेरे कहाँ जाते हो,
सच कहता हूँ
तुम याद आते हो !!!
Wednesday, May 5, 2010
अब हमारी बारी है ...
सुना एक मुहावरा कई बार
खाली दिमाग शैतान का वास
जब भी सुनते बडे खुश होते
लगता हमको देख बना
यों तो सूरत सीरत भोली है अपनी
दिमाग मगर जरा गड़बड़ है अपना
बे-लगाम घोडे सा ये भागता
कहाँ कब कैसे , करे कोई खुराफात
ये तो बस ये ही जानता
गये दिन की ही बात है
हम यारो के अपने साथ थे
गौर करने की बात है
दिमाग से वो भी तंग हाथ थे
ये तो सोने पे सुहागे वाली बात थी
पूरी बारात शैतानो की साथ थी
बहुत हुआ सब पुराना
चलो आज करे नया कारनामा
ख्यालों के फ़िर सैलाब आने लगे
ये करे या वो करे , दिमाग सब लडाने लगे
शैतानो को ख्याल कब अच्छे आने थे
ज़ोर पर ज़ोर लगते गये और
सारे प्रस्ताव ओंधे गिरते गये
एक विचार तव अंधरे में जुगनू सा चमका
क्यों न सब ज्ञान और हुनर अपना मिलाये
और मंच ऐसा बनाये , जो सबके काम आए
कमर कस कर ली हमने तैयारी है
देखना दुनिया वालो , अब हमारी बारी है ...
--- अमित
हौसला रखते है हम ....
आसान रास्तों पर चल कर कभी नाम नही होता
माना नदी का रुख नही मोड़ सकते है हम
उस नदी पर बाँध बना सकते है हम
क्या जो फूल नही राहों में हमारी
कांटे से काँटा निकालने का हुनर जानते है हम
क्या जो राहे मंजिल में गिर गये हम
उठ कर फ़िर बढ़ने का दम रखते है हम
क्यों सोचते है वो की हम से न होगा ये
चुनौतियों को हकीकत में बदलने का हौसला रखते है हम ....
Tuesday, May 4, 2010
गुरु द्रोण ...

पर गुरु द्रोणो की कमी नहीं ...
कर स्व-अभ्यास कोई आगे बढ़े
तो प्रोहत्साहन को पूछे कौन,
निरुत्साहित करने को तैयार खड़े ...
एकलव्य को अर्जुन समझते द्रोण
तो ये प्रथा ही न जन्म ले पाती,
गुरु, गुरु ही रहते ,
शिष्यों को भी सही दिशा मिलती जाती ...
Wednesday, April 21, 2010
पंछी हुए श्याने ...
दौर मंदी का अब गया
और बाज़ार गर्म हो गया
अब तक जो बंद थे 'पर'
खुलने अब वो लगे ,
छोड़ कर पुरानी शाखे
आशियाना 'पंछी' नया लगे बनाने !
देख देख ये सब ,
मालिक कमज़ोर शाखों के लगे घबराने
ना हो वीरान, अपना आशियाना
पैतरे इसलिए नये नये लगे लगाने !
कल तक जो लगते थे खुद पर बोझ
आँगन के फूल नज़र अब वो आने लगे !
प्रलोभन रोज अब नये दिए जाते है ,
राई के भी अब तो , पहाड़ बना दिए जाते है !
हर छोटी खबर भी, मसाला साथ लिए होती है
और गई हर शाम 'पत्री' एक नई मिली होती है !
लाभ आज से आप को ये दिया जाता है,
वेतन में इजाफा किया इतना जाता है ,
आश्वासन लोगो को ये दिए अब जाते है !
देख देख इनकी ये सब चाल
'पंछी' भी अब हो गये श्याने है
उड़ना तो एक दिन फुर्र ही है
बस भागते इस 'भूत' के
लंगोट और हथियाने है ...
(आर्थिक मंदी का दौर ख़तम होने पर कंपनी और कर्मचारी के बीच की खीचा तानी पर )
--- अमित (२०/०४/२०१०)
परछाई ...
Sunday, April 11, 2010
सपना ...
Tuesday, April 6, 2010
कैसे बनी हास्य कविता ...
सूरज हूँ मैं...
Friday, April 2, 2010
स्नूपी हैं इनका नाम ...
Monday, March 22, 2010
शब्दों की धार ...
शीर्षक की खोज जारी हैं ...
Sunday, March 7, 2010
बेटे की करनी...
Saturday, February 20, 2010
फिर किसी ने कहा ...
Saturday, January 23, 2010
जज्बातों का सैलाब सा आता...
जज्बातों का सैलाब सा आता,
Thursday, January 14, 2010
अँधेरा ...
Wednesday, January 13, 2010
दोस्तों कि शिकायत (^_^)...
२०१२- नए युग...
Friday, December 25, 2009
इश्तिहार बोर्ड...
बात हैं गये रविवार की
शाम ढले बैठे थे बाग़ में
किनारे की दूकान पर
आकर गाड़ी एक बड़ी रुकी
आदमी उससे उतरे दो
निकाल एक सीढ़ी
झट छत पर जा पहुंचे वो
हरकते कुछ संदिघ न थी
कौतुहल वश निगाह उन पर टिकी
सामने था उनके एक "इश्तिहार बोर्ड"
संभाला उन्होंने तब अपना समान
यकीन जानिये
पांच ही मिन्टो में ख़तम किया अपना काम
सामने था अब हमारे, ६*१० का नया इश्तिहार
दो दिन गये फिर निगाह फिर उस पर गई
देखा, जो था दाढ़ी बनाता आदमी
शरबत पी इठलाती लड़की बनी
दिखा उसे जब आज सुबह , चौक कर आँखें खुली
पाया आज फिर एक नया इश्तिहार
"यह जगह खाली हैं , आप दें अपना इश्तिहार" !!!
(सच्ची घटना पर आधारित )
--- अमित २०/१२/2009
मुद्दे ...
दुनिया घिरी हैं आज मुद्दों से
हल किसी से न एक होता !
सोचो अगर मेज से हट
फैसला इनका खुले मैदान होता !
कश्मीर का मुद्दा क्रिकेट से अगर तय होता
"शारजहाँ " में तो "पाक" कश्मीर हम से ले गया होता !
और रंगभेद को ले कोई सिडनी गया होता
"पोंटिंग भैया " ने तो आस्ट्रेलिया को क्लीन चिट दिला दिया होता !
आतंकवाद अगर "वहाईट हाउस" छोड़ "अफगानिस्तान" में हल होता
कौन जाने आज "ओबामा" नहीं "ओसामा" विश्व नेता होता !
परमाणु अप्रसार को अगर "लालू " को सौपा होता
सारा "युरेनियम" उसकी भैंसों ने पचा दिया होता !
सोचो बेमानी , घूसखोरी , भर्ष्टाचार का कॉम्पटीशन होता
धन्यवाद हमारे नेताओं को ,
स्वर्ण , रजत और कांस्य सब इन्होने "भारत" के नाम करा दिया होता ...
--- अमित ३/१२/२००९
गलत-फ़हमी...
कहानी एक शब्द की...
Wednesday, October 21, 2009
एक घटना ...
इसे साहस कहे या दुस्साहस
आधुनिकता कहे या बे-शर्मी ,
फैसला आप पैर छोड़ता हूँ
देखा जो इन आँखों से
किस्सा आप से वो कहता हूँ
करता था एक बस स्टेशन पर
श्री-मति जी का मैं इंतज़ार
माहौल बडा ही नीरस था
और बढती चहल कदमी से
खोता जा रहा धीरज था
निगाह हमारी आवारा पंछी सी
कहाँ एक जगह ठहरती हैं
इधर उधर घूम
साथ लगी बेंच पर पड़ी
अभी तक थी जो सुस्ती
वो अब अचरज बनी
बैठा बेंच परएक प्रेमी युगल था
फूटती दोनों से बडी प्रेम उमंग थी
गुजरने के लिए बीच
हवा को भी जगह तंग थी
देख कर उनके हाथों कि शरारत
हमको होती जा रही थी हरारत
जिस तरह वो थे एक दूजे में गम
देख कर उनको होते थे होश अपने गुम
उनकी देख येँ हरकत दिमाग अपना चल गई
जो देखी घटना, वो कविता बन सामने आ गई ...
--- अमित २२/११/०९
Wednesday, August 26, 2009
ऐसा बस यहीं होता...
Saturday, August 22, 2009
चरित्र चर्चा...
बडे एक शापिंग मॉल के
महंगे एक कैफे में
कर रहीं थी वो चुहल !
चर्चा बड़ी ही ख़ास थी
शर्मा जी के बेटी
जो दिखी वर्मा जी के बेटे के साथ !
एक ने कहा, " देखा "पर " निकल आए है !"
दूजी कहाँ चुप रहने वाली थी
अरे आप को नही होगा पता
"सुबह से शाम गुजरती साथ है "
आज कल तो बच्चो का चलन ही खराब है !
चर्चा चलती गई और कालिख पुतती गई !
घनन -घनन तभी मैडम का फ़ोन घंनाया
हंस खिलखिला कर दो बातें हुई
थोडी देर में मिलने का समय ठहराया !
किया सहेली को विदा अपनी
और घर फ़ोन लगाया
बेटा , पापा को बोलना
मम्मा को अर्जंट मीटिंग का कॉल आया,
आते घर शाम को देर होगी जरा !
थोडी देर गये पापा का भी फ़ोन आया था
फंस गये है वो मीटिंग में ये फरमाया था ,
मम्मा, बेचारी को कहाँ था पता
पापा की मीटिंग है उसी सहेली के साथ
चरित्र चर्चा चल रही थी जिसके साथ ...
--- अमित २२/०८/०९
Sunday, August 9, 2009
फर्क कहाँ हुआ ???
Sunday, May 3, 2009
कहाँ जाऊं मैं ...
दिल करता है
ज़ोर से चिल्लाऊं मैं
सामने है जो दिवार
उस से सर टकराऊं मैं
देखता हूँ जब आइना
करता है दिल कर दूँ चूर आइना मैं
घुटा है दम में इस चार दिवारी में
तोड़ के ये बंदिशें भाग जाऊं मैं
सभी तो यहाँ अपने ही है
इल्जाम किस के कत्ल का लूँ मैं
अपनों को कत्ल कर नही सकता मैं
हौसला नही कर लूँ ख़ुद -कुशी मैं
सोचता हूँ अब
जहाँ न ढूँढ सके कोई मुझे
जा कर ऐसी जगह खो जाऊं मैं ...
--- अमित ३ /०५/२००९
Wednesday, April 29, 2009
उस्तादों के उस्ताद...
Sunday, April 19, 2009
जुगाड़ की कहानी ...
Tuesday, April 14, 2009
जलाई "जोत" ...
कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल में थी
अपने लिए तो सबको होती है
दुसरो के लिए , दिल में उसके थी ...
भीड़ से अलग रास्ता बनाना
काम येँ इतना आसान नही
आसानी से जो मिल जाए
वो मकाम , उसका मकाम नही ...
तैयारी अपनी भी पूरी थी
पता था ज़माना यों साथ न आएगा
ना जाने कब और कहाँ
यें ज़माना उंगली अपनी उठाएगा...
डर कोसो उसके कदमो से दूर था
पता था,
चाह है अगर रौशनी की
जलाना कुछ तो जरूर होगा ...
जले भी , तडपे भी ,
देख बदलते लोगो को
दिल दुखा भी ...
कदमो को पीछे हटा लेना
उसने कहाँ सीखा था
ऐसे लोग कहाँ मंजिल तक जाते है
मंजिल ख़ुद उनके क़दमों तक आती है ...
जीत आख़िर सच की ही होती है
उसकी दिखाई "जोत "
ज्वाला आज बनी जाती है ...
काम उसका हुआ पूरा
बारी अब हमारी है
जलाए यें जोत रखना
जिम्मेदारी अब हमारी है ...
( अपने गुरु जी को समर्पित )
--- अमित १४/०४/२००९
Monday, April 6, 2009
बे-शर्मी ...
Monday, March 30, 2009
कुर्सी और यें ...

कुर्सी,
इस शब्द में ही अजीब सा खिंचाव है
देखते ही अपनी और खिंच लेती है
और जाते ही आगोश में इसके
जैसे मिट ही जाता सारा दर्द...
तभी तो देखा है
जितना बुड्ढा होता कोई
उतनी है बडी कुर्सी लेता ...
पता नही ,
कुछ को ये कुर्सी रास क्यों नही आती
या कुर्सी को "कोई" पसंद नही आता
और लेती कुर्सी किसी को तडपाने का मज़ा ...
देखते ही इनको कुर्सी को सूझता मजाक
ऐसा ही कुछ होता इनके साथ
जब होते ये जनाब कुर्सी के पास
उग जाते जैसे कांटे कुर्सी में
जिन्हें देख भागते फिरते यें ...
दूर से यें देंखे तो फूलों सी लगती कुर्सी
और बैठते ही इनके
अंगारों सी दहकती कुर्सी ...
खींचती कभी चुम्बक की तरह
और बैठते ही इनके
बिजली का झटका दिखाती कुर्सी ...
गज़ब है ये कुर्सी
जाने क्यों इनको इतना तडपाती
है ये बैरन कुर्सी ...
--- अमित ३० /०३ /२००९
Sunday, March 22, 2009
घुमने गये पार्क ...

बडा मजा आता था
Monday, March 9, 2009
ठहराव...
ठहर सी गई है जिन्दगी;
अब कुछ ऐसा लगता है ...
आ कर एक दोराहे पर
कुछ सोच में पड़ गई है जिन्दगी
अब कुछ ऐसा लगता है ...
करने को तो है बहुत कुछ अभी
जाने जान हाथों से निकल गई हो
अब कुछ ऐसा लगता है ...
शयद सुबह करीब ही है
घना हुआ अँधेरा सा लगता है
मैं तो चाहता हूँ नींद से उठना
जाने क्यों शरीर थका सा लगता है ...
कुछ तो हो ऐसा अब
जो कर दे मुझे सागर सा चंचल
ये ठहराव अजीब सा लगता है अब ...
पता नही क्यों ...
Friday, March 6, 2009
शांत रहो ...
हर गये दिन जुमला एक
कानो में हमारे पड़ता हैं
छोड़ा हमको नही जायेगा
हर हिसाब हम से
एक दिन लिया ज़रूर जाएगा ,
कह कर कोई
गुस्से से अकड़ता हैं ...
आदत से हम भी मजबूर हैं
गुस्से पर मुस्काते हैं
जले हुए दिल को ,थोड़ा और जलाते हैं ...
येँ जनाब भी , जरा हट के हैं
सोचते हो हैं , जाने क्या कर देंगे
पकड़ कर कान चाँद का
जमीन पर ला रख देंगे
और पकड़ कर दुम शेर की
बना दरबान ,
खडा दरवाजे पर कर दंगे ...
धाक जम मगर कहीं न पाती हैं
बनती - बनती बाजी इनकी , बिगड़ ही जाती हैं
पासे जाने पलट कैसे जाते हैं
होकर इनका , इन्हे ही चिडाते हैं ...
खिसाय्नी बिल्ली सी इनकी हालत रहती हैं
और दुम सदा टांगो में छिपी रहती हैं ...
पडे जब भी उस पर पैर हमारा
"शांत रहो - शांत रहो "
गूंजता हैं कानो में येँ नारा ...
--- अमित
आला रे आला ...
आला रे आला
SPICE-08 आला
सब टीमो ने अपना
परचम संभाला
आला रे आला
SPICE-08 आला
"सुखोई" जहाँ
ताकत में मदमस्त है ,
"पृथ्वी " भी वहां
सम्मान बनाये रखने की जुगत में व्यस्त है .
"अग्नि " और "भार्मोस"
दोनों तरफ़ से न कुछ आहट है
कमजोर न कोई इनको समझो
रणनीति के गुरुओं से भरपूर
दोनों टीमो की पुरी तैयारी है
देखना बस यह है
तरकश में तीर किस के कितने है
अब मैंदान में आने की बारी है ...
(SPICE : A sport event in Infosys for CCD Project...)
--- अमित