Friday, December 30, 2011

नये साल का रेजोलुशन ...

आज सुबह सुबह एक दोस्त का सवाल आया

और अमित नये साल का क्या रेजोलुशन बनाया !

सवाल अच्छा था, हमे पसंद भी आया

हम ठहरे आलसी जीव, हमने न कभी कोई रेजोलुशन बनाया !

हमने सोचा क्यों न इस सवाल पर गौर किया जाये

और हो सके तो इस साल के लिए के रेजोलुशन बनाया जाये !

रेजोलुशन बनाने की चाह में हमने दिमाग पूरा लगया

और देखिये कैसे कैसे ख्यालो को अपने इर्द गिर्द पाया !

सिगरेट को तो हम कभी पसंद ना आये

फिर छोड़ उसे कैसे दे, जिसे थे ना कभी पाये !

शराब हमसे कभी हज़म ही ना हो पाई

उसकी यही अदा, कभी हमको पसंद ना आई !

पान, गुटखा और सुपारी तो हम वैसे ही नहीं खाते

बुढापे की उम्र है, दांतों से कहाँ ये अब हमारे चब पाते !

फिर सोचा चलो करते है पूरी मैनेजमेंट की पढाई

याद कर फिर सहमे, इंजीनियरिंग में थी जैसे तैसे जान बचाई !

फिर सोचा चलो कोई सर्टिफिकेट ही पास कर आयेंगे

पर प्रोजेक्ट का है बजट कम, रिअम्बेर्स उसको कैसे कर आयेंगे !

चलो और कुछ नहीं, हर महीने कुछ पैसे ही बचायेंगे

पर बाबू अपनी सेलेरी से हम बीस तारीख से आगे कहाँ जायेंगे !

नर्वस नाइनटी में है हम, चलो थोडा वजन घटाएंगे

अरे सचिन ने मारी सौ सेंचुरी, एक तो साहब हम भी लगायेंगे !

प्रण करते है ना करेंगे ऐसा काम, जिससे श्रीमतिजी से डांट खायंगे

लगता यह दिवा-स्वप्न है, हकीक़त शायद इसको ना कर पायेंगे !

अब तक दिया काम को, अब परिवार के साथ समय ज्यादा बितायेंगे

कुछ भी हो भैय्या, यह रेजोलुशन तो इस साल ज़रूर हम निभायेंगे !!!

कहानी एक बाज़ार की ...

शहर के बीच एक बाग़ के पास बाज़ार में
श्रीमति जी के साथ हम खड़े थे किसी के इंतज़ार में !
बाज़ार में थी चहल पहल थी खूब जोर
अपनी भी नज़र घूम थी वहां हर ओर !
वहां दिया जो लोगो की गतिविधियों पर ध्यान
किस्सा है वो यहाँ आप के सामने ब्यान !
पार्किंग की पहले बात सुनाता हूँ
कितने हैं लोग समझदार बताता हूँ !
इठलाती हुई स्कूटी पर एक देवी जी वहां आई
दो गाड़ियों की जगह में स्कूटी जी अपनी फसाई !
अक्षांश क्या थे उस स्कूटी के, कुछ समझ आये
पर स्कूटी निकालने में जोर देवी जी ने पूरे थे लगाये !
इतने में एक हंसों का जोड़ा वहां आया
उसने अपनी स्कूटी को पार्किंग में लगाया !
वहीँ अपने प्रेम की पींगे वो बढ़ते थे
सीधे स्कूल से भागे नज़र वो आते थे !
लगता लड़कपन जा , जवानी चुकी थी
डर निकल दूर हुई , बहादुरी चुकी थी !
नज़रे घूम फिर एक दूकान पर पड़ी
लड़के - लड़कियों की कतार लगी थी वहां बड़ी !
दूकान में झाँका तो ज्यादा हो हैरानी पाई
और कुछ नहीं, वो था बस एक अग्रेजी "नाई" !
दो केंची इधर और चार इधर कर बाल छांटे जाते थे
बाहर लडके - लड़कियां झटके जुल्फों में दिए जाते थे !
देखो तो अब कानो तक लड़कियों के बाल लहलहाते थे
और लडको के बाल उनके कंधे चूमे जाते थे !
अंग्रेजी नाई से बाल बनवाने का मजा है निराला
मैं कहाँ उसको समझू, मैं कल्लू नाई से बाल बनवाने वाला !
फिर एक बड़ी गाडी में एक साहब वहां आये
मम्मी, बीवी संग बच्चो को घुमाने लाये !
कुछ ज्यादा भूखे थे, और भूख मिटाने की थी पूरी तैयारी
बैठ फूटपाथ पर अपनी पत्तल उन्होंने ने चाट मारी !
कुछ महानुभाव भी वहां हम को घूमते नज़र आये थे
ग़ज़ब थी कला, जिस से पतलून अपनी वो घुटनों पर टिकाये थे !
किरर्र धडाक की आवाज फिर हमको दी वहां सुनाई
देखा एक देवी जी ने स्कूटी अपनी एक बाइक में जा टकराई !
देवी जी तो साफ़ बच गई, चोट कुछ बेचारे लड़के को आई
और मजा देखिये, जनता की सहानुभूति सारी देवी जी ने पाई !
सोचने वाली बात है, महिल्याओं को कहाँ कम आँका जाता है
घायल पुरुष से ज्यादा एक देवी जी पर ध्यान यहाँ दिया जाता है !
यह तो बस था सड़क का हाल, समय की पाबंदी होती तो हम बाग़ में भी जाते
अभी तो बस कविता बनी है, यकीन है तब उपन्यास हम बनाते !

बैठे बैठे का हमको ख्याल एक नया आया ...

बैठे बैठे का हमको ख्याल एक नया आया
कैसे जाए अपने नेताओं को आई- टी की भाषा में समझाया !!
एक प्रयास प्रस्तुत है !!!

माननीय मुलायम सिंह जी - मेलिशियास गतिविधियों का डर है... एंटी-वायरस नया डलवाये !!!
माननीय शरद पवार जी - ऑपरेटिंग सिस्टम ही कृप्ट है... सिस्टम तुरंत फार्मेट करवाये !!!
माननीय राजा जी - चुम्बकीय तरंगे इधर उधर जाती है ... ओथानटीकेशन तुरंत इनेबिल करवाये !!!
माननीय लालू जी - प्रोसिस यह रिसोर्स इटर है ... प्रोसिस किलर टूल तुरंत इस्तमाल में लाये !!!
माननीय करुणानिधि जी - मेनूफेकचरर ही बेकार है ... कोई प्रोडक्ट इस्तमाल में लाये !!!
माननीय मनमोहन जी - हार्डवेयर ठीक है ... इस्तमाल के लिए नया साउंड ड्राइवर डलवाये !!!
माननीय राहुल जी - दिखावे पर बिलकुल मत जाइए ... तुरंत नया स्पाम फ़िल्टर लगवाइये !!!
माननीय सोनिया जी - इशू बड़ा है, समझ आता है ... मशीन को वापस मेनूफेकचरर को भिजवाइये !!!

हमारे नेताओं की लिस्ट तो और बढती जाती है
और मेरी समझ से आई- टी की टर्म्स छोटी पड़ जाती है !!!
आगे जो दिल करे नाम जोड़ते जाइये
हो सके को एक नहीं शब्दावली बनाइये !!!

हास्य कवि सम्मलेन...

हो रहा है एक "हास्य कवि सम्मलेन"

हमारे दोस्तों का मेल आया...

"अमित जी" आप क्यों नहीं लेते भाग

सारे दोस्तों ने हमे चढाया ...

भोला मन बातो में आया

और जा हमने भी रजिस्ट्रेशन कराया...

एक दो ही कविताये अच्छी बन पाई थी

उन्ही के दम हमको लड़नी यह लड़ाई थी...

दो हफ्ते बीते, कहीं से कोई खबर आई

लगा रेवीऊ पर ही वीरगति कविता ने पाई...

जाने कहाँ कैसे कहानी यह कुछ पलटा खा गई

और कवि सम्मलेन से के दिन पहले सलेक्शन की मेल गई...

ख़ुशी के साथ अब हमारी आँखों में तारे घूमते थे

स्टेज पर जाने की सोच, हाथ पाऊँ हमारे फूलते थे ...

हालत कुछ अजीब सी थी, करे क्या सूझता था

रह रह गुस्सा कुछ, दोस्तों पर अपने फूटता था...

"घबराओं मत" दोस्तों ने हमारे समझाया

आओ करेंगे कुछ प्रेक्टिस सबका जबाब आया ...

पहली बार पढ़ी जब कविता, हैसियत अपनी समझ आई

एक भी थी पंक्ति जो स्पष्ट मुहं से निकल कर आई ...

अपना तो यहाँ भी हो गया पोपट था

प्लान अब लगता यह भी चोपट था ...

हम तो थे जो थे हिम्मत अपनी हारे

मगर दोस्त कोशिश में अभी भी थे सारे ...

घंटे, लम्हों में बीत फिर वो शाम आई

और घबराते हुए हमने कवि-सम्मलेन में अपनी हाजरी लगाई...

कुछ दिग्गजों ने हमसे पहले थे वहां हाजरी लगाई

एक से बढ़ एक कविताये वहां उन्होंने सुनाई ...

अब हमारी बारी थी, संचालक ने आवाज़ लगाई

हिम्मत जुटा मंच पर पहुंचे, और कविता अपनी सुनाई ...

आवाज़ कुछ धीमी सी निकली , राम जाने कितने शब्द दिए सुनाई

कुछ तितलियों ने भी थी पेट में कुछ हलचल मचाई ...

पंक्तियों पर घर जाने कुछ जल्दी सी थी छाई

छोड़ कतार कुछ थी पहले मुंह पर हमारे आईं...

क्रम का वहां क्या किसी ने करना था,

जल्दी कर कविता खत्म, हमे तो बस निकलना था...

राम जी की दया से, जैसे तैसे इज्ज़त बचाई थी

हमारे मंच छोड़ने की ख़ुशी में फिर जनता ने ताली बजाई थी...

इस कवि सम्मेलन की जो है सीख, वो बतायेंगे

दोस्त चाहे अब कितना "चढाये", आगे से किसी मंच पर हम जायेंगे ...

(" मुझे प्रेरित करने वाले सभी दोस्तों के लिए !!! ")

--- अमित (१७ /१२/२०११ )

Wednesday, November 23, 2011

कविता का नाम अंत में दिया है !!!

अनेक मनाते हम त्यौहार !

अलग सा मनता हर त्यौहार !!

एक अनोखा बस यह त्यौहार !

एक सा मनता बस यह त्यौहार !!

दिनों हफ़्तों नहीं, महीनों पहले उडती लहर !

आने को होता जब यह त्यौहार !!

सड़के सबसे पहले यह संदेसा लाती हैं !

चमक-दमक चेहरे पर उनके पहले आती हैं !!

पानी-बिजली भी थोडा झूमते नज़र आते है !

जब भी उनको देखो घर में नज़र आते हैं !!

अदब का हर तरफ मंज़र होता है !

दबंग और साधू में भेद कम नज़र होता है !!

जीवन भी कुछ और गति मान हो जाता है !

रुके हुए कामों का मार्ग, खुद-ब-खुद साफ़ हो जाता है !!

सज जाते है फिर वो सूने नुक्कड़- चोराहें !

महफ़िलो के अड्डे अब वो नुक्कड़- चोराहें !!

भ्रमण देव- देवियों का फिर आम होता है !

दर्शन तब उनका सुबह- शाम होता है !!

दुर्लभ वचनों को मांगने का समय यही होता है !

"तथास्तु", शब्द सब देव-देवी के मुख पर यही होता है !!

यकीन जानिये देश भक्ति का वातावरण चहूँ ओर होता है !

ऐसा सब होता है, जब "चुनावी दंगल" यहाँ शुरू होता है !!

खुश होने को हर भारतवासी के पास यही दिन होता है !

अफ़सोस यह कि "चुनावी दंगल" हर पाँच साल में होता है !!


--- अमित (२२ /११/ २०११ )