Wednesday, 29 April, 2009

उस्तादों के उस्ताद...

करनी जो हो किसी की खिचाई
सबसे आगे नज़र हम आए
बात बे बात मारने में
महारत जो हमने पाई
बस एक बार भिड कोई हमसे जाए
समझो शामत उसकी आई
हुई न जब तक मान - मुनव्वल
किसी की न जान बची
दिन-ब-दिन बढता गुरुर जा रहा था
नाचीज़ अब हर कोई हमें नज़र आ रहा था
सोचता तो ऊंट भी है
नही है कोई उसका सानी
आता वो भी जब नीचे पहाड़ के
हो जाता गुरुर उसका भी पानी
हुआ हाल अपना भी उस ऊंट सा
हुआ जब सामना उस शख्स का
समझा जिसे बस धूल था
अपनी बातें, उलटी हम पर ही आती थी
जुबान अपनी आगे उसके खुल न पाती थी
नौसिखिये सी हालत अपनी नज़र आती थी
हम तो थे उस्ताद , मगर
मिल गये आज हमे " उस्तादों के उस्ताद "
सबक अच्छा हमको सिखाया
दूर रखो कला से गुरुर ,
ये गुरुर न कभी किसी के काम आया ...
--- अमित २९ /०४/०९

Sunday, 19 April, 2009

जुगाड़ की कहानी ...

बचपन से सुना है एक शब्द हर मोड़ पर ...
नाम है उसका "जुगाड़ "
जो भी मिलता "जुगाड़ " का चर्चा करता ...
कैसे हुआ ये पैदा
इसकी भी अपनी कहानी है ,
जो पेश अपनी जुबानी है ...
हुई जब चाह एक बच्चे की,
किया गया "जुगाड़" के बेटा हो ...
हुआ बडा जब वो बच्चा,
किया "जुगाड़" स्कूल उसका अच्छा हो ...
बच्चे मास्टर जी के भी थे,
किया "जुगाड़" के कुछ टयूशन हो...
स्कूल , कालेज हुआ अब पुरा ,
लगा "जुगाड़" की डिग्रिया जमा ...
डिग्रिया तो आ गई अपने हाथ ,
किया "जुगाड़" नौकरी बाड़िया हो ...
"जुगाड़" सारे काम अपना कर गये ,
पटरी पर आ गई जीवन की गाड़ी ...
अब तो बच्चा जवान हो चला ,
दोहरानी है फ़िर यही कहानी ...
"जुगाड़" भी गज़ब है ,
देता "दो बूँद जिन्दगी की "...
चाहती है दुनिया ,
हमसे मिल जाए उनको भी ये "जुगाड़"...
जानते वो नही ,
चलते हम हिन्दुस्तानी लेकर नाम "जुगाड़"...
-- अमित १९ /०४/२००९

Tuesday, 14 April, 2009

जलाई "जोत" ...

कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल में थी

अपने लिए तो सबको होती है

दुसरो के लिए , दिल में उसके थी ...

भीड़ से अलग रास्ता बनाना

काम येँ इतना आसान नही

आसानी से जो मिल जाए

वो मकाम , उसका मकाम नही ...

तैयारी अपनी भी पूरी थी

पता था ज़माना यों साथ न आएगा

ना जाने कब और कहाँ

यें ज़माना उंगली अपनी उठाएगा...

डर कोसो उसके कदमो से दूर था

पता था,

चाह है अगर रौशनी की

जलाना कुछ तो जरूर होगा ...

जले भी , तडपे भी ,

देख बदलते लोगो को

दिल दुखा भी ...

कदमो को पीछे हटा लेना

उसने कहाँ सीखा था

ऐसे लोग कहाँ मंजिल तक जाते है

मंजिल ख़ुद उनके क़दमों तक आती है ...

जीत आख़िर सच की ही होती है

उसकी दिखाई "जोत "

ज्वाला आज बनी जाती है ...

काम उसका हुआ पूरा

बारी अब हमारी है

जलाए यें जोत रखना

जिम्मेदारी अब हमारी है ...

( अपने गुरु जी को समर्पित )

--- अमित १४/०४/२००९

Monday, 6 April, 2009

बे-शर्मी ...

सुनते है
शर्म आंखों में होती है
मतलब हुआ
ये सब के पास होती ...
फ़िर क्यों
हमेशा ये शर्म नही देती दिखाई
राम ने आँखें तो सब को दी ...
सम्भव है
वहां भी किसी ने दलाली खाई
किसी को दी ज्यादा
और कर दी किसी के साथ बे-वफाई ...
हमारे साथ भी कुछ यूँ ही हुआ
वफा हमारे हिस्से में और
उनको मिली बे-वफाई ...
बे-शर्मी के इनकी चर्चे आम है
और हम
अपनी शर्म से परेशान है ...
बाज ना आते अपनी हरकतों से यें
जब देखो
इधर - उधर टांग अपनी अडाते यें
और मुंह की खाने के बाद
शेखी और बघारते यें...
देख इनकी ये बे-शर्मी
तरस हम इन पर खाते है
ख़ुद हम शर्मा कर
दुसरे रस्ते हो जाते है ...
बे-शर्म ये भी कम नही
दिखाने कोई नया करतब
फिर यें पीछे पीछे चले आते है ...
--- अमित ६/०४/०९

Monday, 30 March, 2009

कुर्सी और यें ...



कुर्सी,


इस शब्द में ही अजीब सा खिंचाव है


देखते ही अपनी और खिंच लेती है


और जाते ही आगोश में इसके


जैसे मिट ही जाता सारा दर्द...


तभी तो देखा है


जितना बुड्ढा होता कोई


उतनी है बडी कुर्सी लेता ...


पता नही ,


कुछ को ये कुर्सी रास क्यों नही आती


या कुर्सी को "कोई" पसंद नही आता


और लेती कुर्सी किसी को तडपाने का मज़ा ...


देखते ही इनको कुर्सी को सूझता मजाक


ऐसा ही कुछ होता इनके साथ


जब होते ये जनाब कुर्सी के पास


उग जाते जैसे कांटे कुर्सी में


जिन्हें देख भागते फिरते यें ...


दूर से यें देंखे तो फूलों सी लगती कुर्सी


और बैठते ही इनके


अंगारों सी दहकती कुर्सी ...


खींचती कभी चुम्बक की तरह


और बैठते ही इनके


बिजली का झटका दिखाती कुर्सी ...


गज़ब है ये कुर्सी


जाने क्यों इनको इतना तडपाती


है ये बैरन कुर्सी ...


--- अमित ३० /०३ /२००९

Sunday, 22 March, 2009

घुमने गये पार्क ...


कई दिन गये ,

आज फ़िर गये हम

घुमने वही "पार्क"...

छोटे छोटे पेड़ों

फूलों की कियारियों

और सुंदर फ़वारे से सजा ,

बडा सुन्दर लगता वो "पार्क"...

आज तो दर्शय था बहुत प्यारा

छोटे छोटे , नन्हे - मुन्नों से भरा था वो "पार्क"...

इधर देखा वो छोटा बच्चा

छोटे छोटे कदमो से भागा जाता था

भाग रही थी माँ उसके पीछे

हाथ मगर कहाँ वो उसके आता था ...

एक कूदता पानी में फ़वारे के

दूसरा देखा उसे घबराता

और जा अपनी माँ पास छुप जाता

मन फ़िर करता पानी में कूदे

क्या करे वो डर फ़िर जाता ...

वो देखा गेंद से बालक एक खेलता

मारता कभी पाँव से गेंद को

और कभी ख़ुद ही गिर जाता

हो खडा और ज़ोर लगा पाँव मारता ...

देख देख बच्चों के करतब
बडा मजा आता था

मन तो अपने बचपन में भागा जाता था

काश रोज़ ऐसी शाम आए

जो बचपन में मेरे मुझे ले जाए ...



--- अमित २२-०३-२००९




Monday, 9 March, 2009

ठहराव...

ठहर सी गई है जिन्दगी;

अब कुछ ऐसा लगता है ...

आ कर एक दोराहे पर

कुछ सोच में पड़ गई है जिन्दगी

अब कुछ ऐसा लगता है ...

करने को तो है बहुत कुछ अभी

जाने जान हाथों से निकल गई हो

अब कुछ ऐसा लगता है ...

शयद सुबह करीब ही है

घना हुआ अँधेरा सा लगता है

मैं तो चाहता हूँ नींद से उठना

जाने क्यों शरीर थका सा लगता है ...

कुछ तो हो ऐसा अब

जो कर दे मुझे सागर सा चंचल

ये ठहराव अजीब सा लगता है अब ...

पता नही क्यों ...

पता नही क्या था वो
समय का बहाव
या;
मेरे दिल में
कुछ ज़ज्बात दबे थे
जो बह निकले शब्द बन कर
और नाम हुआ कविता
पता नही ...
आज भी , वही मैं हूँ
वही मेरा दिल
वही मेरी ज़ज्बात
गर नही है कोई तो
बस शब्द ,
पता नही क्यों ...

Friday, 6 March, 2009

शांत रहो ...

हर गये दिन जुमला एक

कानो में हमारे पड़ता हैं

छोड़ा हमको नही जायेगा

हर हिसाब हम से

एक दिन लिया ज़रूर जाएगा ,

कह कर कोई

गुस्से से अकड़ता हैं ...

आदत से हम भी मजबूर हैं

गुस्से पर मुस्काते हैं

जले हुए दिल को ,थोड़ा और जलाते हैं ...

येँ जनाब भी , जरा हट के हैं

सोचते हो हैं , जाने क्या कर देंगे

पकड़ कर कान चाँद का

जमीन पर ला रख देंगे

और पकड़ कर दुम शेर की

बना दरबान ,

खडा दरवाजे पर कर दंगे ...

धाक जम मगर कहीं न पाती हैं

बनती - बनती बाजी इनकी , बिगड़ ही जाती हैं

पासे जाने पलट कैसे जाते हैं

होकर इनका , इन्हे ही चिडाते हैं ...

खिसाय्नी बिल्ली सी इनकी हालत रहती हैं

और दुम सदा टांगो में छिपी रहती हैं ...

पडे जब भी उस पर पैर हमारा

"शांत रहो - शांत रहो "

गूंजता हैं कानो में येँ नारा ...

--- अमित

आला रे आला ...

आला रे आला

SPICE-08 आला

सब टीमो ने अपना

परचम संभाला

आला रे आला
SPICE-08 आला

"सुखोई" जहाँ

ताकत में मदमस्त है ,

"पृथ्वी " भी वहां

सम्मान बनाये रखने की जुगत में व्यस्त है .

"अग्नि " और "भार्मोस"

दोनों तरफ़ से न कुछ आहट है

कमजोर न कोई इनको समझो

रणनीति के गुरुओं से भरपूर

दोनों टीमो की पुरी तैयारी है

देखना बस यह है

तरकश में तीर किस के कितने है

अब मैंदान में आने की बारी है ...

(SPICE : A sport event in Infosys for CCD Project...)

--- अमित

Thursday, 9 October, 2008

सब से अलग है पहचान हमारी ...

पनपते है हजारो सपने

हमारी आंखों में

और करते है हम सर्जन

उन रास्तों का

हो जिन से सच हमारे सपने

दी गई जब भी कोई चुनौती

हमने हाथो हाथ लिया

दृढ़ निश्चय कर हम आगे बढे

आसान माना ये डगर नही

साहस, भी यहाँ कम नही

रख अपने मूल्यों को ऊँचा

हर चुनौती पर विजय हमने पाई

देख ये बढ़ता हुआ आत्म विस्वास हमारा

जुड़ता जा रहा है हमसे दुनिया का हर किनारा

और आगे ही बढता जा रहा है कारवां हमारा

सबसे आगे जाने की है पूरी तैयारी

समय से तेज है रफ़्तार हमारी

हाँ , सब से अलग है पहचान हमारी ...

--- अमित २८ /०९ /०८

Tuesday, 29 July, 2008

संघर्ष...

प्रचार का ज़माना है
प्रयास चारो ओर पुर ज़ोर है
हमें भी प्रतिस्पर्धा में आना था
हम क्या किसी से कम है
बस यही सब को दिखाना था
नित नये प्रयास किये जाते थे
खेल हुआ या हुआ कुछ सहयोग
बढ़ चढ़ कर हमने भाग लिया
परिणाम चाहे कुछ रहा हो
हम हर ज़गह नज़र आए
दिनों दिन हम आगे बढ़ते जा रहे थे
और सब की नज़र में चढ़ते जा रहे थे
ज्ञान बाटने से बढ़ता है,
यही सोच ठान लिया ,
ज्ञान बाटकर, ज्ञान बढाने का काम
और दिया "संघर्ष" इस शुरुआत का नाम
देर ही सही
मगर महनेत रंग लाती है
"संघर्ष" को देखो,
नया सीखने की चहा साफ़ नज़र आती है ...
संघर्ष: It was a knowledge sharing event in Infosys by my team CCD...
--- अमित २९/०७/०८

Saturday, 12 July, 2008

इतने तुम याद आओगे

चाहे जहाँ चाहो

चले तुम जाओ

कौन परवाह करता है

क्या तुम्हे लगता है

बस तुम से ही हम है

न होगे तुम तो

कहीं न हम होंगे

तुम्हे क्या पता

बस, अपने दम से है हम

याद न एक दिन आयगी

मजे में बसर जिन्दगी हो जायेगी

क्यों ये विश्वास

आज हमे धोखा दिए जाता है

रह रह साथ गुजारा

हर पल याद आता है

की जो तुम से बे-रुखियाँ

जला उनसे आज मन जाता है

याद तुम न आओगे

ये महज एक धोखा था

न पाकर तुम्हे करीब

दिल अपना रोता है

ये न सोचता था कभी

इतने तुम याद आओगे ...

--- अमित १२/०७/०८

Friday, 11 July, 2008

आज़ादी ...

आज़ादी,
शब्द सुनते ही,
जोश की लहर दौड़ जाती
जोश तो जोश है
समय, बे-समय आ जाती
होश अगर इसमे खो जाए
यारो, शामत बडी आ जाती
हाल अपना भी कुछ ऐसा हुआ
श्रीमति जी जो मायके गई
१५ अगस्त सा हर दिन लगता
किस को अब पडी है
जो सुबह सुबह उठता
सुबह की सैर अब कहाँ होती है
९ बजे आँखे अब खुलती है
घर का काज कैसे, क्या होता है
नई आज़ादी में ख्याल कहाँ होता है
अखाडे में जा अब देही कौन तोडे
काम और करने को हमने रख छोडे
फल अब से कहाँ खाए जाते है
रोज पिज्जा - बर्गर मगाए जाते है
आख़िर, आज़ादी का जोश था
आगे क्या होगा किसे होश था
श्रीमती जी कब वापस आएँगी
जोश मैं ये भी भूल गये
गई शाम घर जब लौटे तो
देख श्रीमती जी को घर पर
हाथ से तोते छूट गये
देख हालत घर की और हमारी
वो गुर्राई जाती थी
सुनके दहाड़े उनकी,
जोश को भी धीरे धीरे होश आई जाती थी
हालत पर अपनी बडा तरस आता था
अब हमे ख्याल आता था
जब से हुई शादी, दूर हुई हम से आज़ादी ...
--- अमित ११/०७/08


Monday, 30 June, 2008

हालात ...

देता है हर कोई
दुहाई, अपने हालातो की
अगर हालात हुए कुछ और होते
तो अपना ये मुकाम न होता
जहाँ आज गिनते हो तुम औरों को
वही कहीं अपना भी नाम होता
ऐसा नही के हम काबिल न थे
बस, बदले जमाने से वाकिफ नही थे
दावं - पेच इसके हमें समझ नही आते थे
और साथी हमारे आगे निकल जाते थे
सच्ची लगन मगर कहाँ छुप पाती है
रात कितनी भी घनी हो
सुबह से हार ही जाती है
तुम रहो साथ मेरे ,
करो मेरा विश्वास
और कोई नही , ख़ुद बदलूँगा
मैं अपने हालात
मैं करता नही वादा
कि तारे मैं तोड़ कर लाऊँगा
साथ रहो तुम मेरे
आकाश तक तुम को ले जाऊं मैं ...
--- अमित ३०/०६/०८

कहते है वो ...

कहते है वो

हम से भी हो परदा

तो क्या हुआ

जो हम है एक - दूजे के

शर्म तो हमारा गहना है

आप कुछ कहे

हमें तो परदा-नशीं ही रहना है

ना रहे परदे में तो

हया से आँखे झुक जाती है

हाथों में लगी हिना की लाली

रुखसारों पे आ जाती है

सर्द सा जिस्म होने लगता है

जान सी जैसे, निकली जाती है

आप तो बडे बे-शर्म है

शर्म आप को कहाँ आती है

मिलती है आप से नज़रे

और जान हमारी जाती है

हलकी सी एक छुहन

सिरहन एक जिस्म में दौड़ जाती है

अभी रहो जरा दूर ही हम से

महोबत की ये खुमारी

हम से न सही जाती है ...

---अमित ३०/०६/०८

Wednesday, 14 May, 2008

नारी कहे ...

नारी कहे

क्यों बनू मैं सीता

तुम राम बनो या न बनो

मैं अग्नि परीक्षा में झोकी जाऊँगी

तुम तो फ़िर रहोगे महलो में

और मैं वनवास को जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं द्रोपदी

तुम धर्म-राज बनो या न बनो

मैं तो जुए में फ़िर हार दी जाऊँगी

तुम करोगे महाभारत सत्ता को

इसकी दोषी मैं रख दी जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं तारा

तुम हरिश्चंद बनो या न बनो

मैं तो नीच कहलादी जाऊँगी

मेरे बच्चे को मारोगे तुम

उसे जीवित कराने को मैं बुलाई जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं मीरा

तुम कान्हा बनो या न बनो

मेरी भक्ति तो फ़िर लज्जित की जायेगी

तुम को तो कुछ न होगा

और मैं विषपान को विवश की जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं अहिल्या

मैं तो फ़िर किसी इन्द्र के द्वारा छली जाऊँगी

और जीवन पत्थर बन राम की प्रतिक्षा में बिताओंगी

नारी कहे , कोई बताय

क्यों बनू मैं आदर्श नारी

क्या कोई आदर्श पुरूष मैं पाऊँगी ...

--- अमित १४/०५/०८

आई-टी २०५० में ...

दोपहर को जब साहिब-जादे उठे
कुछ उदास से लगे
यों तो दिन सूरज चढ़े ही होता है
मगर यदा कदा दोपहर को भी होता है
हाल जब पूछा, तो यों जबाब आया
डैड,
सिस्टम मेरा सारा डाउन है
बिहेव बडा इम्प्रोपर है
प्रोसेसिंग हो रही स्लो हैं
मेर्मोरी से सी-पी-यू को सिग्नल नही जाता है
डाऊनलोड कुछ हो नही पाता है
प्रोसेसिंग शुरू होते ही सिस्टम हंग हो जाता है
कल से हार्ड डिस्क मेरी ब्लंक है
कल गर्ल फ्रंद का ई-मेल आया था
प्रोपोसल का रिफियूज़ल उसमें पाया था
पिंग भी कर दिया उसने ब्लाक है
सी-पी-यू तब से देता बीप है
हुआ वायरस एटैक सा मेरा हाल है
साहिब-जादे की हालत हमे समझ आ गई
फॉर्मेट अपने सिस्टम को कर डालो
पढ़ई का उसमे ओ-एस डालो
फिर न हो कोई वायरस एटैक
इसलिए लगाओ स्पोर्ट्स का फायर वाल
झट सॉल्यूशन हमने दे डाला
२०५० का है अपना अंदाज़ निराला
आई-टी बनके रह गया जग सारा...
--- अमित १४/०५/०७

Saturday, 26 April, 2008

भावनाए ...

दिखाई नही येँ देती हैं
समझा बस इनको जाता है
बाँधी नही येँ जाती हैं
बंधा इनसे बस जाता है
जुबाँ कुछ होती नही इनकी
इन्ही से इनको समझा जाता है
जात- पात, धर्म-मजहब
इनको कुछ पता नही
रिश्तों की कोई ज़ंजीर नही
सरहदों से कहाँ येँ थम पाती हैं
चीर सरहदों को
दूर दिलो तक जाती हैं
नही कुछ और येँ
भावनाए हैं,
जो हर दिल में पाई जाती हैं ...
--- अमित २६/०४/०८

Friday, 25 April, 2008

सोच ...

अक्सर मैं कुछ लोगो की
बातो पर बस मुस्काता हूँ
देख कर उनकी सोच समझ
ख़ुद सोच में पड़ जाता हूँ
ये कर देंगे, वो कर देंगे
ये ग़लत है, ये नही होने देंगे
नारे वो सब लगाते है
काम नही कुछ और उन्हें
बस बातों की वो खाते है
और बातों में ही वो जीते है
आए जब मौका कुछ करने का
दूर नज़र न ये आते है
कहना तब इन का होता है
हमने तो बस सोचा था
सोच से कहाँ कुछ होता है
हम तो अकेले ही है
अकेले जन से क्या होता है
अब मूढ़ों को कौन बताए
सोच से ही सब होता है
एक अकेला सोच अपनी बदले
देख उसे दूजा फिर सोचे
देख बदलता फ़िर दूजे को
तीसरा को लगता वो भी सोचे
सोच में वो ताकत
जब बढ़ कर रूप अपना लेले
सिहासन ख़ुद हिलने लगता है
और स्मिर्धि का फूल
हर तरफ़ खिलने लगता है ....
( अपने गुरु जी को समर्पित )
--- अमित २५/०४/०७

Monday, 7 April, 2008

काश करता कोई हमे भी प्यार...

हमारे दिल में बस
हसरते पनपती रहती है
वो कोई और ही है
खुदा की रहमत
जिन पर बरसती है
उनको देखना और
देख कर आहे भरना
जिन्दगी अपनी यों गुजरती है
कौन जाने किस के पहलु में
श्यामें उनकी गुजरती होंगी
हम तो बस सोचते भर है
काश ऐसा होता
हमारे लिए भी
राहे कोई तकता
काश ऐसा होता
रूठे हुए हम होते
और कोई हमारी मनुहार करता
नित कर नये नये श्रृंगार
हमे भी कोई रिझाता
और होते जब हम उदास
होता वो हर दम पास
करते उससे हम अपनी
भावनाओं का इजहार
और होते उसे भी
हमारी भावनाओं से इकरार
काश,
काश करता कोई हमे भी प्यार ...
--- अमित ०७/०४/०८

Wednesday, 2 April, 2008

अप्रैल फूल...

अप्रैल का महीना करीब आ रहा था

कैसे लोगो को बेवकूफ बनाये

यही ख्याल जहन मेबार-बार आ रहा था

रोज नई तरकीबे बन जाती थी

इस में ये कमी है , उसमे वो कमी हैं

ये सोच छोड़ दी जाती थी

एक नया विचार तव आया

ऑफिस वालो को अप्रैल फूल बनाने का

प्लान तव हमने बनाया

एक तारीख को ऑफिस जा हम ने

इस्तीफा अपना दे डाला

होंटों पर मुस्कान लिए

ऑफिस में हम घूमते जाते थे

मेनेजर साब का क्या ज़बाब आएगा

इस इंतज़ार में समय बिताते थे

थोडी देर में उनका कॉल आया

खुशी खुशी हमने भी फ़ोन उठाया

दहाड़ने की आवाज उधर से आती थी

साहब ने फरमाया ,

इस्तीफा हम मंजूर करते हैं

तुम हम से मिलने आओ

इसी बीच एकाउण्ट डिसेबल हम करते हैं

ये सुन हम सकते में आ गए

देख अपना एकाउण्ट डिसेबल और घबरा गए

मेनेजर साब के आगे " सॉरी सर "

यही दो शब्द जबान से बोले जाते थे

देख हमे परेशान हाल

मंद मंद वो मुस्काते थे

एक बार वो फ़िर से गरजे

क्या सोचते थे, अप्रैल फूल हमे बनाओगे

ये सब हथकंडे हमी पर अजमाओगे

मेनेजर हम यों ही नही हैं, सभी का ख्याल रखते हैं

"अप्रैल फूल" अब तुमबन चुके

और मजाक भी बहुत कर चुके

जाओ जा कर काम करो

एकाउण्ट तुम्हारा अनेबल हम कर चुके

जान मे तव जान हमारी आई

सोचा न था व्यस्त मेनेजर ध्यान इतना दे पायेंगे

"अप्रैल फूल" का मजाक यो पकड़ पायेगे

कान हम अब पकड़ते हैं ,

ऐसा "अप्रैल फूल" न अब किसी को बनाएगे

सीमाये अपने अब न भुलायेगे ,

मजाक हैं , मजाक तक हैं इस्तमाल में लायेंगे ...

--- अमित ०२/०४/०८

Saturday, 29 March, 2008

टॉम बॉय ...

कुछ न कहना
बस चुप चाप सब कुछ सुनना
अगर हुआ जायदा तो
दे एक मीठी मुस्कान
बात को टाळ देना
और फिर वही
चुप चाप देखना सुनना
यही अंदाज़ है इनका
ग़लत फ़हमी ना रखियेगा
इतनी सीधी सादी नही है ये
मजा आता है इनको बडा
जब कर रहा कोई इंतज़ार खडा
जाने देवी जी क्या करती है
यों तो साज श्रिंगार से कोसो दूर है
फिर जाने कहाँ समय बरबाद करती है
यों तो ये है समझदार बहुत
पर कुछ बातों को कम समझती है
न समझी पर इनकी हम जब हँसते है
झगडा हम से ये खूब करती है
यों तो कभी नखरा नही दिखाती ही
पर कभी कभी अपने आप ही रूठ जाती है
और नज़र दूर तक नही आती है
थोड़ा मुन्व्वल हमसे करवाती है
और वापस उसी अंदाज़ में आ जाती है
अपने काम में बड़ी कुशल है
मेनेजर तक इनसे घबराते है
इनसे न हो सामना उनका
येही सोच दूर फ़ोन से बतियाते है
बुने चाहे वो लाख ताने बाने इनके लिए
आख़िर ख़ुद ही उनमें फंस जाते है
ऑन-साईट इनको जरा ज्यादा भाता है
यदा कदा विदेश का चक्कर भी लग जाता है
कंजूस बहुत है देवी जी
कभी हम ले पार्टी का नाम तो चक्कर खा जाती है
मगर दिल से बहुत सादी है
जिन से मिले, सब को भाती है
लड़कियों के साथ जरा कम ही जमती ही
और हमारे ग्रुप की " टॉम बॉय" कहलाती ही ...
--- अमित २९/०३/०८

Monday, 24 March, 2008

बडा शिकार ...

बहुत हुआ छोटा छोटा शिकार
चलो मारे एक बडा हाथ अब
ये मान्यवर,
साधारण श्रेणी से दूर
प्राणियों में गिने जाते है
छोटों की तो बात करे क्या
बडे - बडे इन से घबराते है
नीचे जो है इनके
बेचारे बस मिमियाते है
और अधिकारी जी देख इनको
कोने से सरक जाते है
कब दफ्तर को आना है
कब दफ्तर से जाना है
अपने मन का सौदा है
जब मन में आए आना है
जब मन में आए आ जाना है
काम होता है किस चिडिया का नाम
ये सवाल बहुत ही पुराना है
सुविधाओं को कहाँ इन्हे बरतना होता है
कैसे हो उसका हनन
जोर सारा वहाँ लगा होता है
और उस पर कहना ये
जो भी हो अपना क्या कुछ जाता है
कहाँ से कितना पैसा आए
किसने कितना पैसा पाया
यही सोच सोच कर दिन जाता है
जैसी देह विकराल है
बुद्धि भी वैसी पाई है
अक्ल के पीछे हमेशा लाठी होती है
पर ना जाने
व्यापारी बुद्धि कहाँ से इतनी आई है
कब किस को किसे लडवा दिया
कब किस की पीठ में छुर्रा लगा दिया
पता लगा मुश्किल है
और काम जो ये कर गया
समझो इनकी तिकड़म से बच गया
दूर से ही इनको करो प्रणाम
बच के इनसे रहने का रास्ता सब से आसान ...
--- अमित २०/०३/०८

Tuesday, 11 March, 2008

आई एक मेल ...

आज सुबह जब ऑफिस पहुंचे
देखा एक गुड मोर्निंग का मेल आया
यों तो , ये हमारे नये मित्र है
पर हमे अचरज ये हुआ
यकायक इन्हे हमारा ख्याल क्यों आया
उत्सुकतावश हमे मेल जा खोला
मेल देख हुई बड़ी हैरानी
कुछ कुशल क्षेम न पूछी थी
बस एक वेब साइट का लिंक आया था
हम ठहरे , थोड़े शौकीन
सोचा किसी कविता का पता बताया होगा
पहुंचे जब हम वेब साइट
देख उसे सर हमारा चकराया
पॉप -उप होते विज्ञापनों में
बस पैसा-पैसा-पैसा छाया था
ये कुछ और नही
मनी कंट्रोल का लिंक आया था
हमारे ये मित्र भी अजीब है
इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी के हो कर
शेयर बाज़ार के करीब है
बाज़ार की तेज़ी - मंदी
इनकी नब्ज़ में झलकती है
जब भी मिल जाओ इनसे
बस शेयर की की बात चलती है
ये भी हम से अनजान है
शेयर की भाषा न हमे आती है
कविता करना बस एक शौक है
ये तो इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी है
जिस से हमारी रोटी चल जाती है ...
--- अमित ११/०३/२००८

Friday, 7 March, 2008

इन से भी मिलते है ...

चलिए साब
चलते-चलते आप से भी मिलते है
बाकी सब की तरह
आप की भी अपनी ढपली अपना राग है
मगर, आप का रिकार्ड जरा ख़राब है
बजता हमेशा बस एक ही राग है
यों तो शान्ति है इनको प्यारी
मगर तुनक मिजाजी ने की गड़बड़ सारी
बात जरा सी भी नाक पर आ जाती
और बेचारी नाक हर जगह अड़ जाती
नाक तो फिर नाक है
सारी दुनिया इसके आगे हारी है
फिर अखाडे का क्या
कहीं भी जम जाता है
खाने की मेज़ वो जगह है
जहाँ आप फुल फॉर्म में पाये जाते है
इसे कुछ ग़लत न समझे
यों तो सामान्य लोगो सा ही खाते है
मगर भावनाओं में बह
भीड़ पर जरा भड़क जाते है
उठाई अगर किसी ने एक ऊँगली
पांचो उँगलियों से ज़बाब आपने दिया
बात हुई जब भी अपने "देस" की
परचम "देस" का अपने उपर किया
चाहे हो सही , चाहे हो ग़लत
अपने को ही उपर किया ...
--- अमित ०७/०३/०८

Tuesday, 4 March, 2008

ऐसे ही है ये ...

सुबह सुबह उठना
नहा-धो तैयार हो
खुली आँख से सपने बुनना
बस यही काम है इनका
ऑफिस में सबसे पहले
कम्युनिकेटर ही ओपन होता है
कल कहाँ बात खत्म हुई थी
दीमाग पर यह ज़ोर होता है इनका
और क्यों न हो
रोज नया पाठ जो शुरू करना होता है
सुबह सुबह इनके दर्शन होते है
दोपहर से शाम कहाँ गुजरी
कहाँ किसे पता होता है
शाम को जब ये लौटे
फिर कम्युनिकेटर का ही ख्याल होता है
कुछ इधर घूम , कुछ उधर घूम
रात को घर जब ये पहुंचे
फ़ोन बेचार कान पर लगा होता है
कहीं डाउन न हो जाए बैट्री
इसलिए फ़ोन चार्जर पर लगा होता है
इनके साथ जो जाग सके
इतना साहस हमसे कहाँ होता है
लाख इन्हे हम समझाये
लाख इन्हे हम धमकाए
जबान पर तव इनकी, ताला होता है
"कोई भी " नाम इनका पुकारे
नाम के आगे "मीठा" लगा होता है ...
--- अमित ०४/०३/२००८

Sunday, 2 March, 2008

नबाबी ठाठ...

ठाठो में है लाखो ठाठ

शौको में है लाखो शौक

अदाओं में है लाखों अदा

देर से आने की अदा

सबसे जुदा है ये अदा

और हो भी क्यों न

नबाबी है इसका अंदाज़

और लगता जैसे

बढ़ गया अपना रुबाब

बोला दोस्तों को साथ चलेंगे

पहुंचे जब सब

देखा नवाब सोये पडे है

किया वादा की नाश्ता साथ करेंगे

और दिखाई रात को दिए

जब उन्होंने हमे कहा

बस १० मिनट रुको

हम रुके तो ज़रूर

और घड़ी के घूमते काटे गिने

करते कोशिश है बहुत

करे खिचाई औरो को

और हमेशा ही उलटी पड़ी

देख उनकी झेप

चढती सबको मस्ती बडी

प्यारे ये हम सभी के है

आदत से मगर सब घबराते है

चाहे सब करे कितनी भी मिन्नत

"नबाब साब" अपने समय से ही आते है ...

--- अमित २/०३/०८

Friday, 29 February, 2008

मित्र हमारे ...

हमारे एक मित्र है
आदतों से जरा विचित्र है
जरा शौकीन से है इनके मिजाज़
और सब से अलग है इनका अंदाज़
अक्ल का झोला तो है इनके पास
पर एक गाँठ है उस पर लगा हुआ
खत्म उसके हो जाने से डरते है
इस लिए जरा संभल कर खरचते है
अमूमन हमारे साथ ही विचरते हैं
और अपनी खुराफातो से चर्चा में रहते है
कौन जाने हम से डरते है या बडा दिल रहते है
जो हर दम हमारी खिचाई चुपचाप सहते है
हिन्दी बोलने का शौक बहुत है
पर जबान दगा कर जाती है
जब भी देखो, बेचारी फिसल जाती है
शब्द भी उनसे मजाक करते है
आगे पीछे हो, दिमाग खराब करते है
श्रीमान कब श्रीमती में बदले
जनाब ख़ुद भूल जाते है
इधर - उधर का अंतर रोज हम बताते है
कृष्णा के ये परम भक्त है
और अनुकम्पा हनुमान की पाते है
लाख करे ये लीला, लाख करे ये कोशिश
गोपियों को जरा कम ही भाते है
ज्ञान इनका अपरम-पार है
गोपी ने नाम भर से ही सारा पता बताते है
समाचार पत्र भी इन्ही की दया का पात्र है
अरे एक बात तो हम भी भूल गए
दुसरे शौक और भी अजीब है
घड़ी घड़ी अपनी जुल्फों को बनाते है
आप बस फोटो का नाम ले
अनायस हाथ जुल्फों में उलझ जाते है
यो तो हिन्दी से नही ठीक इनका व्यवहार है
पर अतिशोक्ति अलंकार से इन्हे बडा प्यार है
इनके आगे जहाज भी घडे में डूब जाते हैं
और ये तैर कर किनारे आ जाते हैं
शौक तो आख़िर शौक ठहरे,
जाने कैसे कैसे हो जाते है
पर जनाब दिल से है "हीरे "
तभी तो है हर दिल में ठहरे...

Friday, 22 February, 2008

किसे पता ???

एक दिन मिले दो अजनबी
पास ज़रूर थी
कुछ- कुछ जाने पहचानो की भीड़ लगी
चंद पलों का ये साथ था
जीवन पर्यंत साथ रहने का शुरुआत था
क्या चंद पल पर्याप्त थे
किसे पता ???
कुछ दिन मेहमानों का मजमा लगा
खुशियाँ मनी , जश्न चला
और दो लोगो ने डरते-डरते
ढेरों उमांगो संग नवजीवन में प्रवेश किया
क्या होगा उन अरमानों का
किसे पता ???
सब अच्छा हो तो दिल खुश होता
कुछ लगे बुरा तो दिल रोता
दोनों चाहाते बस खुश रहना
पर क्या है वो जिससे सब ठीक रहता
किसे पता ???
--- अमित २५/०२/२००८

Tuesday, 19 February, 2008

जो है अधिकार मेरा !

क्यों मांगू मैं
भीख सा
जो है अधिकार मेरा !
क्यों स्विकारू मैं
दया सा
आत्म सम्मान है मेरा !
क्यों समझते हो
स्वं को
सबका सर्वेसर्वा !
मैं जन्मा नही
जन्मी हूँ मैं
तो कोई
अपराध नही है
एक मानव हूँ मैं
और अधिकार है मेरा
पाना एक मानव का सम्मान !
--- अमित १९/०२/२००८


Thursday, 14 February, 2008

पहला वैलेंटाइन डे ...

श्रीमती जी, अभी कुछ दिन हुए
ससुराल छोड़ , हमारे साथ आई
एअरपोर्ट उन्हें लेने जा
हमने भी पत्नी भक्ति दिखाई
यहाँ आ उनको लगा
नई आज़ादी उन्होंने पाई
जो लगते थे कभी कट गए
वो "पर" वापस निकल आए
दो दिन आराम करवा
उनको नए शहर की सैर कराई
देख कर खूबसूरती शहर की
वो खूब ही ह्र्षाई,और हमसे बोली
अब आसानी से घर नही जाऊँगी
चाहे जैसे रखो,
चुप-चाप आप के साथ रह जाऊँगी
हम भी खुश थे ,
वैसे भी अभी कहाँ अपने "घर" जाना था
श्रीमती जी नित नई फरमाइश ना करे
बस अपना इतना ही चाहना था
श्री मानो के चाहने से क्या होता है
परचम तो श्री मतियों का लहरा होता है
इसका आभास हमे कल हुआ
जब श्री मति जी ने पास आ प्यार से कहा
अजी कल का क्या प्रोग्राम है
हमने भी जरा लाड दिखाया और कहा
आप जे ओ बोले , बन्दा तो आप का गुलाम है
उन्होंने तव फरमाया , ठीक है
पहले तो डिस्को चलेंगे और फ़िर
रात का खाना बाहर करेंगे
अभी तक तो हम ठीक थे
ये सुन जरा घबरा गए
कल को ऐसा क्या "ख़ास " है
ये सवाल कर, आफत में आ गए
इस परवो जरा गरमा गई और
शेरनी सी धाड़ कर सामने आ गई
शादी होते ही सब भूल गए
प्यार के शौक चार दिन में धुल गए
कल "वैलेंटाइन डे" है , वो भी पहला
हम साथ में मनायंगे ,
जहाँ दिल चहयेगा , वहाँ जायेंगे
आवाज़ के रुख से समय को हम भाप गए
हमतो मजाक कर रहे थे , कह बात ताल गए
समझ गए थे , "संत वैलेंटाइन" तो गए स्वर्ग सिधार
और हम श्री मानो को छोड़ गए ये खेर्चे का त्यौहार ...
---- अमित १४/०२/२००८

Friday, 18 January, 2008

चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ ...

चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ
लौट चले अपने कल में
और आज को अपने भूल जाये
चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ
आज जीवन की रफ़्तार से थोडा थक चुके है
बीते कल में चलो झाँक आये
थी वहाँ जो जिन्दगी
चलो फिर एक बार उसे जी आये
चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ
तुम से प्यार करना तो जिन्दगी है
जीना हमे अभी बहुत है
दिल चाहता है इसकी शुरुआत से फिर मिल आये
चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ
तुम्हारे साथ यों तो हर लम्हा अनमोल है
चलो थोडा यादों का खजाना बटोर लाये
चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ
फुरसत में तो हमेशा ही साथ हम होते है
चलो आज वक़्त से कुछ लम्हे चुरा हम लाये
चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ
जिन्दगी की बातो पर बहुत मुस्काये है हम
चलो आज बिन बात कहकहे लगाए
चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ
इस दुनिया के साथ ही रहे अब तक हम
चलो आज दूर इस से कहीं निकल जाये हम
दिल कहता है
चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ हम ...
--- अमित १८/०१/२००८

Thursday, 3 January, 2008

यों मना नया साल ...

३१ दिसम्बर , दौडा आ रहा था
हर्षित तो हम भी थे
मगर कुछ को, कुछ जयादा ही हर्षा रहा था
मानो , इस बार पहली बार आ रहा था
प्लान थे, के रोज नए बन जाते थे
इस डिस्को नही , उस डिस्को जायेंगे
वो मयखाना अच्छा है,
जाम, अब तो वहीं छलकेंगे
खाने का क्या है, रोज ही तो खाते है
ये ख़ुशी के जाम है
कहाँ रोज-रोज छलकाए जाते है
पलक झपकते ही ३१ दिसम्बर की शाम आई
दिल की उमंगो ने ली एक मीठी अंगडाई
हमने भी सूट पहना, टाई लगाई
दोस्तों की मंडली भी सज- धज साथ में आई
दिल में उमेंगे ले हम डिस्को पहुंचे
देख के मंज़र वहाँ का,
ख़ुशी के "तारे जमीन पर" पहुचे
मयखाने का हाल और गज़ब था
वहाँ जा कोई "तिल" भी रखे
साहस ऐसा हम में किस ने दिया था
अपनी कलाई पर जब ध्यान गया
ग्यारह पर दस तव बज गया था
खाने को जब दौड़ लगाई
बची कुची साग - भाजी अपने हाथ आई
घर जब पहुचे , नया साल घर आ बैठा था
सूरते अपनी उतरी थी ,
और नया साल हम पर हँसता था
--- अमित ०३/०१/०८

Monday, 24 December, 2007

बचपन ...

सुबह सुबह
अलसाई आंखों से जो देखा
बगीचे में,
पोधों की पत्तियों पर
पड़ी ताज़ी ओस की बूँद सा
दिखाई दिया बचपन
ओस सा ताज़ा और पाक़
ऐसा ही होता है बचपन
नन्ही नन्ही सी बाहें फैलाये
छोटे से दिल मे ढेर सा प्यार लिए
आंखों में दुलार की आशा लिए
अपनी तुतलाती बोली से
मेरी बाहों में आने को
मुझे, बुलाता बचपन
मुझसे कुछ न माँगता
जरा है नादान अभी
बस थामे मेरी ऊँगली
चुप चाप साथ मेरे चलना चाहता, बचपन
पीछे मुड जब देखा, तो याद आया
जाने कहाँ अकेला छोड़ आया,
मैं अपना बचपन ...
--- अमित २४/१२/०७

Wednesday, 19 December, 2007

रिश्ता ...

रिश्ता ,
शब्द एक छोटा सा ,
और अर्थ
जटिल बडा
कुछ है जो
रिश्तो को जी ते है
तो कुछ
रिश्तों के साथ जी ते है
सच में
उसने हमारे रिश्ते को जिया
और यह एहसास
ना जाने कितनी बार मुझे हुआ
मैं ,
मैं भी कभी
रिश्ते के साथ नही जिया
बस , रिश्ते को ही जिया
पता नही ,
उसको क्यों लगा
मैंने कुछ गलत किया
समझाता, मैं क्या उसे
बदला, उसने मुझसे गलत लिया
छोड़ मुझे अकेला
दूसरी दुनिया का रुख उसने लिया ...
--- अमित १९/१२/२००७

Thursday, 15 November, 2007

कुछ ऐसा भी हो सकता है ...

उसने जन्म दिया एक बच्ची कों
और छोड दिया रेल की पटरी पर मरने कों
लोगो ने कहा, लड़की थी इस लिए छोड दिया
तो कुछ ने कहा , नाजायज औलाद थी
औलाद भी नाजायज होती है , पता नही था
कुदरत ने करिश्मा किया
और बच्ची कों जीवन दान दिया
किसी ने जा उसे अस्तपताल ने भर्ती किया
खुशियाँ मनाई गई , इश्वेर को धन्यवाद दिया
कुछ ने उसके माँ - बाप बुरा भला भी कहा
ये खबरें है , कहाँ छुप पाती है
ये तो जंगल की आग सी फ़ैल जाती है
कुछ लोग आज कतार में है
कुछ बे-औलाद है जो उसे पाने की आस में है
कोई उन से भी तो पूछे,
औलाद के बिना जिन्दगी कैसी हो जाती है
बच्चा तो कच्ची माटी है ,जैसा ढालो ढल जाती है
बेटा हो या बेटी सही परवरिश हो तो
सब के काम आती है ...
--- अमित १५/११/०७

Tuesday, 13 November, 2007

मैं सोच में हूँ ...

उसने जन्म दिया एक बच्ची कों
और छोड दिया रेल की पटरी पर मरने कों
लोगो ने कहा , नाजायज औलाद थी
औलाद भी नाजायज होती है , पता नही था
कुदरत ने करिश्मा किया
और बच्ची कों जीवन दान दिया
लोगो ने फिर कहा
"जाको राखे सैयाँ , मार सके न कोई "
किसी ने जा उसे अस्तपताल ने भर्ती किया
लोगो ने ख़ुशी मनाई और फिर किसी ने कहा
देखो , कितना नेक काम किया
अब इस कों अच्छा भविष्य मिलजायेगा
जाने क्यों , यह सुन मैं सोच मैं पड़ गया
माँ-बाप के होते बच्ची कहाँ सुरक्षित है
और कितना अच्छा भविष्य पाती है
ये तो अनाथ है , कितना आगे जायगे
कहीं ऐसा ना हो
किसी के हाथों बेच दी जाएगी ...
(कुछ दिन पहले एक ४ दिन की बच्ची रेल की पटरी पर मिली थी, उसकी खबर टीवी में सुन कर ये लिखा है होसकता है कुछ कों बुरा लगे , तो माफ़ी चाहूँगा)
--- अमित १३/११/०७

Wednesday, 31 October, 2007

SPICE-07

काम, काम और बस काम कर
आ जाता मन में नीरसता का भाव
काम के साथ जो मिल जाये; खेल की मस्ती
मन में होता नयी ऊर्जा का संचार
यही सोचकर हुआ SPICE-07 का आगाज़
शपथ ली गई न होगा खेल भावना का अपमान
बाहू बल को तोलने आ गए सब बीच मैदान
जीत होगी किस का , किसी को नही था ख्याल
बस सब को लेना है इसमे हिस्सा यह ही था ध्यान
स्पर्धा पर स्पर्धा आती गई और बढ़ता गया उत्साह
नीतियाँ बनने लगी, कैसे दिखाए अपना दम-ख़म
और देने लगी दिखाई टीम भावना से जो शक्ति आई
हर कोई खेल की मस्ती में डूब था ,
काम को मगर अपने , कोई न भुला था
दी गई थी जिस को जो जिम्मेदारिया
हर कोई उन सब पर खरा उतरा था
समय कैसे गुजरा , कब SPICE ख़त्म होने को आया
अच्छा प्रश्न है , इस का उत्तर कोई न दे पाया
SPICE तो ख़त्म होता है , इस का असर बाक़ी है
जिस को भी देखो , नयी ऊर्जा उसमे नज़र आती है ...
( नीरसता = No Excitement , उर्जा = Energy , बाहू बल = Strength, स्पर्धा = Event)
( For REF: SPICE is an event that took place in our company, full of sports and knowledge sharing.)
--- अमित ३१/१० /०७

Friday, 26 October, 2007

अधिकार और समर्पण ...

हमेशा अपना कहा
मुझे तुमने
और हमेशा अपना माना
तुम्हे मैंने
अंतर है क्या कुछ इस में ?
हाँ , अंतर है
"कहने " में अधिकार है
और "मानने" में समर्पण !
--- अमित २६/१०/०७

Tuesday, 23 October, 2007

जाने क्या सोच कर...

सारा कोताहल, मायूसी में बदल गया
जाने क्यों,
माँ के चेहरे पर भी उदासी आ गई
ये डर था या सच से घबरा गई
इस बार तो लड़का होना था
ये लड़की कैसे आ गई
अब क्या होगा,
फिर वही जिद्दोज़हद , वही परेशानी
सबको अपनी अपनी पड़ी थी
दादी तो जाने किन किन को कोस रही थी
और माँ, कुछ और सोच रही थी
डर था फिर नौ महीने ऐसे ही बिताएगी
बाप भी थोडा परेशान था
इस जमाने में लड़की को पालना कहाँ आसान था
लड़की पैदा होने का गम उसे ना सताता था
उसकी शादी कैसे होगी, यह डर अभी से आता था
बच्ची, इस सब से बहुत दूर माँ के करीब सोती थी
बाहर दादा बैठा था उसका,
बच्ची के पैदा होने की ख़ुशी बहुत उसे थी
जो उसके चेहरे से मालुम होती थी
दादा, बडा समझदार था
बदलते इस जमाने का पूरा उसे ख्याल था
लड़की अब कहाँ लड़को से मात खाती है
जहाँ देखो, लड़को से बाजी मार ले जाती है
दुनिया भी जाने कैसी सोच अपनाती है
लड़की से ही शुरू हुई है और उसी से कतराती है ...
(शायद आप में से कुछ को अजीब लगे, मगर जो मेरा अनुभव था वो कुछ ऐसा ही था।)
--- अमित २३/१०/०७

Monday, 22 October, 2007

भगवान् का फोन कॉल ...

ट्रिंग-ट्रिंग ट्रिंग-ट्रिंग
फ़ोन की घंटी बजी
मैंने "हैलो" बोला
और दूसरी तरफ
एक रोबदार आवाज ने
"कैसे हो" यह बोला
आवाज नयी थी
थोडा रोब से
हमने भी पूछा
हम तो ठीक है
मगर यह सवाल
किसने पूछा
आवाज थोडा गरमा गई
और गर्मी हम तक आ गई
हमे नही पहचानता
क्यों
क्या भगवान् को नही जानता
हम भी थोडा जोश में आगये
और फ़ोन पर ही टकरा गए
ज़ोर से कहा
भगवान् क्या फुरसत में है
जो हमसे टाइम-पास करने आ गए
पंडित जी ने कब उनको छोड़ दिया
और फोन की तरफ रुख कैसे मोड़ दिया
दूसरी तरफ से हंसी की आवाज आई
और कहा जानता थे तू मसखरा है
पर जैसा भी है दिल का खरा है
तेरी यह बात हमे बहुत भायी है
और तीन वर देने की इच्छा मन में आई है
शंका भरा एक प्रश्न तब हम ने दागा
करोगे हमारी इच्छा पूरी, रहा ये वादा
हमारी शक्ति को परखता है,
चलो वचन दिया, जो तुम ने कहा वो होगा
फ़ोन के दूसरी तरफ से इन शब्दों को मैंने सुना
धड़ाधड़ तीन वचन हमने माँग डाले
दुनिया में शांति हो ,
दुनिया में भेद-भाव न हो ,
दुनिया में सब के पास काम हो,
जिन को सुन फ़ोन काट भगवान् भागे
कुछ देर बाद एक एस-ऍम-एस आया
तुम इंसान हो, कभी नही सुधर पाओगे
ये कोई भगवान् नही दे सकता
खुद मेहनत, लगन और इमानदारी
इन तीनो से प्रयास करो तब ही पाओगे
घरन-घरन फिर घंटी बज रही थी
अब कब यो ही तक सोते रहोगे
माँ की आवाज कानो गूँज रही थी
उठे तो रात का सपना याद आया
होठो पे मुस्कान तैर रही थी
अपने लिए कुछ करने की नयी राह दीख रही थी ...
--- अमित २२/१०/०७

Wednesday, 17 October, 2007

सिफर ...

तुम्हारे लिए,मैं क्या हूँ
बस, एक सिफर
इस से ज्यादा,
कभी समझा है तुम ने
हर मुकाम, हर मंज़िल
एक सिफर ही है माना
सही है, तुम ने हमे जो माना
सिफर तो कहा तुमने
इसकी ताकत को मगर ना जाना
ये सिफर ही है ,
जीवन जिस से शुरू हुआ
ये सिफर ही है,
अंक ज्ञान जिस से बना
सिफर से ही ,
विज्ञान ने गति पाई
और सिफर ही था
जिस से दुनिया सितारों तक पहुंच पाई
अभी अंधरे में हो
सिफर को कहाँ जान पाओगे
आंखें जब खुलेगी
खुद दौड़ हमारे पास आओगे ...
--- अमित १७/१०/०७


Tuesday, 16 October, 2007

दर्द ...

किसी ने कहा ,
दर्द से जो निकलते है
वो नगमें ,
सबसे मीठे होते
हैं
देखो तो ,
सच ही लगता हैं
कुछ तो,
कुछ तो कशिश हैं दर्द में
जिसे देखो ,
बस अपनी ओर खींचता हैं
बडा अपनापन,
दर्द के मारो में होता हैं
एक का दर्द,
दुसरे की आंख से बरसता हैं
मेरे दिल में भी,
एक दर्द बसता हैं
रह रह कर जो ,
मेरे शेरो में झलकता हैं ,
बिन दर्द के ,
ये ग़ज़ल कहॉ बन पाती हैं
खुशियाँ हो या ना हो,
दर्द हर एक दिल का साथी हैं ...
--- अमित १६/१०/०७

Thursday, 11 October, 2007

व्यस्त दिन ...

हुई सुबह , दिन निकला
निगाह डाली कलाई पर
अलसाई आंखों से देखा
लगा थोडा जल्दी निकला
अभी बजा ही क्या था
छोटा कांटा आठ और
बड़ा बारह पर ही तो अटका था
ज़रा क़मर सीधी कर ले
यही सोच कर मैं लेटा था
ना जाने कब बिस्तर छोडा
और दफ्तर पहुँचा
अभी पहुँचा तो बस सुना
दस का आखरी घंटा
दीवार टगी घड़ी से बजा
अभी बस्ता रख , कंप्यूटर खोला
महसूस हुआ पीछे से कोई
काफ़ी को चलो बोला
घड़ी देखी, समय ठीक था
ग्यारह बजे काफ़ी ब्रेक था
पौन-एक घंटा काफ़ी पर
इधर-उधर का कुछ-कुछ बतियाया
थोडा जा ई-मेल पढी
तो टिफिन ले मेरा दोस्त आया
लंच तो करना ही है
एक घंटा हमने लंच का छोडा है
आख़िर पेट के लिए तो लडाई लड़ी है
अब चलो बहुत हुआ
थोडा काम करे , सोचना शुरू हुआ
ना जाने लगता क्यों है
कुछ उबासी आई और
शरीर में सुस्ती सी छाई
चलो चार बजे है
एक चाय पिए और काम करे
एक दोस्त को हम ने फरमाया
वो दोस्त दो को और अपने साथ ले आया
पांच बजे वो चाय हुई और
डेस्क का रास्ता सब को याद आया
थोडा थोडा तेज हाथ चले
गरम चाय का जोश काम आया
जेब में फिर फ़ोन बजा
जिम अब तुम्हे है जाना
जोर जोर बजते अलार्म ने कहा
काम बहुत होता है
सेहत का ख्याल ज़रूरी है
छः बज चुके है
दफ्तर का समय खत्म हुआ
दीमाग थक चूका है
आज दफ्तर में बहुत काम हुआ ...
(समझदार को इशारा काफी )
--- अमित ११/१०/०७

Wednesday, 10 October, 2007

सम्मान ...

क्यों होता है ऐसा
करते सब है एक सा
मगर कोई याद रहता
और कोई भुला दिया जाता
कुर्बानी तो सब देते हैं
कोई इतिहास बन जाता
और कोई इतिहास में खो जाता
किसी के पसीने की बूंदे गिरे
तो दुनिया में जोश दौड़ जाता
और किसी का ख़ून भी बह जाये
तो लोगो के माथे पर शिकन ना आता
शहीद हुए थे वो तो , शहीद हुए थे ये भी
फिर क्यों एक का जन्म दिन और पुण्य तिथि
हम सब को हमेशा याद दिलाया जाता
और दूजे की समाधि पर कोई फूल ना चढाया जाता
आख़िर ऐसा क्यों है
क्यों अपने लोगो में भेद भाव किया है जाता
किस की है गलती, किस को दे दोष
हमी है जिसने किया ये फैसला है
ये एक फैसला भर ही है
क्या ये बदला नही जा सकता
है जो जिस सम्मान का अधिकारी
उसे वो सम्मान नही दिया जा सकता ?
--- अमित १०/१०/०७

Monday, 1 October, 2007

ज़माना साथ आ गया...

पल पर पल गुजरते गये
और मिनट, घंटो में बदलते गये
दिन ना जाने कब शुरू हुआ
और कब रात ख़त्म हुई
समय यों ही बीतता गया
और महीने साल हो गये
अब तो याद भी
नही कैसे हुआ था सफ़र एक
इक हल्का सा धुंधलका; बस बाक़ी है
कब जुबां खामोश होती चली गई

और कब दिल बोलने लगा
महफ़िलें , तनहाइयों में तब्दील हो गयीं
अकेलापन, तो खुद से घबरा गया
और चुपके से शायरी के पहलू में आ गया
जाने कैसे यह सफ़र हमे रास आ गया
हम तीनो साथ चले थे कभी
आज देखा तो ज़माना साथ आ गया ...
--- अमित ०१/१०/०७

Sunday, 23 September, 2007

ऐसे क्यों है हम ...

ये नया दौर है
नया ज़माना
भूले हम सब
जो भी हुआ पुराना
खाना बदला
पीना बदला
बदला है पहनावा
जीवन बदला
बदले गये नाम
बदले आचार- विचार
और बदल दी भाषा
हिन्दी हो सब भूल गये
आधो को इंग्लिश ने न अपनाया
डूबतो को तब दिया
"हिंग्लिश" ने सहारा
हिंग्लिश अब
हिन्दी से ज्यादा बोली जाती है
और इसे बोल
दुनिया बहुत इतराती है
"नमस्कार" को सब भूल गये
हॉय-बाय अब काम आती है
माँ-पिता का पता नही
मॉम- डैड अब मिल जाते है
चाचा-ताऊ, मामा-मौसा किस के है
अंकल हर गली में मिल जाते है
ये हम ही क्यों ऐसे है
जो कुछ सही से ना अपना पाते है
अपनी संस्कृति तो छोड़ चुके
और दुसरी को अपना नही पाते है ...
--- अमित २३/०९/०७

Thursday, 20 September, 2007

बे-व्फाई

मैं बे-वफा हरगिज़ ना था
की थी मैंने भी वफा
जो मैं दिखा ना सका
दीवाना मुझे करार किया था
थीं मेरी कुछ मजबुरिया
हर कदम पर जिसने
लाचार मुझे किया था
तुम तो थी
जिसे हम पर पूरा यकीन था
फिर क्यों किया ऐसा
तुमने किया मुझे क्यों रुसवा
क्यों तुम ने वो सब सच माना
जो कभी हुआ न था
ऐसा क्या था दुनिया की बातों में
जो पल सारा विश्वास डोल गया
तुम तो करती इंतज़ार
तुम तो रखती हम पर एतबार
दुनिया का किसे डर था
किसे थी परवाह दुनिया की
मजबुरिया कब तक रास्ता रोकती
दुनिया कब तब आड़े आती
तुम साथ जो हमारा देती
कुछ भी जहाँ में होता
आख़िर जीत हमारी होती ...


--- अमित २२/०९/०७

Wednesday, 19 September, 2007

ए वक़्त ...

ए वक़्त ज़रा ठहर जा,
अभी तो हसरतें बाक़ी हैं।
रात अभी जवान हुई है,
इसका घूँघट अभी बाक़ी है।
शमा तो बस अभी जली ही है,
परवाने का जलना अभी बाक़ी है।
उनकी जुल्फें तो अभी खुली हैं,
जुल्फों का बिखरना अभी बाक़ी है।
अभी तो पैमाने से पी है,
आंखों के जाम अभी बाक़ी हैं।
लब तो अभी सिले हुऐ हैं,
उनसे अरमान निकलना अभी बाक़ी है।
अभी तो हम होश में है,
मदहोश होना अभी बाक़ी है।
ए वक़्त तू अभी जता कहॉ है,
उनमे हया अभी बाक़ी है।
निकल ने दे दिलों के अरमान,
किसे पता जिन्दगी कितनी अभी बाक़ी है...
( अपनी शरीकेहयात के लिए )
--- अमित २९/०३/०७

Tuesday, 18 September, 2007

सोचते है ...

हो गई उनसे फिर
आज राह में मुलाक़ात
था जिसका हमे डर
हो गई वोही बात
पान चबाते , कुर्ता पहने
दूर से चले आते थे
देख उनको हम
मन ही मन घबराते थे
कोशिश थी
उनकी निगाह ना पडे हम पर
यह सोच, इधर-उधर
छिपने की जगह हम तलाशते थे
मगर वो भी साहब
कयामत की नज़र रखते है
जिस कोने में हम छुपे थे
सीधे वहीँ रुके थे
हाथ में था उनका झोला
उसे देख चक्कर खा
दिल हमारा डोला
पता था, घंटो हम सताये जायेंगे
हिम्मत नही है, हममे इतनी
कैसे उनकी शायरी झेल पायेंगे
अपनी हालात देख
बीता समय याद आता है
अपने दोस्तो का
हमसे कतराना समझ आता है
ढाया है हमने,
उन पर सितम बडा
अब वो सोच,
उनकी हालत पर तरस आता है
सच ही कहा है, किसी ने लोगो
अपना करा सामने आता है ...
( अपने दोस्तो के लिए जिन पर मैं अत्याचार किया )
--- अमित १९/०९/०७

Monday, 17 September, 2007

तेरे दामन मे ...

ये जो जिन्दगी है
बहुत ही अजीब है ,
जिसने कहा,
मैं समझता हूँ
तुझे ए जिन्दगी
ख़ूब हंसती है
उस पर ये जिन्दगी
हम ने सोचा
आज तो पत्थर मिलेंगे ,
डूबे दिल से निकले
और मोड़ पर हम को
अपनी बाहों में भरते
दो हाथ मिले
मायूस बैठे थे
दूर जा खुद से भी
छिपे बैठे थे
आया मीठी यादों का झोंका
दिल में हुई गुदगुदी
और अपनी आंखों में
यादों की नमी ले बैठे
सच है ,
बहुत कुछ है तेरे दामन मे
ए जिन्दगी
हमे बहुत मिला है
हमे बहुत मिलेगा
फिर भी ना जाने क्यों
हम चिन्ता कर बैठे ...
(समीर लाल जी को समर्पित , कुछ यादें ताजा करने पर )
--- अमित १७/०९/०७

Sunday, 16 September, 2007

दिल के पास ...

रहते हैं जब पास हमारे
ख़ूब हंसाते , ख़ूब धमाल कराते है
जाते है जब दूर ज़रा
भावनाओं में दूर बहा ले जाते है
जलाती है जब भी जिन्दगी की धुप हमे
छाया बन हमारे साथ साथ आते है
छाता है जब भी निराशा का अँधेरा
आशा का दीप ये जलाते है
नाम नही कोई इनके रिश्ते का
कभी बंधु, कभी दोस्त
कभी सारथी, कभी गुरू
रुप-रुप में ये मिल जाते
रहे चाहे कहीँ भी
मगर दिल के बहुत पास आ जाते हैं ...
--- अमित 16/09/०७

Friday, 14 September, 2007

तुमने ...


हर उम्मीद को

ना-उम्मीद में बदला है तुमने,
हर आस को

निराश किया है तुमने ,

झटका है हमेशा ही तुमने

बढाया जब भी हाथ हमने,

बदला है तुमने तकरार में

की जब भी कुछ बात हमने,

की जो हमने कुर्बानियाँ

दिया नाकामियाँ नाम तुमने,

ना आए तुम पर आंच

इस लिए चुप रहे हम

और बदनाम किया

हमे गली-गली तुमने,

टूट तो हम चुके थे

चूर-चूर किया है तुमने,

हमारे प्यार को

खेल कहा है तुमने

और अपनी दिल्लगी को

मोह्बत पुकार है तुमने,

बंद किए मेरे लिए

सब रास्ते तुमने

और देख अब भी खोला है

तेरे लिए दिल का दरवाजा हमने ...
- अमित १४/०९/०७

Tuesday, 11 September, 2007

हम है सूत्रधार ...


आता जब भी कोई काम नया

छोटा हो या चाहे हो बड़ा
रखी है हमने नींव उसकी

और दिया है मज़बूत आधार

बनाये रास्ते, दिया माहौल

ना आये कोई अड़चन

और अच्छे से चले हर काम

खोजे हमेशा वो रास्ते

मिनटों में ख़त्म हो

जिससे घंटों के काम
पेश आई जब भी कोई मुश्किल

निरंतर किया हमने काम

और किसी ना होने दिया कोई नुकसान

मांगी जब भी किसी ने मदद

हाथ बढा कर दिया हमने साथ

कोई भी रहा हो लक्ष्य

किया पूरा हमने हर काम

परदे के पीछे रहते है

हर काम के हम है सूत्रधार

और सी-सी-डी है अपना नाम ...

( अपनी टीम के नाम )


--- अमित ११/०९/०७



११ सितम्बर ...


रोज सा दिन निकला था वो भी

रोज से काम में लगे थे सभी

रोज सी ही हर तरफ सरगर्मी थी

सब कुछ ही तो था रोज सा

बस पल में सब कुछ बदल गया

जो हँसता-गाता था पल भर पहले

क्षण में गम़गीनियो में तब्दील हो गया

समझ किसी को कुछ भी ना आया

जो जहाँ था जड़ रह गया

कुछ हो पाता , इस से पहले

जो था शहर; वो शमशान हो गया

वो जो-जो मरा था

वो ना हिंदू था, ना मुस्लमान था

वो ना था सिख, ना इसाई था

जिसने अपनी जान गवाई थी

बस एक इंसान वो था

जिस ने था उसको मारा

उसका कोई मज़हब न था

वो कोई इंसान ना था

हुआ उस दिन इंसानियत का कत्ल था

याद उसको कर के आज भी

दिल अपने दहल जाते है

कुछ अपने, कुछ बेगानो की याद में

अपनी आंखों में अंशु भर आते है

आओ साथ उठे और करे प्र्यतन

शान्ति का अभियान हम विश्व में चलायेंगे

हम सब जानते है दुसरा ११ सितम्बर हम न सहपायेंगे ...


(११ सितम्बर को अपने जान गवाने वालो को श्रद्धा नमन )


--- ११ /०९/२००७

Monday, 10 September, 2007

भाषा ज्ञान ...


जब स्कूल को हम जाते थे

भाषाओं की कक्षाओं से हमेशा घबराते थे

हिन्दी के थे याद

चार दोहे, दो छन्द और दो चोपाई

बुरे वक्त पडे तो बहुत काम आते थे

अंग्रेजी को शक्ल हमारी ना भाती थी

भूतकाल की किर्या हमेशा वर्तमान में याद आती थी

गणित-विज्ञान में जरा अच्छे थे

इसी कारण मास्टर जी को थोड़ा जचते थे

गणित- विज्ञान में बच जाते थे

और भाषा की कक्षा में रोज लताडे जाते थे

कहते थे मास्टर जी,

गणित-विज्ञान से देश के काम तो आओगे

बगैर भाषा ज्ञान के दूर ना ज्यादा जा पाओगे

भाषा से आते है संस्कार

और होता है संस्कृति का ज्ञान

संस्कार को जो आचरण में लाओगे

तभी अपनी ज्ञान-संस्कृति को दूर तलक फैला पाओगे

आज, याद उनके आते हमे बोल है

देखते जब अपने देश ही हालत डामदोल हैं

पकड़ते है कान अपने

अपने बच्चो के साथ ऐसा ना होने देंगे

उन्हें भाषा का अच्छा ज्ञान कराएंगे ....


--- अमित १०/०९/०७

Friday, 7 September, 2007

गागर में भरती सागर ...

बात हो अगर शब्दों की
तरकश में इनके कमी नही
दिखती थी जैसे
अर्जुन को आंख उस चिडि़या की
निशाना इनका भी अचूक रहता है
एक एक शब्द है सधा हुआ
आपना निशाना लिया हुआ
किस शब्द को कहॉ मिलेगा मान
और कहॉ आएगी उस से जान
इन सब बातों का है;उनको गूढ़ ज्ञान
अगर करुंगा मैं शब्दों जा ज्यदा इस्तमाल
शायद होगा वो उनका अपमान
गागर में सागर यें भरती है
चन्द शब्दों में बड़ी बात कहती है यें
"रचना" है इनका नाम ...

--- अमित ०६/०७/०९

Thursday, 6 September, 2007

सच का स्वाद...

क्यों ऐसा होता है
सच का स्वाद,
ज़रा कड़वा होता है
कहते हम हैं; सच बोलो
जब दीखता हमे कोई; आईना है
दुश्मन वो अपना हो जाता है
उसके बोल
कोडों से तन पर पड़ते है
देख उसे
आंखों में लहू दौड़ आता है
साथ खडे हो उसके तो
साँसों बोझिल हो जाती है
भीड़ में भी रह कर
वो अक्सर तन्हा क्यों हो जाता है
जो होता था कल तक प्यारा
क्यों अजनबी सा दुबारा हो जाता है
याद मगर उसकी तव आती है
जब ठोकर खा टूटा भ्रम हमारा होता है
--- अमित ०६ /०९/०७

चिट्ठाकारी को अल्प-विराम और सुनीता (शानू) ...

हाँ; तो दोस्तो
एक हैं सुनीता जी,
इस चिट्ठाकारी की दुनिया की
एक जानी-मानी हस्ती !
कोई नही यहाँ पर
पढ़ता जो ना ब्लोग आप का
रोज -रोज आकर !
गुड सी मीठी इनकी कविता
बरबस ही हम सब का मन
उनको पढने को करता !
अभी गये दिनों
मानव कर्तव्यों ने इनको पुकारा
और देते हुए उनको मान
दे दिया आप ने
चिट्ठाकारी को अल्प-विराम
और सब को कह दिया; अलविदा !
ये चिट्ठाकारी भी; अज़ब बिमारी है
लग जाये तो; सब पर पड़ती भारी है
आप भी इस से बच ना पाई है
दो-दो कर्तव्यों का भार लिए
वापस येँ, हम लोगो के लिए आई है
हम भी पाठक धर्म निभायगे करते है वादा, रोज आपकी कविता पढने आएंगे ...
(सुनीता जी की वापसी पर)
--- अमित ०६/०९/०७