Monday, December 24, 2007

बचपन ...

सुबह सुबह
अलसाई आंखों से जो देखा
बगीचे में,
पोधों की पत्तियों पर
पड़ी ताज़ी ओस की बूँद सा
दिखाई दिया बचपन
ओस सा ताज़ा और पाक़
ऐसा ही होता है बचपन
नन्ही नन्ही सी बाहें फैलाये
छोटे से दिल मे ढेर सा प्यार लिए
आंखों में दुलार की आशा लिए
अपनी तुतलाती बोली से
मेरी बाहों में आने को
मुझे, बुलाता बचपन
मुझसे कुछ न माँगता
जरा है नादान अभी
बस थामे मेरी ऊँगली
चुप चाप साथ मेरे चलना चाहता, बचपन
पीछे मुड जब देखा, तो याद आया
जाने कहाँ अकेला छोड़ आया,
मैं अपना बचपन ...
--- अमित २४/१२/०७

Wednesday, December 19, 2007

रिश्ता ...

रिश्ता ,
शब्द एक छोटा सा ,
और अर्थ
जटिल बडा
कुछ है जो
रिश्तो को जी ते है
तो कुछ
रिश्तों के साथ जी ते है
सच में
उसने हमारे रिश्ते को जिया
और यह एहसास
ना जाने कितनी बार मुझे हुआ
मैं ,
मैं भी कभी
रिश्ते के साथ नही जिया
बस , रिश्ते को ही जिया
पता नही ,
उसको क्यों लगा
मैंने कुछ गलत किया
समझाता, मैं क्या उसे
बदला, उसने मुझसे गलत लिया
छोड़ मुझे अकेला
दूसरी दुनिया का रुख उसने लिया ...
--- अमित १९/१२/२००७

Thursday, November 15, 2007

कुछ ऐसा भी हो सकता है ...

उसने जन्म दिया एक बच्ची कों
और छोड दिया रेल की पटरी पर मरने कों
लोगो ने कहा, लड़की थी इस लिए छोड दिया
तो कुछ ने कहा , नाजायज औलाद थी
औलाद भी नाजायज होती है , पता नही था
कुदरत ने करिश्मा किया
और बच्ची कों जीवन दान दिया
किसी ने जा उसे अस्तपताल ने भर्ती किया
खुशियाँ मनाई गई , इश्वेर को धन्यवाद दिया
कुछ ने उसके माँ - बाप बुरा भला भी कहा
ये खबरें है , कहाँ छुप पाती है
ये तो जंगल की आग सी फ़ैल जाती है
कुछ लोग आज कतार में है
कुछ बे-औलाद है जो उसे पाने की आस में है
कोई उन से भी तो पूछे,
औलाद के बिना जिन्दगी कैसी हो जाती है
बच्चा तो कच्ची माटी है ,जैसा ढालो ढल जाती है
बेटा हो या बेटी सही परवरिश हो तो
सब के काम आती है ...
--- अमित १५/११/०७

Tuesday, November 13, 2007

मैं सोच में हूँ ...

उसने जन्म दिया एक बच्ची कों
और छोड दिया रेल की पटरी पर मरने कों
लोगो ने कहा , नाजायज औलाद थी
औलाद भी नाजायज होती है , पता नही था
कुदरत ने करिश्मा किया
और बच्ची कों जीवन दान दिया
लोगो ने फिर कहा
"जाको राखे सैयाँ , मार सके न कोई "
किसी ने जा उसे अस्तपताल ने भर्ती किया
लोगो ने ख़ुशी मनाई और फिर किसी ने कहा
देखो , कितना नेक काम किया
अब इस कों अच्छा भविष्य मिलजायेगा
जाने क्यों , यह सुन मैं सोच मैं पड़ गया
माँ-बाप के होते बच्ची कहाँ सुरक्षित है
और कितना अच्छा भविष्य पाती है
ये तो अनाथ है , कितना आगे जायगे
कहीं ऐसा ना हो
किसी के हाथों बेच दी जाएगी ...
(कुछ दिन पहले एक ४ दिन की बच्ची रेल की पटरी पर मिली थी, उसकी खबर टीवी में सुन कर ये लिखा है होसकता है कुछ कों बुरा लगे , तो माफ़ी चाहूँगा)
--- अमित १३/११/०७

Wednesday, October 31, 2007

SPICE-07

काम, काम और बस काम कर
आ जाता मन में नीरसता का भाव
काम के साथ जो मिल जाये; खेल की मस्ती
मन में होता नयी ऊर्जा का संचार
यही सोचकर हुआ SPICE-07 का आगाज़
शपथ ली गई न होगा खेल भावना का अपमान
बाहू बल को तोलने आ गए सब बीच मैदान
जीत होगी किस का , किसी को नही था ख्याल
बस सब को लेना है इसमे हिस्सा यह ही था ध्यान
स्पर्धा पर स्पर्धा आती गई और बढ़ता गया उत्साह
नीतियाँ बनने लगी, कैसे दिखाए अपना दम-ख़म
और देने लगी दिखाई टीम भावना से जो शक्ति आई
हर कोई खेल की मस्ती में डूब था ,
काम को मगर अपने , कोई न भुला था
दी गई थी जिस को जो जिम्मेदारिया
हर कोई उन सब पर खरा उतरा था
समय कैसे गुजरा , कब SPICE ख़त्म होने को आया
अच्छा प्रश्न है , इस का उत्तर कोई न दे पाया
SPICE तो ख़त्म होता है , इस का असर बाक़ी है
जिस को भी देखो , नयी ऊर्जा उसमे नज़र आती है ...
( नीरसता = No Excitement , उर्जा = Energy , बाहू बल = Strength, स्पर्धा = Event)
( For REF: SPICE is an event that took place in our company, full of sports and knowledge sharing.)
--- अमित ३१/१० /०७

Friday, October 26, 2007

अधिकार और समर्पण ...

हमेशा अपना कहा
मुझे तुमने
और हमेशा अपना माना
तुम्हे मैंने
अंतर है क्या कुछ इस में ?
हाँ , अंतर है
"कहने " में अधिकार है
और "मानने" में समर्पण !
--- अमित २६/१०/०७

Tuesday, October 23, 2007

जाने क्या सोच कर...

सारा कोताहल, मायूसी में बदल गया
जाने क्यों,
माँ के चेहरे पर भी उदासी आ गई
ये डर था या सच से घबरा गई
इस बार तो लड़का होना था
ये लड़की कैसे आ गई
अब क्या होगा,
फिर वही जिद्दोज़हद , वही परेशानी
सबको अपनी अपनी पड़ी थी
दादी तो जाने किन किन को कोस रही थी
और माँ, कुछ और सोच रही थी
डर था फिर नौ महीने ऐसे ही बिताएगी
बाप भी थोडा परेशान था
इस जमाने में लड़की को पालना कहाँ आसान था
लड़की पैदा होने का गम उसे ना सताता था
उसकी शादी कैसे होगी, यह डर अभी से आता था
बच्ची, इस सब से बहुत दूर माँ के करीब सोती थी
बाहर दादा बैठा था उसका,
बच्ची के पैदा होने की ख़ुशी बहुत उसे थी
जो उसके चेहरे से मालुम होती थी
दादा, बडा समझदार था
बदलते इस जमाने का पूरा उसे ख्याल था
लड़की अब कहाँ लड़को से मात खाती है
जहाँ देखो, लड़को से बाजी मार ले जाती है
दुनिया भी जाने कैसी सोच अपनाती है
लड़की से ही शुरू हुई है और उसी से कतराती है ...
(शायद आप में से कुछ को अजीब लगे, मगर जो मेरा अनुभव था वो कुछ ऐसा ही था।)
--- अमित २३/१०/०७

Monday, October 22, 2007

भगवान् का फोन कॉल ...

ट्रिंग-ट्रिंग ट्रिंग-ट्रिंग
फ़ोन की घंटी बजी
मैंने "हैलो" बोला
और दूसरी तरफ
एक रोबदार आवाज ने
"कैसे हो" यह बोला
आवाज नयी थी
थोडा रोब से
हमने भी पूछा
हम तो ठीक है
मगर यह सवाल
किसने पूछा
आवाज थोडा गरमा गई
और गर्मी हम तक आ गई
हमे नही पहचानता
क्यों
क्या भगवान् को नही जानता
हम भी थोडा जोश में आगये
और फ़ोन पर ही टकरा गए
ज़ोर से कहा
भगवान् क्या फुरसत में है
जो हमसे टाइम-पास करने आ गए
पंडित जी ने कब उनको छोड़ दिया
और फोन की तरफ रुख कैसे मोड़ दिया
दूसरी तरफ से हंसी की आवाज आई
और कहा जानता थे तू मसखरा है
पर जैसा भी है दिल का खरा है
तेरी यह बात हमे बहुत भायी है
और तीन वर देने की इच्छा मन में आई है
शंका भरा एक प्रश्न तब हम ने दागा
करोगे हमारी इच्छा पूरी, रहा ये वादा
हमारी शक्ति को परखता है,
चलो वचन दिया, जो तुम ने कहा वो होगा
फ़ोन के दूसरी तरफ से इन शब्दों को मैंने सुना
धड़ाधड़ तीन वचन हमने माँग डाले
दुनिया में शांति हो ,
दुनिया में भेद-भाव न हो ,
दुनिया में सब के पास काम हो,
जिन को सुन फ़ोन काट भगवान् भागे
कुछ देर बाद एक एस-ऍम-एस आया
तुम इंसान हो, कभी नही सुधर पाओगे
ये कोई भगवान् नही दे सकता
खुद मेहनत, लगन और इमानदारी
इन तीनो से प्रयास करो तब ही पाओगे
घरन-घरन फिर घंटी बज रही थी
अब कब यो ही तक सोते रहोगे
माँ की आवाज कानो गूँज रही थी
उठे तो रात का सपना याद आया
होठो पे मुस्कान तैर रही थी
अपने लिए कुछ करने की नयी राह दीख रही थी ...
--- अमित २२/१०/०७

Wednesday, October 17, 2007

सिफर ...

तुम्हारे लिए,मैं क्या हूँ
बस, एक सिफर
इस से ज्यादा,
कभी समझा है तुम ने
हर मुकाम, हर मंज़िल
एक सिफर ही है माना
सही है, तुम ने हमे जो माना
सिफर तो कहा तुमने
इसकी ताकत को मगर ना जाना
ये सिफर ही है ,
जीवन जिस से शुरू हुआ
ये सिफर ही है,
अंक ज्ञान जिस से बना
सिफर से ही ,
विज्ञान ने गति पाई
और सिफर ही था
जिस से दुनिया सितारों तक पहुंच पाई
अभी अंधरे में हो
सिफर को कहाँ जान पाओगे
आंखें जब खुलेगी
खुद दौड़ हमारे पास आओगे ...
--- अमित १७/१०/०७


Tuesday, October 16, 2007

दर्द ...

किसी ने कहा ,
दर्द से जो निकलते है
वो नगमें ,
सबसे मीठे होते
हैं
देखो तो ,
सच ही लगता हैं
कुछ तो,
कुछ तो कशिश हैं दर्द में
जिसे देखो ,
बस अपनी ओर खींचता हैं
बडा अपनापन,
दर्द के मारो में होता हैं
एक का दर्द,
दुसरे की आंख से बरसता हैं
मेरे दिल में भी,
एक दर्द बसता हैं
रह रह कर जो ,
मेरे शेरो में झलकता हैं ,
बिन दर्द के ,
ये ग़ज़ल कहॉ बन पाती हैं
खुशियाँ हो या ना हो,
दर्द हर एक दिल का साथी हैं ...
--- अमित १६/१०/०७

Thursday, October 11, 2007

व्यस्त दिन ...

हुई सुबह , दिन निकला
निगाह डाली कलाई पर
अलसाई आंखों से देखा
लगा थोडा जल्दी निकला
अभी बजा ही क्या था
छोटा कांटा आठ और
बड़ा बारह पर ही तो अटका था
ज़रा क़मर सीधी कर ले
यही सोच कर मैं लेटा था
ना जाने कब बिस्तर छोडा
और दफ्तर पहुँचा
अभी पहुँचा तो बस सुना
दस का आखरी घंटा
दीवार टगी घड़ी से बजा
अभी बस्ता रख , कंप्यूटर खोला
महसूस हुआ पीछे से कोई
काफ़ी को चलो बोला
घड़ी देखी, समय ठीक था
ग्यारह बजे काफ़ी ब्रेक था
पौन-एक घंटा काफ़ी पर
इधर-उधर का कुछ-कुछ बतियाया
थोडा जा ई-मेल पढी
तो टिफिन ले मेरा दोस्त आया
लंच तो करना ही है
एक घंटा हमने लंच का छोडा है
आख़िर पेट के लिए तो लडाई लड़ी है
अब चलो बहुत हुआ
थोडा काम करे , सोचना शुरू हुआ
ना जाने लगता क्यों है
कुछ उबासी आई और
शरीर में सुस्ती सी छाई
चलो चार बजे है
एक चाय पिए और काम करे
एक दोस्त को हम ने फरमाया
वो दोस्त दो को और अपने साथ ले आया
पांच बजे वो चाय हुई और
डेस्क का रास्ता सब को याद आया
थोडा थोडा तेज हाथ चले
गरम चाय का जोश काम आया
जेब में फिर फ़ोन बजा
जिम अब तुम्हे है जाना
जोर जोर बजते अलार्म ने कहा
काम बहुत होता है
सेहत का ख्याल ज़रूरी है
छः बज चुके है
दफ्तर का समय खत्म हुआ
दीमाग थक चूका है
आज दफ्तर में बहुत काम हुआ ...
(समझदार को इशारा काफी )
--- अमित ११/१०/०७

Wednesday, October 10, 2007

सम्मान ...

क्यों होता है ऐसा
करते सब है एक सा
मगर कोई याद रहता
और कोई भुला दिया जाता
कुर्बानी तो सब देते हैं
कोई इतिहास बन जाता
और कोई इतिहास में खो जाता
किसी के पसीने की बूंदे गिरे
तो दुनिया में जोश दौड़ जाता
और किसी का ख़ून भी बह जाये
तो लोगो के माथे पर शिकन ना आता
शहीद हुए थे वो तो , शहीद हुए थे ये भी
फिर क्यों एक का जन्म दिन और पुण्य तिथि
हम सब को हमेशा याद दिलाया जाता
और दूजे की समाधि पर कोई फूल ना चढाया जाता
आख़िर ऐसा क्यों है
क्यों अपने लोगो में भेद भाव किया है जाता
किस की है गलती, किस को दे दोष
हमी है जिसने किया ये फैसला है
ये एक फैसला भर ही है
क्या ये बदला नही जा सकता
है जो जिस सम्मान का अधिकारी
उसे वो सम्मान नही दिया जा सकता ?
--- अमित १०/१०/०७

Monday, October 1, 2007

ज़माना साथ आ गया...

पल पर पल गुजरते गये
और मिनट, घंटो में बदलते गये
दिन ना जाने कब शुरू हुआ
और कब रात ख़त्म हुई
समय यों ही बीतता गया
और महीने साल हो गये
अब तो याद भी
नही कैसे हुआ था सफ़र एक
इक हल्का सा धुंधलका; बस बाक़ी है
कब जुबां खामोश होती चली गई

और कब दिल बोलने लगा
महफ़िलें , तनहाइयों में तब्दील हो गयीं
अकेलापन, तो खुद से घबरा गया
और चुपके से शायरी के पहलू में आ गया
जाने कैसे यह सफ़र हमे रास आ गया
हम तीनो साथ चले थे कभी
आज देखा तो ज़माना साथ आ गया ...
--- अमित ०१/१०/०७

Sunday, September 23, 2007

ऐसे क्यों है हम ...

ये नया दौर है
नया ज़माना
भूले हम सब
जो भी हुआ पुराना
खाना बदला
पीना बदला
बदला है पहनावा
जीवन बदला
बदले गये नाम
बदले आचार- विचार
और बदल दी भाषा
हिन्दी हो सब भूल गये
आधो को इंग्लिश ने न अपनाया
डूबतो को तब दिया
"हिंग्लिश" ने सहारा
हिंग्लिश अब
हिन्दी से ज्यादा बोली जाती है
और इसे बोल
दुनिया बहुत इतराती है
"नमस्कार" को सब भूल गये
हॉय-बाय अब काम आती है
माँ-पिता का पता नही
मॉम- डैड अब मिल जाते है
चाचा-ताऊ, मामा-मौसा किस के है
अंकल हर गली में मिल जाते है
ये हम ही क्यों ऐसे है
जो कुछ सही से ना अपना पाते है
अपनी संस्कृति तो छोड़ चुके
और दुसरी को अपना नही पाते है ...
--- अमित २३/०९/०७

Thursday, September 20, 2007

बे-व्फाई

मैं बे-वफा हरगिज़ ना था
की थी मैंने भी वफा
जो मैं दिखा ना सका
दीवाना मुझे करार किया था
थीं मेरी कुछ मजबुरिया
हर कदम पर जिसने
लाचार मुझे किया था
तुम तो थी
जिसे हम पर पूरा यकीन था
फिर क्यों किया ऐसा
तुमने किया मुझे क्यों रुसवा
क्यों तुम ने वो सब सच माना
जो कभी हुआ न था
ऐसा क्या था दुनिया की बातों में
जो पल सारा विश्वास डोल गया
तुम तो करती इंतज़ार
तुम तो रखती हम पर एतबार
दुनिया का किसे डर था
किसे थी परवाह दुनिया की
मजबुरिया कब तक रास्ता रोकती
दुनिया कब तब आड़े आती
तुम साथ जो हमारा देती
कुछ भी जहाँ में होता
आख़िर जीत हमारी होती ...


--- अमित २२/०९/०७

Wednesday, September 19, 2007

ए वक़्त ...

ए वक़्त ज़रा ठहर जा,
अभी तो हसरतें बाक़ी हैं।
रात अभी जवान हुई है,
इसका घूँघट अभी बाक़ी है।
शमा तो बस अभी जली ही है,
परवाने का जलना अभी बाक़ी है।
उनकी जुल्फें तो अभी खुली हैं,
जुल्फों का बिखरना अभी बाक़ी है।
अभी तो पैमाने से पी है,
आंखों के जाम अभी बाक़ी हैं।
लब तो अभी सिले हुऐ हैं,
उनसे अरमान निकलना अभी बाक़ी है।
अभी तो हम होश में है,
मदहोश होना अभी बाक़ी है।
ए वक़्त तू अभी जता कहॉ है,
उनमे हया अभी बाक़ी है।
निकल ने दे दिलों के अरमान,
किसे पता जिन्दगी कितनी अभी बाक़ी है...
( अपनी शरीकेहयात के लिए )
--- अमित २९/०३/०७

Tuesday, September 18, 2007

सोचते है ...

हो गई उनसे फिर
आज राह में मुलाक़ात
था जिसका हमे डर
हो गई वोही बात
पान चबाते , कुर्ता पहने
दूर से चले आते थे
देख उनको हम
मन ही मन घबराते थे
कोशिश थी
उनकी निगाह ना पडे हम पर
यह सोच, इधर-उधर
छिपने की जगह हम तलाशते थे
मगर वो भी साहब
कयामत की नज़र रखते है
जिस कोने में हम छुपे थे
सीधे वहीँ रुके थे
हाथ में था उनका झोला
उसे देख चक्कर खा
दिल हमारा डोला
पता था, घंटो हम सताये जायेंगे
हिम्मत नही है, हममे इतनी
कैसे उनकी शायरी झेल पायेंगे
अपनी हालात देख
बीता समय याद आता है
अपने दोस्तो का
हमसे कतराना समझ आता है
ढाया है हमने,
उन पर सितम बडा
अब वो सोच,
उनकी हालत पर तरस आता है
सच ही कहा है, किसी ने लोगो
अपना करा सामने आता है ...
( अपने दोस्तो के लिए जिन पर मैं अत्याचार किया )
--- अमित १९/०९/०७

Monday, September 17, 2007

तेरे दामन मे ...

ये जो जिन्दगी है
बहुत ही अजीब है ,
जिसने कहा,
मैं समझता हूँ
तुझे ए जिन्दगी
ख़ूब हंसती है
उस पर ये जिन्दगी
हम ने सोचा
आज तो पत्थर मिलेंगे ,
डूबे दिल से निकले
और मोड़ पर हम को
अपनी बाहों में भरते
दो हाथ मिले
मायूस बैठे थे
दूर जा खुद से भी
छिपे बैठे थे
आया मीठी यादों का झोंका
दिल में हुई गुदगुदी
और अपनी आंखों में
यादों की नमी ले बैठे
सच है ,
बहुत कुछ है तेरे दामन मे
ए जिन्दगी
हमे बहुत मिला है
हमे बहुत मिलेगा
फिर भी ना जाने क्यों
हम चिन्ता कर बैठे ...
(समीर लाल जी को समर्पित , कुछ यादें ताजा करने पर )
--- अमित १७/०९/०७

Sunday, September 16, 2007

दिल के पास ...

रहते हैं जब पास हमारे
ख़ूब हंसाते , ख़ूब धमाल कराते है
जाते है जब दूर ज़रा
भावनाओं में दूर बहा ले जाते है
जलाती है जब भी जिन्दगी की धुप हमे
छाया बन हमारे साथ साथ आते है
छाता है जब भी निराशा का अँधेरा
आशा का दीप ये जलाते है
नाम नही कोई इनके रिश्ते का
कभी बंधु, कभी दोस्त
कभी सारथी, कभी गुरू
रुप-रुप में ये मिल जाते
रहे चाहे कहीँ भी
मगर दिल के बहुत पास आ जाते हैं ...
--- अमित 16/09/०७

Friday, September 14, 2007

तुमने ...


हर उम्मीद को

ना-उम्मीद में बदला है तुमने,
हर आस को

निराश किया है तुमने ,

झटका है हमेशा ही तुमने

बढाया जब भी हाथ हमने,

बदला है तुमने तकरार में

की जब भी कुछ बात हमने,

की जो हमने कुर्बानियाँ

दिया नाकामियाँ नाम तुमने,

ना आए तुम पर आंच

इस लिए चुप रहे हम

और बदनाम किया

हमे गली-गली तुमने,

टूट तो हम चुके थे

चूर-चूर किया है तुमने,

हमारे प्यार को

खेल कहा है तुमने

और अपनी दिल्लगी को

मोह्बत पुकार है तुमने,

बंद किए मेरे लिए

सब रास्ते तुमने

और देख अब भी खोला है

तेरे लिए दिल का दरवाजा हमने ...
- अमित १४/०९/०७

Tuesday, September 11, 2007

हम है सूत्रधार ...


आता जब भी कोई काम नया

छोटा हो या चाहे हो बड़ा
रखी है हमने नींव उसकी

और दिया है मज़बूत आधार

बनाये रास्ते, दिया माहौल

ना आये कोई अड़चन

और अच्छे से चले हर काम

खोजे हमेशा वो रास्ते

मिनटों में ख़त्म हो

जिससे घंटों के काम
पेश आई जब भी कोई मुश्किल

निरंतर किया हमने काम

और किसी ना होने दिया कोई नुकसान

मांगी जब भी किसी ने मदद

हाथ बढा कर दिया हमने साथ

कोई भी रहा हो लक्ष्य

किया पूरा हमने हर काम

परदे के पीछे रहते है

हर काम के हम है सूत्रधार

और सी-सी-डी है अपना नाम ...

( अपनी टीम के नाम )


--- अमित ११/०९/०७



११ सितम्बर ...


रोज सा दिन निकला था वो भी

रोज से काम में लगे थे सभी

रोज सी ही हर तरफ सरगर्मी थी

सब कुछ ही तो था रोज सा

बस पल में सब कुछ बदल गया

जो हँसता-गाता था पल भर पहले

क्षण में गम़गीनियो में तब्दील हो गया

समझ किसी को कुछ भी ना आया

जो जहाँ था जड़ रह गया

कुछ हो पाता , इस से पहले

जो था शहर; वो शमशान हो गया

वो जो-जो मरा था

वो ना हिंदू था, ना मुस्लमान था

वो ना था सिख, ना इसाई था

जिसने अपनी जान गवाई थी

बस एक इंसान वो था

जिस ने था उसको मारा

उसका कोई मज़हब न था

वो कोई इंसान ना था

हुआ उस दिन इंसानियत का कत्ल था

याद उसको कर के आज भी

दिल अपने दहल जाते है

कुछ अपने, कुछ बेगानो की याद में

अपनी आंखों में अंशु भर आते है

आओ साथ उठे और करे प्र्यतन

शान्ति का अभियान हम विश्व में चलायेंगे

हम सब जानते है दुसरा ११ सितम्बर हम न सहपायेंगे ...


(११ सितम्बर को अपने जान गवाने वालो को श्रद्धा नमन )


--- ११ /०९/२००७

Monday, September 10, 2007

भाषा ज्ञान ...


जब स्कूल को हम जाते थे

भाषाओं की कक्षाओं से हमेशा घबराते थे

हिन्दी के थे याद

चार दोहे, दो छन्द और दो चोपाई

बुरे वक्त पडे तो बहुत काम आते थे

अंग्रेजी को शक्ल हमारी ना भाती थी

भूतकाल की किर्या हमेशा वर्तमान में याद आती थी

गणित-विज्ञान में जरा अच्छे थे

इसी कारण मास्टर जी को थोड़ा जचते थे

गणित- विज्ञान में बच जाते थे

और भाषा की कक्षा में रोज लताडे जाते थे

कहते थे मास्टर जी,

गणित-विज्ञान से देश के काम तो आओगे

बगैर भाषा ज्ञान के दूर ना ज्यादा जा पाओगे

भाषा से आते है संस्कार

और होता है संस्कृति का ज्ञान

संस्कार को जो आचरण में लाओगे

तभी अपनी ज्ञान-संस्कृति को दूर तलक फैला पाओगे

आज, याद उनके आते हमे बोल है

देखते जब अपने देश ही हालत डामदोल हैं

पकड़ते है कान अपने

अपने बच्चो के साथ ऐसा ना होने देंगे

उन्हें भाषा का अच्छा ज्ञान कराएंगे ....


--- अमित १०/०९/०७

Friday, September 7, 2007

गागर में भरती सागर ...

बात हो अगर शब्दों की
तरकश में इनके कमी नही
दिखती थी जैसे
अर्जुन को आंख उस चिडि़या की
निशाना इनका भी अचूक रहता है
एक एक शब्द है सधा हुआ
आपना निशाना लिया हुआ
किस शब्द को कहॉ मिलेगा मान
और कहॉ आएगी उस से जान
इन सब बातों का है;उनको गूढ़ ज्ञान
अगर करुंगा मैं शब्दों जा ज्यदा इस्तमाल
शायद होगा वो उनका अपमान
गागर में सागर यें भरती है
चन्द शब्दों में बड़ी बात कहती है यें
"रचना" है इनका नाम ...

--- अमित ०६/०७/०९

Thursday, September 6, 2007

सच का स्वाद...

क्यों ऐसा होता है
सच का स्वाद,
ज़रा कड़वा होता है
कहते हम हैं; सच बोलो
जब दीखता हमे कोई; आईना है
दुश्मन वो अपना हो जाता है
उसके बोल
कोडों से तन पर पड़ते है
देख उसे
आंखों में लहू दौड़ आता है
साथ खडे हो उसके तो
साँसों बोझिल हो जाती है
भीड़ में भी रह कर
वो अक्सर तन्हा क्यों हो जाता है
जो होता था कल तक प्यारा
क्यों अजनबी सा दुबारा हो जाता है
याद मगर उसकी तव आती है
जब ठोकर खा टूटा भ्रम हमारा होता है
--- अमित ०६ /०९/०७

चिट्ठाकारी को अल्प-विराम और सुनीता (शानू) ...

हाँ; तो दोस्तो
एक हैं सुनीता जी,
इस चिट्ठाकारी की दुनिया की
एक जानी-मानी हस्ती !
कोई नही यहाँ पर
पढ़ता जो ना ब्लोग आप का
रोज -रोज आकर !
गुड सी मीठी इनकी कविता
बरबस ही हम सब का मन
उनको पढने को करता !
अभी गये दिनों
मानव कर्तव्यों ने इनको पुकारा
और देते हुए उनको मान
दे दिया आप ने
चिट्ठाकारी को अल्प-विराम
और सब को कह दिया; अलविदा !
ये चिट्ठाकारी भी; अज़ब बिमारी है
लग जाये तो; सब पर पड़ती भारी है
आप भी इस से बच ना पाई है
दो-दो कर्तव्यों का भार लिए
वापस येँ, हम लोगो के लिए आई है
हम भी पाठक धर्म निभायगे करते है वादा, रोज आपकी कविता पढने आएंगे ...
(सुनीता जी की वापसी पर)
--- अमित ०६/०९/०७

पहली मोह्बत ...

सुना है ,
कहते है लोग
भुलाये नही भूलता
यह पहला प्यार
उठती रहती है कसक
हमेशा; इस पहले प्यार की
यादें रहती है जवान
हमेशा; इस पहले प्यार की
ऐसा ही कुछ होता है मुझे
याद आता है वो मासूम चेहरा
याद आते है वो जुल्फों के घनेरे
याद आती है बातें उसकी प्यारी-प्यारी
याद आता है उसका सजना-सवारना
मेरा भी अक्सर, आईने में चेहरा देखना
रोज-रोज उस से मिलना
घंटों उसके साथ गुजारना
अपनी ज़ुबां से कुछ भी ना कहना
और आंखों में सारी बाते करना
याद आता है उसकी जुल्फों मे गुलाब लगाना
उसके जिस्म से आती महक से मदहोश रहना
रोज नए नए ख्वाबों की तामिल करना
और याद आती है ना जाने कितनी बाते
जो हमने शुरू तो की पर ख़त्म कभी ना हुई
और दिल में हमेशा मीठी याद बन कर रहीं
संजोया है मैंने अपने दिल में
उसकी यादों का अनमोल खजाना
जानना चाहती हो, कौन है मेरा पहला प्यार
तो मेरी आंखो में देखों
तस्वीर बसी है उसकी मेरी आंखों में देखो
हाँ , सही
सही देखा तुमने, तुम ही बसी हो मेरी आंखों में
तुम ही बसी हो मेरे दिल में, तुम ही मेरा पहला प्यार ...
--- अमित १३/०४/०५

मैं शराबी ...


कहती है दुनिया

मुझे एक शराबी

है कोई यहाँ

जो बतलाये हमे

है क्या इसमे खराबी

जो हुए हम शराबी

नादाँ है दुनिया

कहती है बुरा

होना एक शराबी

जानती नही यह

जीने ही अदा ही बदल जाती

हो जाता जब कोई शराबी

जमीन भी जन्नत बन जाती

गर मिल जाये मैखाने में

मेरे महबूब सा हसीं; साकी

कब पीते है हम जाम प्यालों से

चलते है तव दौर जामो के

बस उसकी मद- भरी आंखों से

छायी रहती ही खुमारी

हम पर अब उसके नशे की

कुछ काम हम पर

कोई दवा नही करती

ला- इलाज है ये

लगी है हम को

तुम से इश्क की बिमारी ...


--- अमित ३०/०४/०५

Wednesday, September 5, 2007

पर्दा नशीं ...


पर्दानशीं है महबूब मेरा

छुपाया है नकाब में

रुख-ए-रोशन उसने

और तडपाया है हमे

उसकी इस अदा ने

चाहा है जब भी

दीदार हमने उसका

दुश्मन बना है

ये पर्दा उसका

माना फबता है पर्दा

हुस्न पर

और गहना है

हया उसका

मगर और दमकता है हुस्न

जब पडती है उसपर

नज़रे उसके आशिक की

सोने पे सुहागे सा होता असर

जब उठता पर्दा और
मिलती जब नज़रे

आशिक की दिलबर से जा कर



--- अमित ०६/०७/09


सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान ...


मन्दिर की आरतियों में

मस्जिद से आती अज़ानो में

गिरजा से होती प्रार्थना में

और गुरूद्वारे में होते कीर्तन में

सुबह-सुबह खेतों को जाते किसानो

स्कूल जाते बच्चों

घर के बाहर जा अपना काम करते लोगो

घर सम्भाती माँ, बहन, बीवी, भाभी

दूर सरहद पर खड़े जवानों

गलियों में हुडदंग करते बच्चों में

ईद-दिवाली मनाते लोगो में

क्रिसमस पर प्रार्थना करते लोगो में

बैसाखी पर भांगडा करने वालो में

कंप्यूटर पर काम करने वालो में

लबों में प्रयोग करने वालो में

यों तो पृथ्वी पर छोटा सा दिखता है

पर हर हिन्दुस्तानी के दिल में बसता है

ये सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान ...


--- अमित ०५/०९/०७



Thursday, August 30, 2007

इत्तिफाक ...

इत्तिफाक से
इत्तिफाक बड़ी हसीं चीज़ है
इत्तिफाक से
आदम मिले हव्बा से
और बनी ये दुनिया
इत्तिफाक से
हम भूलें रास्ता
और पहुंचे तेरी गलियों में
इत्तिफाक से
तकती थी तुम किसी का रास्ता
इत्तिफाक से
किस्मत थी हमारी मेहरबान
और हुआ तुम को
मेरा कोई दुसरा शक्स होने का मुगालता
इत्तिफाक से
उस दिन अपना दिल भी ना माना
और रहने दिया हमने वो मुगालता
जब हुआ ज़ाहिर ये इत्तिफाक
दिल अपना हमे दे चुके थे आप
मगर ये सच मानो तुम
इतना सब होना
नही था महज़ एक इत्तिफाक
उपर खुदा ने लिख दिया था
पहले ही हमारा-तुम्हारा
जीवन भर का साथ ...
--- अमित ३०/०८/०७

मायने ...

क्यों करती हो तुम
बार-बार बस एक ही सवाल
आख़िर क्या मायने है
तुम्हारी जिन्दगी के
क्यों मिला है तुम्हे ये जन्म
समझाया है मैंने हमेशा तुम को
बनाने वाले ने सब को एक सा बनाया
दिए सब को दो पैर- दो हाथ
एक दिल , दो आंख और एक दिमाग
दी आंखें, देखो दुनिया को
दिया दिमाग, समझो इस को
दिया दिल , करो साहस रखो विश्वास
दिए पैर, हिम्मत कर खडे होने को
और हाथ, कुछ कर गुजरने को
फिर क्यों पूछते हो यह बार-बार
नही तो तुम मजलूम
नही हो तुम लाचार
उठो, अगर नही मिलते मायने जिन्दगी के
करो कुछ नया सर्जन
और दो खुद के मायने
जिन्दगी को अपनी तुम ...
--- अमित ३०/०८/०७

अहसास !!!

अहसास !!!
मानो तो एक जीवन
ना मानो तो बस एक शब्द
मुझे अहसास है की
तू मेरे साथ है
और यह अहसास ही
मेरे जीने की आस है
तेरे प्यार का अहसास
यही तो है जिसने दिया
इस ज़र्रे को खास होने का अहसास
यह अहसास ही तो है
जिसने दूरी को भी नजदीकियां कर दिया
मैंने ज़रा बंद की अपनी आँखें
और दिल में तेरे चहरे का दीदार कर लिया
अभी चल रहा है विरह माना
मैंने तो करता हूँ, तुम भी कभी आजमाना
बंद अपनी आंखे करना
अपने मन में मेरा स्पर्श का अहसास लाना
देखना विरह ना तुम्हे सतायेगी
और अपने मिलन का अहसास तुम कर पाओगी ....

--- अमित ३०/०८/०७

Tuesday, August 21, 2007

ख़ून-ए-दिल ...

दुखता है अब बहुत दिल मेरा
होता है बेचैन दिल मेरा
जुबान से नही होते बयां
अब मेरे ज़ज्बात
और आँखें करती
हर ज़ज्बात बयां हमारा
मैं तो रहा हमेशा ही
महफिलों में भी अकेला
इस अकेलेपन में भी
किसी ने ना हमे कभी छोडा
हम तो किसी से कुछ ना बोले
लोगो ने हर कदम
हम को किया रुसवा
हमारा दिल तोडा
और दिया है हमे
ज़ज्बातों से खेलने का इलज़ाम
मेरी जुबां हमेशा चुप रही
दिल का लहू मगर चुप ना रहा
और ज़ोर ज़ोर पुकारा
देखों कभी गरेबान में अपने
मेरे दिल का ही नही
ना जाने कितनों का
ख़ून-ए- दिल है जो
ले रहा है नाम तुम्हारा ...
--- अमित २१/०८/07

यह सच है मगर ...

तुम मानोगे नही
यह सच है मगर
दिल कभी तुम्हारा
दुखाया नही हमने जानकर
कुछ समय का साथ ऐसा था
सब कुछ लुटा, कुछ पाया नही
चाहा है तुम्हे तह-ए-दिल से
काम मगर ये कुछ आया नही
हमने हमेशा तुम्हारी खुशियाँ ही चाही
और ना जाने ऐसा क्यों हुआ
हुई कुछ गलत फेहमिया
और ख़ुशी के बदले दुःख हम दोनो ने पाया
तुम को लगता पत्थर हूँ मैं
देखा तुमने कभी नही
इस पत्थर दिल इन्सान ने
सीने में मॉम सा एक दिल पाया है
आप ने किया गुस्सा हम पर
बुरा बहुत हम को बताया
तोड़ रिश्ता हमसे कहीँ और जोड़ लिया
हम तो आज भी तनहा रहते है
और सब से कहते है
कभी किसी का दिल ना दुखाना ...
--- अमित २१/०८/०७

Sunday, August 19, 2007

समझते हो हमे ...

क्यों करते हो नाहक कोशिश
समझ हम को जाने की
रखा था जिसने
नौ महिने अपने गर्भ में
पाला-पोसा , बड़ा किया जिसने
करती है वो आज भी कोशिश
समझ हम को जाने की
तुम से हमारा तो
बस इत्तिफाक है चन्द मुलाकातों का
और उस पर दावा है
तुमने हमे समझा है, तुमने हमे जाना है
क्यों छलते हो अपने आप को
करते जाओ योंही कोशिश
हमे समझना आसान नही
यह तो एक लम्बा सफ़र है
जिसका तुम्हे अनुमान नही
ये तो तुम्हारा आगाज़ ही है
अंजाम किसी को पता नही ...
--- अमित १९/०८/०७

Tuesday, August 14, 2007

हम हिंदुस्तानी ...


उठी है जब भी

कोई ऊँगली तुझ पर

और हुई कोई गुस्ताखी

तेरी शान में

चढ़ी है हमेशा ही त्योरिया

और आया है उबल

रगो में दौड़ता लहू

फड़क उठती है भुजाये

और जल उठते है आंखों में शोले

वो सोच भी सकते है कैसे

जो खडे हो हमारे खिलाफ

हम तो ऐसे है

जो घर से बाहर ना झाकें

और ऐसे भी

जो डाले हम पर बुरी नज़र

हम उसको ना छोड़े कहीँ पर

आये जो नेक नियत से

उससे मिले हम खुले दिल से

सीखाया है उसे सबक बडा अनोखा

की जिसने भी कोशिश दे हमे धोखा

हम तो अपनी राह चलते है

खुश रहते है ,औरों को खुश रखते है

उन्नति को और अपना हर कदम बढाते है

सारे जग में "हिंदुस्तानी " हम कहलाते हैं ...


--- अमित १४/०८/०७

Saturday, August 11, 2007

कुछ अनकही सी...

मिले वो बाद अर्से के आज
हुई फिर उनसे
बाते कुछ अनकही सी
लब उनके सिले थे
लब हमारे सिले थे
खामोशी से आंखों-आंखों मे
बातों के वो दौर चले थे
देती थी सुनाई
उनके दिल की धड़कन
छूती थी मुझको
उनके साँसों ही गर्माहट
होती थी साफ महसूस
हरारत उनके बदन की
झलकती थी बेताबी चेहरे पर
उनके चंचल मन की
आपस में उलझी उँगलियाँ
दिखाती थी उथल-पुथल
कुछ ख्यालों की
जो चल रही थी
अंतर-मन में कहीँ
वो हिज़र भी क्या था खुदा
जो था उन्होने
उपर से नीचे तक ओढा हुआ
एक दूजे की आंखों में
दोनो यों डूबे थे
कुछ ख़बर ना थी
कब दिन का दामन छुटा
और शब ने कलाई थाम ली
अब तो वक़्त-ए-रुखसत था
जाने कैसे इन पलकों ने
अश्कों की बाढं
आंखों के साहिल पर थाम ली ...
--- अमित ११/०८/०७

Friday, August 10, 2007

तेरी चुडियॉ ...


लगती हैं बड़ी सुंदर तुम पर
फबती हैं हर दम तुम पर
मोह लेती मेरा मन
जब करती ये छन-छन
नाज़ुक है तेरी कलाईयां
बनाती ये उनको और सुंदर
जब चढती यें उन पर
नीली-पीली हैं रंग बिरंगी
मेरे प्यार की यें है सोगात
कांच की हैं, पर पूरा करती यें तेरा शृंगार
कीमत तो है इनकी, झलकता इनसे प्यार
तू है सुहागन दर्शाती हैं यें हर दम
रहे तू सदा सुहागन , यही कहता है
तेरी कलाई में पडी हर चूड़ी का मन ...


--- अमित १०/०८/०७

Tuesday, August 7, 2007

मेरी माँ ...


बोलना जब आता नही था


मेरा हर इशारा समझती थी वो,


चलना जब आता नही था


ऊँगली थाम चलाती थी वो,


रहता था जब मैं बीमार
रात रात भर कहॉ सोती थी वो,


ज्ञान का पहला पाठ पढाने वाली थी वो,


जागा किया करता था जब पढने को


मेरा पूरा ख़्याल रखती थी वो,


जब भी कभी चोट लगी मुझको


ना जाने कितने प्यार से संभालती थी वो,


याद है मुझे जब गया था दूर काम को मैं


खुश थी मगर जुदाई के अंशु छुपाती थी वो,


हुई थी जब मेरी शादी


ख़ुशी से हर तरफ नाचती थी वो,


मैं बस सोचता भर ही हूँ


मेरे मन की हर बात जान जाती है वो,


तुम पूछते हो कैसी है वो
और मैं सोचता हूँ


शब्दों मैं कैसे तुम को बता दूं


मेरी "माँ" है वो बस इश्वेर के जैसी है वो...






--- अमित ०७/०८/०७

Monday, August 6, 2007

यह मजबूरी ...

सूरज ने अभी ठीक से आँखें भी ना खोली थी
और आधी दुनिया नींद के झूले में झूल रही थी
ऐसे में कोई उठा और निकल पडा रोजी की तालाश में
परवाह है ना उसे अधूरी नींद की और ना फिक्र आराम की
कम्बख्त, जेठ की गरमी भी बड़ी निरदयी है
यह देखती है ना कोई मजबूरी ,ना कोई लाचारी
यह देखती है ना कोई नंगा शरीर और ना भूखा पेट
यह जानती है बस झुल्साना शरीर का
लगा हुआ है मगर वो अपने काम में
भूलाकर इस तपती धुप का प्रहार
धुप की जलन कहॉ उसको जलाती है
यह तो पेट की आग है जो उस से ना सही जाती है
परिवार उसका भूखा है यह सोच कुदाल और तेज़ हो जाती है
सच है, यह पेट की भूख , ये मजबूरी
इस इन्सान से ना जाने क्या क्या करवाती है ...
--- अमित ०६/०८/०७

Sunday, August 5, 2007

तुझ से मिलना ...

देखा था जब आते तुझे
मंदिर में पहली बार
रह गया था, एक सकते में मैं
थी तो तुम एक दम सादा
किया था मगर इस सादगी ने
मुझे आकर्षित बहुत ज्यादा था
आकर तेरा वो झुक कर, मंदिर का दर छूना
कर के दुपट्टा सिर पर , वो आरती लेना
की थी जब तुने पूजा में बंद आँखें
लगता था चहरे की आभा से
लगी हो जैसे पुकार तेरी , सीधी इश्वेर से जाके
ना जाने क्यों लगा था मुझे
सफल होगया मेरा जीवन उस दिन वहाँ आके
और फिर अपनी माँ के साथ मेरी करीब आना
लिये आंखों में हया, वो मुझसे बाते करना
ज्यों ज्यों मैं तुम से बाते किया जाता था
बस तेरी सादगी पर ही मैं आसक्त हुआ जाता था
तेरी कही एक एक बात तेरे मन का आईना था
सच इश्वेर ने बड़ी सादगी से तुम्हे बनाया था
मेरी किस्मत ने आज खटखटाया मेरा दरवाजा था
और हम बने जीवन साथी, यह दोनो दिलों का फैसला करवाया था ...
--- अमित ०५/०८/०७

Friday, August 3, 2007

बस तेरे लिए ...

दी है रब ने मुझे ये आंखें
तेरा दीदार करने के लिए
दी है रब ने मुझे साँसे
तुझे प्यार करने के लिये
दिये है रब ने मुझे ये होंठ
तेरे रुप का बयां करने के लिये
दिये है रब ने मुझे यह हाथ
तेरा शृंगार करने के लिये
दिया है रब ने मुझे दिल
तुझको दुनिया की नज़र से बचा कर रखने के लिए
दी है इस दिल में धड़कने
तुझे बे-इन्तहा मोहब्बत करने के लिये
तुम मानो या ना मानो
दिया है रब ने मुझे जन्म
बस तेरे लिये ...
--- अमित ०३/०८/०७

ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे ...

ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
सावन में बरसती
रिम झिम बरखा में
ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
बहारों में खिले
फूलों के गुलिस्तां में
ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
उगते सूरज की लालिमा में
ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
चांद की चांदनी में
ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
मस्जिद से उठती अज़ानो में
और मंदिर से आती आरती में
जैसे ढून्ढता कस्तूरी मृग
कस्तूरी को हर जगह
मैं ढून्ढता तुम को
हर जगह और जानता नही
तुम बसी "मेरे दिल में "...
--- अमित ०३/०८/०७

Tuesday, July 31, 2007

बचपन ...

उड़ता था मन मेरा तब


मेरी किताब के कागज़ के जहाज़ पर


लेती थी हिचकोले


जब चलती थी


वो कागज़ की कश्ती


बारिश के ठहरे पानी पर


डोर कहॉ किस के पास कभी थी


बिन डोर ही उड़ता था मन


इस उंचे अनंत आकाश पर


छोटी छोटी उन आंखों में


ना जाने कितने सपने थे


कल का सपना था क्या


ये किसको याद होता था


हर दिन देखे एक नया सपना


बस यही काम तो अपना होता था


सच ही तो है


बचपन को किसी से क्या मतलब होता है


उसको तो बस कल के दिन का इन्ज़ार है


कल उसको नया कुछ करना है ...
--- अमित २/०८/०५

Monday, July 30, 2007

तनहाईयां...

जब भी मैं उदास होता हूँ
और दुनिया से क्या अपने से भी भाग जाना चाहता हूँ
तव मैं बस तनहाईयां तलाशता हूँ
वहाँ जाकर आता है , मेरे दिल को करार
और मिलता है मेरी बेचैनी को आराम
माँ की गोद सी भाती है मुझे तन्हाई
आते ही जहाँ, दूर होती थकान
और आती जिस्म में नई जान
यो तो आते है और भी यहाँ
चन्द घड़ियाँ ही बस वो बताते यहाँ
और फिर खो जाते फिर इस दुनिया में
और नही सुन पाते अपने दिल की जुबान
मैं तो अक्सर आता यहाँ
करता घंटो अपने दिल से बात
मेरे दिल की आवाज़ मुझे सीखाती
कैसे इस दुनिया में है अपनी लडाई लड़ी जाती
कैसे बचाये जाते अपने नैतिक मुल्य
और कैसे बना जाता एक अच्छा इन्सान
हक़ीकत है , तन्हाई
कभी कभी बडा काम आती
और कुछ करे या ना करे
मुझे हमेशा ही जीने की नई राह दिखाती ...
--- अमित ०९/०४/०५

वो शख्स ...

देखा , आज सुबह
एक जाना पहचाना मगर अनजान चेहरा
देखकर जिस को ,
दो पल को समय जैसे ठ्हेरा
और याद आया
एक दिल अजीज़ शख्स
बडा ही जिंदा दिल
बडा खुश मिजाज़ , वो शख्स
जिंदा दिली इतनी की
जिन्दगी भी जीने का हुनर उससे सीखे
और खुश मिजाजी इतनी
खुशियाँ भी चन्द घड़िया उससे उधार मांगे
दुनिया को अपना बनाने की कला
भी बखूबी उसने पाई
अपना दिल उसको दे बैठा
हर एक शख्स , जो उसके करीब आया
मैं भी था खुश नसीब
मेरा भी कुछ नाता उनसे बन पाया
घड़ियाँ कब मगर एक सी घूमती है
वक़्त ने लिया एक दिन , बडा अजीब फेरा
और लगा गया हम सब की दिलो पर
आघात एक बडा ही गहरा
उस एक ख़बर ने
दिलों को सबके झकझोर दिया
हुई एक दुर्घटना
जिसमे उसने , जिन्दगी का दामन ही छोड़ दिया
घर से आती रोने की आवाज़
किसी से भी ना सही जाती थी
जहाँ दूर नज़र डालो
आंखों में बस नमी ही नज़र आती थी
कोई और नही
"शेलेंद्र भैया " ही थे वोह शख्स
जिनके जाने के गम मे सब रोये जाते थे
आज उनको गये अरसा हो गया
और हम सभी आज भी है उनकी यादें संजोये हुए ...
( अपने दोस्त के भाई की कार दुर्घटना में सपरिवार मृत्यु पर )
--- अमित ०४/०४/०५