Tuesday, April 6, 2010

सूरज हूँ मैं...

चाँद नहीं हूँ मैं
जो रोशन हो,
उधार की रौशनी से !
सूरज हूँ मैं
जलाया हैं खुद को ,
किया तव रोशन जहाँ !
तो क्या हुआ ,
जो शीतलता नहीं मुझ में
ताप और उर्जा हैं
भर पूर मुझ में !
ताप सिखाता स्यमं
और उर्जा अंधरे से लड़ना !
शीतलता में रह कर
उन्नति नहीं आती ,
जब तक न तपे सोना
चमक उसमें भी नहीं आती !
येँ चमकता रूप मेरा
नहीं हैं कोई अहंकार
हैं येँ चमक संतुष्टि की
दी मैंने रौशनी जीने की !
क्या हुआ,
जो आज डूब जाऊँगा
वादा हैं मेरा ,
कल सुबह फिर आऊँगा
लिया हैं जो प्रण
उसको निभाऊंगा !
सिखा कर तुम को
खुद जलना,
उन्नति की राह
बनाना सिखाऊंगा !
--- अमित ५/०४/२०१०

4 comments:

Shekhar kumawat said...

aap se roshan ye hamara ye blogisthan

bahut sundar rachna he aap ki



shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया!

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com