Wednesday, April 21, 2010

परछाई ...

हर तरफ रौशनी फैली थी
खुशियों के चारो और मेले थे
दिन ईद , रात दिवाली थी
कभी मेरे आगे , कभी पीछे
कभी दाये , या बाये
हर लम्हा,
वो मेरे साथ थी ...
फिर तेज एक आंधी आई
बिखर सी गई खुशियाँ सारी
और छाई अंधियारी ...
अब ओझल वो हो गई
कल हर लम्हा जो साथ थी ,
याद मुझे आता हैं ,
कहा था उसने
वो मेरी " परछाई" थी ...
--- अमित ०५/०५/२०१०

3 comments:

Udan Tashtari said...

वाह! बहुत खूब!

दिलीप said...

waah bahut sundar

संजय भास्कर said...

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है .