Thursday, May 27, 2010

अक्स मेरा...

आज फिर तोड़ दिया
एक आइना मैंने
दिखा रहा था सच मेरा
करता मैं क्या
बर्दाशत ही नहीं होता
आईने में
अक्स मेरा !!!
--- अमित २७/०५/२०१०

Saturday, May 15, 2010

कुछ समान अभी बाकी है ...

मेरे कमरे में
कुछ समान अभी बाकी है
इबारते लिखी है कुछ कागजों पे
कोरे कुछ कागज़ अभी बाकी हैं
दवात में जो थी कभी श्याही
सूख कब की वो चली
रगों में दौड़ता लहू अभी बाकी है
मेरे कमरे में
कुछ समान अभी बाकी है
मेरी मेज़ पर रखा है
अभी वो आधा टूटा चश्मा
साथ पड़ी किताबों से
धुल हटानी अभी बाकी है
मेरे कमरे में
कुछ समान अभी बाकी है
टंगा है जो उस खूंटी पर
मेरे थैले में
यादों के चाँद टुकड़े अभी बाकी है
लेकर कहाँ मुझे जाते हो
मुर्दा तो सिर्फ जिस्म है
रूह में जान अभी बाकी है
मेरे कमरे में
कुछ समान अभी बाकी है
--- अमित १४/०५/२०१०

Thursday, May 13, 2010

दो प्रशन ...

कल फिर फैका
तेज़ाब किसी ने
एक लड़की पर
सुनकर हुआ दुःख !
लोगो की प्रतिकिर्या आई
निकम्मी है सरकार
निकम्मा है प्रशाशन
और लचीले है क़ानून
करेगा क्या इन "शैतानो" का !
सुनकर आया क्रोध
क्या है आधार
जो दे दोष दुसरो को !
प्रशन करता हूं मैं दो
प्रशन है पहला
नारी सबला है या अबला ?
अगर अबला है तो
बात बराबरी की क्यों ?
संरक्षण उसका जरुरी है
जिम्मेदारी पुरुष को दो !
गर सबला है नारी तो
जबाब करार नहीं देती क्यों
जब उठे आँखे और हाथ उस पर दो !
देती जब वो जीवन
हर क्यों न लेती "शैतान" का जीवन वो?
प्रशन दूसरा है
आते कहाँ से है "शैतान" वो
अगर मैं गलत नहीं
घरों में हमारे ही
पलते हैं "शैतान" वो !
लाल अपना प्यारा है सबको
लाडली अपनी प्यारी है सबको
लाडली किसी दुसरे की
काँटा क्यों बन जाती आँखों में वो?
क्यों नहीं देते हम ध्यान
क्यों नहीं कसते हम लगाम
निकलते है घर से जब लाडले के पाँव!
क्यों नहीं होता दमन "शैतानो" का घर में
जब दिखाई देते है पाँव पालने में !
--- अमित १३/०५/१०

Wednesday, May 12, 2010

नया अंकुर ...

कुछ अरसा गये
लगाया था एक पौधा
आँगन में अपने ,
सोचा था
खिलेंगे फूल !
चूक हुई हम से एक
किया न ख्याल पौधे का ,
न सही दिया पानी
और न किया संरक्षण
तेज धुप
और हवा के थपेड़ो से!
मुरझा गया वो, नन्ही सी जान!
गये दिनों
लगाया फिर एक पौधा ,
की रखवाली धुप और हवा
और सींचा उसको पानी से !
आज सुबह देखा
पौधा वो मुस्कुरा रहा था
एक नये फूल का अंकुर
नज़र उस पर आ रहा था !
--- अमित १२/०५/२०१०

Monday, May 10, 2010

तुम याद आते हो...

सूरज की पहली किरण
जब पड़ती मेरे चेहरे पर ,
तुम याद आते हो !
आते-जाते चिडता है
अब मुझे घर का दरवाजा ,
तुम याद आते हो !
डरती है मुझको
अमावास की काली रात
और पूनम की चांदनी
जलती मुझको,
तुम याद आते हो !
कोई हँसी नहीं गूंजती
सुना रहता है अब आंगन मेरा,
तुम याद आते हो !
आँखों से माना दूर हो
ख्यालो से मेरे कहाँ जाते हो,
सच कहता हूँ
तुम याद आते हो !!!
--- अमित १०/०५/२०१०

Wednesday, May 5, 2010

अब हमारी बारी है ...

सुना एक मुहावरा कई बार
खाली दिमाग शैतान का वास
जब भी सुनते बडे खुश होते
लगता हमको देख बना
यों तो सूरत सीरत भोली है अपनी
दिमाग मगर जरा गड़बड़ है अपना
बे-लगाम घोडे सा ये भागता
कहाँ कब कैसे , करे कोई खुराफात
ये तो बस ये ही जानता
गये दिन की ही बात है
हम यारो के अपने साथ थे
गौर करने की बात है
दिमाग से वो भी तंग हाथ थे
ये तो सोने पे सुहागे वाली बात थी
पूरी बारात शैतानो की साथ थी
बहुत हुआ सब पुराना
चलो आज करे नया कारनामा
ख्यालों के फ़िर सैलाब आने लगे
ये करे या वो करे , दिमाग सब लडाने लगे
शैतानो को ख्याल कब अच्छे आने थे
ज़ोर पर ज़ोर लगते गये और
सारे प्रस्ताव ओंधे गिरते गये
एक विचार तव अंधरे में जुगनू सा चमका
क्यों न सब ज्ञान और हुनर अपना मिलाये
और मंच ऐसा बनाये , जो सबके काम आए
कमर कस कर ली हमने तैयारी है
देखना दुनिया वालो , अब हमारी बारी है ...

--- अमित

हौसला रखते है हम ....

पत्थरों को तोड़ कर रास्ता बनाना आसान नही होता
आसान रास्तों पर चल कर कभी नाम नही होता
माना नदी का रुख नही मोड़ सकते है हम
उस नदी पर बाँध बना सकते है हम
क्या जो फूल नही राहों में हमारी
कांटे से काँटा निकालने का हुनर जानते है हम
क्या जो राहे मंजिल में गिर गये हम
उठ कर फ़िर बढ़ने का दम रखते है हम
क्यों सोचते है वो की हम से न होगा ये
चुनौतियों को हकीकत में बदलने का हौसला रखते है हम ....
--- अमित

Tuesday, May 4, 2010

गुरु द्रोण ...


चर्चा आजकल येँ आम हैं
देश हमारा ,
होता हर जगह क्यों नाकाम हैं ...
शिक्षाएं तो हमारी अच्छी हैं
देती परिणाम अब ये दुसरा हैं ...
कहते ,
शिष्यों ने अब गुरु सम्मान छोड़ा
यह देख , ज्ञान ने उनसे मुंह मोड़ा ...
शिष्यों ने गुरुओं का तर्क स्वीकार
और पक्ष अपना संभाला ...
माना ,
स्तर शिष्यों का धुल धूसरित हुआ
गुरुओं ने कहाँ गरिमा को संभाला ...
एकलव्य तो अब यहाँ मिलते नहीं
पर गुरु द्रोणो की कमी नहीं ...
शिक्षार्थी को ये, स्वीकारते नहीं
कर स्व-अभ्यास कोई आगे बढ़े
तो प्रोहत्साहन को पूछे कौन,
निरुत्साहित करने को तैयार खड़े ...
एकलव्य को अर्जुन समझते द्रोण
तो ये प्रथा ही न जन्म ले पाती,
गुरु, गुरु ही रहते ,
शिष्यों को भी सही दिशा मिलती जाती ...

--- अमित 04/05/10

Wednesday, April 21, 2010

पंछी हुए श्याने ...

दौर मंदी का अब गया
और बाज़ार गर्म हो गया
अब तक जो बंद थे 'पर'
खुलने अब वो लगे ,
छोड़ कर पुरानी शाखे
आशियाना 'पंछी' नया लगे बनाने !
देख देख ये सब ,
मालिक कमज़ोर शाखों के लगे घबराने

ना हो वीरान, अपना आशियाना
पैतरे इसलिए नये नये लगे लगाने !
कल तक जो लगते थे खुद पर बोझ
आँगन के फूल नज़र अब वो आने लगे !
प्रलोभन रोज अब नये दिए जाते है ,
राई के भी अब तो , पहाड़ बना दिए जाते है !
हर छोटी खबर भी, मसाला साथ लिए होती है
और गई हर शाम 'पत्री' एक नई मिली होती है !
लाभ आज से आप को ये दिया जाता है,
वेतन में इजाफा किया इतना जाता है ,
आश्वासन लोगो को ये दिए अब जाते है !
देख देख इनकी ये सब चाल
'पंछी' भी अब हो गये श्याने है
उड़ना तो एक दिन फुर्र ही है
बस भागते इस 'भूत' के
लंगोट और हथियाने है ...

(आर्थिक मंदी का दौर ख़तम होने पर कंपनी और कर्मचारी के बीच की खीचा तानी पर )

--- अमित (२०/०४/२०१०)

परछाई ...

हर तरफ रौशनी फैली थी
खुशियों के चारो और मेले थे
दिन ईद , रात दिवाली थी
कभी मेरे आगे , कभी पीछे
कभी दाये , या बाये
हर लम्हा,
वो मेरे साथ थी ...
फिर तेज एक आंधी आई
बिखर सी गई खुशियाँ सारी
और छाई अंधियारी ...
अब ओझल वो हो गई
कल हर लम्हा जो साथ थी ,
याद मुझे आता हैं ,
कहा था उसने
वो मेरी " परछाई" थी ...
--- अमित ०५/०५/२०१०

Sunday, April 11, 2010

सपना ...

सपने,
एक छोटा सा शब्द
जो बदल दे , दुनिया ...
बिना एक सपने के
न होता बड़ा काम पूरा...
चहाइए सबको
देखें वो कोई न कोई सपना ...
मगर वो ,
जो टूट के बिखर जाए
टूटे एक सपने के साथ
नहीं अधिकार उनको
वो देखे कोई सपना ...
--- अमित ११/०४/२०१०

Tuesday, April 6, 2010

कैसे बनी हास्य कविता ...

एक साधारण सा सवाल
जो हर हास्य कवि से पूछा जाता
"आप की कविता में , हास्य कहाँ से आता "?
सवाल सीधा हैं और जबाब सरल ,
मगर समझ जरा देर से आता हैं
कवि, हास्य पैदा नहीं करता
आम लोगो के बीच,
रोज की जिन्दगी में येँ छुपा होता
कवि तो बस उठा इसे वहां से
शब्दों में अपने पिरोता !
बात इस पर हमने , जरा गौर किया
कान अपने खोले
और नजरो पर जरा जोर दिया !
तस्वीर हुइ कुछ साफ़ और
समझ में आया
हम इंसानों में ,
विचरते कुछ प्राणी भी हैं !
काम बस इतना करना हैं
ध्यान इन पर कड़ा रखना हैं !
प्ररेणा स्त्रोत की तरह , येँ काम आते हैं
करते हैं नित नई हरकतें
और कविता का विषय दे जाते हैं...
और मज़े की बात यहाँ देखिये
हम से लोग भी , हास्य लिख जाते हैं ...
--- अमित ०६/०४/२०१०

सूरज हूँ मैं...

चाँद नहीं हूँ मैं
जो रोशन हो,
उधार की रौशनी से !
सूरज हूँ मैं
जलाया हैं खुद को ,
किया तव रोशन जहाँ !
तो क्या हुआ ,
जो शीतलता नहीं मुझ में
ताप और उर्जा हैं
भर पूर मुझ में !
ताप सिखाता स्यमं
और उर्जा अंधरे से लड़ना !
शीतलता में रह कर
उन्नति नहीं आती ,
जब तक न तपे सोना
चमक उसमें भी नहीं आती !
येँ चमकता रूप मेरा
नहीं हैं कोई अहंकार
हैं येँ चमक संतुष्टि की
दी मैंने रौशनी जीने की !
क्या हुआ,
जो आज डूब जाऊँगा
वादा हैं मेरा ,
कल सुबह फिर आऊँगा
लिया हैं जो प्रण
उसको निभाऊंगा !
सिखा कर तुम को
खुद जलना,
उन्नति की राह
बनाना सिखाऊंगा !
--- अमित ५/०४/२०१०

Friday, April 2, 2010

स्नूपी हैं इनका नाम ...

जरा आप सोचिये
आप से पूछा जाए
सूरज होता क्यों गोल हैं ,
आग में होती क्यों हैं जलन,
और पानी क्यों करता गिला हैं ,
करेंगे क्या आप ,
सर खुज्लायेंगे और कर क्या पायेंगे !
अरे आप तो अभी से घबरा गये
येँ तो बस शुरुआत हैं
इनके साथ जो होगा
तो सैलाब ऐसे ही सवालों का आयगा !
सूरत बहुत भोली हैं , सीरत भी भोली हैं
ऊपर जगह मगर थोड़ी खाली हैं
इन सवालों की वहां होती खूब पैदावार हैं
साथ इनका लगता प्यारा हैं ,
मगर खुले जो इनका मुह
बेहतर हैं ढून्ढ ले कोई किनारा !
चर्चा आजकल इनके सवालों का आम हैं
दिया किसी ने "स्नूपी" इनको नाम हैं ...
--- अमित ०१/०४/२०१०

Monday, March 22, 2010

शब्दों की धार ...

गये दिनों से चर्चा कुछ गर्म थी
दिखाई न दिए वो एक अरसे से
बात लोगो को हज़म कम थी !
सुगबुगाहट तो कानो तक उनके भी थी
दे कान हर एक आहट पर
आदत येँ जरा उनको न थी !
सही ही हैं
सूरज को नहीं ज़रूरत
करे मुनादी अपने आने की
सात घोड़ो की टापे
काफी हैं सोतो को जगाने !
छुपा रहे चाहे लाख बदली में
आना ही हैं बाहर
रौशनी अपनी उसको फैलाने !
हुई आज जो वापसी फिर
वही चमक हैं आँखों में
शब्दों के खिलाड़ी हैं
वही धार हैं बातों में ...
(on seeing yatish active after long time )

शीर्षक की खोज जारी हैं ...

काफ़ी दिन हो चले हैं अब
और हम हैं कि
बस सर खुजलाये जा रहे हैं
कागज़ कलम तो हैं हाथ में
पर लिख न हम कुछ पा रहे ,
बनती है तो बस
चंद आढ़ी -तिरछी लकीरे !
शब्दों को जोड़ना तो
मानो जैसे भूल गये ,
ख्याल तो मानो हवा हो गये
छुआ मन को और गायब हो गये !
जल बिन मछली क्या होती
समझ हमको अब आता हैं ,
जुबान तो पहले ही खामोश थी
कलम का भी अब साथ छुटा जाता हैं ...
--- अमित ०१/०४/२०१०

Sunday, March 7, 2010

बेटे की करनी...

घर में हुआ बेटा , मनाई गई खुशियाँ
बस चंद ही दिनों में सामान्य हो गई दुनिया
ज्यों ज्यों , बड़ा होता बेटा
वो सुनता, जो पिता उसका कहता
"बेटा, किये मैंने सब जतन,
और ज्यादा मैं मेरे से कुछ होता...
देखे हैं दुःख मैंने बहुत,
चाहता नहीं मैं , तू वो देखे ,
कर खूब पढाई , खूब मेहनत
मुझे हैं डर , मैं कुछ ज्यादा कर पाऊँ "
बेटा था आज्ञाकारी
चाह थी आशाये, पिता की पूरी हो सारी...
भुला दी दुनिया सारी, और की दिन रात मेहनत
चंद दिनों कि दूरी, ने रंग दिखलाया
कल के त्याग ने, आज जाके रंग दिखलाया
बदल गयी घर कि सूरत सारी...
सारा घर परिवार संग खुशियाँ अब मनाता हैं
रहती चमक आँखों में पिता कि,
और गर्दन बेटे के सम्मान से हुयी ऊँची...
--- अमित ७/०३/2010

Saturday, February 20, 2010

फिर किसी ने कहा ...

कल किसी ने कहा था,
आज आपने कहा है
और कल फिर कोई कहेगा
अभी तक तो कुछ हुआ नही
आसार आगे भी कुछ है नही,
लोग आते जायेंगे
और इन बहरो के आगे चिल्लाते जायेंगे ,
इनको कुछ सुनाई न तब दिया था
और न ही कुछ आज
और बात रही कुछ दिखाई देने कि ,
तो आज यह भीड़ इतनी है कि
गर्दन निचे करो तो अपना पैर भी न देता दिखाई
याद तो होगा ,
भगत सिंह ने कहा था " बहरो को सुनाने के लिया धमाका ज़रूरी हैं "
आज ज़रूरत हैं कि लोगो के कान के नीचे धमाका हो
असर तुरंत होगा ,
अगली सुबह भारत में उदय नया सूरज होगा ...
(नवभारत अखबार में भारतियों की दशा पे एक लेख पर )
--- अमित ०१/०४/२०१०

Saturday, January 23, 2010

जज्बातों का सैलाब सा आता...

कभी - कभी मेरी दिल में
जज्बातों का सैलाब सा आता,
ले सहारा कलम का,
बन शब्द, किसी कागज़ पर बह जाता,
कभी कभी मेरी दिल में
जज्बातों का सैलाब सा आता,
बैचैनी किसी से कैसे कहे
कहकहों कि भीड़ में, बस तन्हा सा रह जाता
कभी कभी मेरी दिल में
जज्बातों का सैलाब सा आता,
जम जाती जो यादों पर समय की धुल
तन्हाई में बन , अश्क की बुँदे
संग उसे येँ बहाले जाता
कभी कभी मेरी दिल में
जज्बातों का सैलाब सा आता,
--- अमित

Thursday, January 14, 2010

अँधेरा ...

सही ही कहा हैं कहने वाले ने
कंही नही मिलता हैं जब सहारा
कागज़ और कलम ही होते हैं
डूबते इन्सान का सहारा
लगता हैं मुझे, में हु अधुरा
मंजिल पर आकर ढूंड रहा किनारा
करता में ज्यों ज्यों कोशिश
बढ़ता ही जाता येँ अँधेरा
समय के साथ सोच संभलती हैं
बदला हैं अपने आपको भी
बदली अपनी राहें और, थामा हाथ तुम्हारा
लगता था ...
बन जायेंगे एक दूजे का सहारा
समय के साथ सोच बदलती हैं
तुम भी कहा बच सकते थे
लड़खड़ाने फिर हम लगे
चाह था खुशहालियां होंगी
पर रंग अपना समय ने फिर दिखलाया
बढ़ता जा रहा अँधेरा
ज्यों ज्यों हाथ मेने बढ़ाया
......
अमित १३/०१/२०१०

Wednesday, January 13, 2010

दोस्तों कि शिकायत (^_^)...

कहते हैं यार हमारे
सो गया हैं कवी अन्दर का हमारे
हुआ अब अरसा
निकली न कोई कविता
कलम से हमारे
केसे हम समझाएं
कवी कभी सोता नही
हो अगर बंद आंखे
ख्यालो में अपने होता
ध्यान उसका चारो और लगा होता
जेसे ही मिलता
कुछ अनोखा, दिल को जो छूता
दे उसको अपनी कलपना का रंग
कवी अपने शब्दों में पिरोता
देखो, दोस्तों कि शिकायत
दिल को अपने " भा " गयी
और ले कविता का रूप
सामने आपके आ गयी
धन्यवाद्

२०१२- नए युग...

नया युग आने को हैं,
चिन्ह देते हैं, आज दिखाई
आकर्टिक और हिमालय से पिघलती बर्फ,
देती हैं इसकी गवाही...
आने को हैं, नया
युग चिन्ह देते हैं आज दिखाई
धरती का सीना चीर,
जो कल भूकम्प आया था
संदेशा वह यही लेकर आया था
आने को हैं नया युग
चिन्ह देते हैं आज दिखाई
रेगिस्तान में आती ,
बाढ़ और पड़ती बर्फ पचास साल बाद
हमको अब चेताती हैं ...
संभल ऐ इन्सान
आने को हैं नया युग
चिन्ह देते हैं आज दिखाई,
ऊँची लहरे सुनामी कि
दिखाती अपना विकराल स्वरुप
देख के उसकी शक्ति अपार
बोना लगा आज इन्सान
इतनी गलतिया कर चूका इंसान
कि अब संभल पाना है कठिन ...
नए युग कि अब पूरी तैयारी है
देखना बस येँ है, कि...
किस कि बारी है
हम करेंगे इसका स्वागत
या पड़ना है येँ हमारे बच्चो पे भारी ...
--- अमित 0१/०१/२०१०

Friday, December 25, 2009

इश्तिहार बोर्ड...

बात हैं गये रविवार की

शाम ढले बैठे थे बाग़ में

किनारे की दूकान पर

आकर गाड़ी एक बड़ी रुकी

आदमी उससे उतरे दो

निकाल एक सीढ़ी

झट छत पर जा पहुंचे वो

हरकते कुछ संदिघ न थी

कौतुहल वश निगाह उन पर टिकी

सामने था उनके एक "इश्तिहार बोर्ड"

संभाला उन्होंने तब अपना समान

यकीन जानिये

पांच ही मिन्टो में ख़तम किया अपना काम

सामने था अब हमारे, ६*१० का नया इश्तिहार

दो दिन गये फिर निगाह फिर उस पर गई

देखा, जो था दाढ़ी बनाता आदमी

शरबत पी इठलाती लड़की बनी

दिखा उसे जब आज सुबह , चौक कर आँखें खुली

पाया आज फिर एक नया इश्तिहार

"यह जगह खाली हैं , आप दें अपना इश्तिहार" !!!

(सच्ची घटना पर आधारित )

--- अमित २०/१२/2009

मुद्दे ...

दुनिया घिरी हैं आज मुद्दों से

हल किसी से न एक होता !

सोचो अगर मेज से हट

फैसला इनका खुले मैदान होता !

कश्मीर का मुद्दा क्रिकेट से अगर तय होता

"शारजहाँ " में तो "पाक" कश्मीर हम से ले गया होता !

और रंगभेद को ले कोई सिडनी गया होता

"पोंटिंग भैया " ने तो आस्ट्रेलिया को क्लीन चिट दिला दिया होता !

आतंकवाद अगर "वहाईट हाउस" छोड़ "अफगानिस्तान" में हल होता

कौन जाने आज "ओबामा" नहीं "ओसामा" विश्व नेता होता !

परमाणु अप्रसार को अगर "लालू " को सौपा होता

सारा "युरेनियम" उसकी भैंसों ने पचा दिया होता !

सोचो बेमानी , घूसखोरी , भर्ष्टाचार का कॉम्पटीशन होता

धन्यवाद हमारे नेताओं को ,

स्वर्ण , रजत और कांस्य सब इन्होने "भारत" के नाम करा दिया होता ...

--- अमित ३/१२/२००९

गलत-फ़हमी...

गलत तो नहीं था वो
और शायद मैं भी नहीं
या कहूँ कि कोई नहीं
गलत तो हालात थे
और उनका अंजाम
"गलत-फ़हमी"...
येँ कब आ गई
उन दोनों के बीच
और दिखाया अपना रंग
पता ही नहीं चला ...
जिस्म में जान से थे दोनों
और यों जुदा हुए
जैसे कभी मिले ही न हो दोनों ...
हालात ने इस कदर तोडा हम को
सोच सके हम कुछ और
ऐसा भी न छोड़ा हम को...
जिन्दगी के उस दोराहे पर
जुदा हुए हमारे रास्ते
दूर ... बहुत दूर
जब जिन्दगी आज मुझे ले आई
जाने क्यों "तेरा" ख्याल आया ...
--- अमित २६ /२/२००९

कहानी एक शब्द की...

सुनाते हैं कहानी एक शब्द की
शब्द येँ देखिये बड़ा हैं भारी
और विचित्र बात येँ , नाम इसका "आभारी"
व्याकरण हमारी हैं कहती
गर जो जोड़ा "अ" उल्टा होता अर्थ
नाम को देखो हुआ "अनाम"
और मानुष बन गया "अमानुष"
कहानी इस शब्द की हैं जरा उलटी
होते अगर आप किसी के "आभारी"
इंसान वो पड़ता आप पर भारी
आभार व्यक्त करना तो क्रतज्ञता हैं
अर्थ को इसके न समझना क्रत्घनता हैं
आज मगर क्रतज्ञता, क्रत्घनता से हारी हैं
और हराने वालो का जग "आभारी " हैं ...
--- अमित २/१२/२००९

Wednesday, October 21, 2009

एक घटना ...

इसे साहस कहे या दुस्साहस

आधुनिकता कहे या बे-शर्मी ,

फैसला आप पैर छोड़ता हूँ

देखा जो इन आँखों से

किस्सा आप से वो कहता हूँ

करता था एक बस स्टेशन पर

श्री-मति जी का मैं इंतज़ार

माहौल बडा ही नीरस था

और बढती चहल कदमी से

खोता जा रहा धीरज था

निगाह हमारी आवारा पंछी सी

कहाँ एक जगह ठहरती हैं

इधर उधर घूम

साथ लगी बेंच पर पड़ी

अभी तक थी जो सुस्ती

वो अब अचरज बनी

बैठा बेंच परएक प्रेमी युगल था

फूटती दोनों से बडी प्रेम उमंग थी

गुजरने के लिए बीच

हवा को भी जगह तंग थी

देख कर उनके हाथों कि शरारत

हमको होती जा रही थी हरारत

जिस तरह वो थे एक दूजे में गम

देख कर उनको होते थे होश अपने गुम

उनकी देख येँ हरकत दिमाग अपना चल गई

जो देखी घटना, वो कविता बन सामने आ गई ...

--- अमित २२/११/०९

Wednesday, August 26, 2009

ऐसा बस यहीं होता...

देखा हमने एक नज़ारा
महाशय एक गरिया रहे थे
हाथ जोड़ थानेदार साहब
बस मिमिया रहे थे
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे
ऐसा बस यहीं होता ।
कर जमा शेरो की फौज़
मुट्ठी भर गिदडो से घबरा रहे
ऐसा बस यहीं होता ।
छोटी ' इ ' की मात्रा
उलटी नही सीधी लगती
हिन्दी के गुरुओ को
अंग्रेज़ी का छात्र
देता यह ज्ञान
ऐसा बस यहीं होता ।
छोड़ के अपने संगी साथी
दूर वेबसाइट पर
बनाता नए रिश्ते इन्सान
ऐसा बस यहीं होता ।
---अमित (२/०९/०९)

Saturday, August 22, 2009

चरित्र चर्चा...

बडे एक शापिंग मॉल के

महंगे एक कैफे में

कर रहीं थी वो चुहल !

चर्चा बड़ी ही ख़ास थी

शर्मा जी के बेटी

जो दिखी वर्मा जी के बेटे के साथ !

एक ने कहा, " देखा "पर " निकल आए है !"

दूजी कहाँ चुप रहने वाली थी

अरे आप को नही होगा पता

"सुबह से शाम गुजरती साथ है "

आज कल तो बच्चो का चलन ही खराब है !

चर्चा चलती गई और कालिख पुतती गई !

घनन -घनन तभी मैडम का फ़ोन घंनाया

हंस खिलखिला कर दो बातें हुई

थोडी देर में मिलने का समय ठहराया !

किया सहेली को विदा अपनी

और घर फ़ोन लगाया

बेटा , पापा को बोलना

मम्मा को अर्जंट मीटिंग का कॉल आया,

आते घर शाम को देर होगी जरा !

थोडी देर गये पापा का भी फ़ोन आया था

फंस गये है वो मीटिंग में ये फरमाया था ,

मम्मा, बेचारी को कहाँ था पता

पापा की मीटिंग है उसी सहेली के साथ

चरित्र चर्चा चल रही थी जिसके साथ ...

--- अमित २२/०८/०९

Sunday, August 9, 2009

फर्क कहाँ हुआ ???

उतारे जो उसने
कपड़े अपने तन से
मिटाने को भूख
अपने पेट की और
बेचा अपना शरीर
नाम हुआ "वेश्या"...
उतार कपड़े अपने
जब चलती
वो बल खाके
आगे एक कैमरे के
मिलती ख्याति
होता नाम...
सौपती जब खुद को
करने नया अनुभव वो
बस चंद रातो को
फिर मिलता नाम
"वेश्या" नहीं अब
सम्मानित स्त्री का स्थान ...
क्या अलग दोनों ने किया???
कमाल है
फर्क फिर भी हुआ यहाँ...
(रास्ट्रीय स्तर की एक महिला खिलाडी के धन और काम के आभाव में वेश्या वर्ती में आने पर ...)
--- अमित ०९/०८/०९

Sunday, May 3, 2009

कहाँ जाऊं मैं ...

दिल करता है

ज़ोर से चिल्लाऊं मैं

सामने है जो दिवार

उस से सर टकराऊं मैं

देखता हूँ जब आइना

करता है दिल कर दूँ चूर आइना मैं

घुटा है दम में इस चार दिवारी में

तोड़ के ये बंदिशें भाग जाऊं मैं

सभी तो यहाँ अपने ही है

इल्जाम किस के कत्ल का लूँ मैं

अपनों को कत्ल कर नही सकता मैं

हौसला नही कर लूँ ख़ुद -कुशी मैं

सोचता हूँ अब

जहाँ न ढूँढ सके कोई मुझे

जा कर ऐसी जगह खो जाऊं मैं ...

--- अमित ३ /०५/२००९

Wednesday, April 29, 2009

उस्तादों के उस्ताद...

करनी जो हो किसी की खिचाई
सबसे आगे नज़र हम आए
बात बे बात मारने में
महारत जो हमने पाई
बस एक बार भिड कोई हमसे जाए
समझो शामत उसकी आई
हुई न जब तक मान - मुनव्वल
किसी की न जान बची
दिन-ब-दिन बढता गुरुर जा रहा था
नाचीज़ अब हर कोई हमें नज़र आ रहा था
सोचता तो ऊंट भी है
नही है कोई उसका सानी
आता वो भी जब नीचे पहाड़ के
हो जाता गुरुर उसका भी पानी
हुआ हाल अपना भी उस ऊंट सा
हुआ जब सामना उस शख्स का
समझा जिसे बस धूल था
अपनी बातें, उलटी हम पर ही आती थी
जुबान अपनी आगे उसके खुल न पाती थी
नौसिखिये सी हालत अपनी नज़र आती थी
हम तो थे उस्ताद , मगर
मिल गये आज हमे " उस्तादों के उस्ताद "
सबक अच्छा हमको सिखाया
दूर रखो कला से गुरुर ,
ये गुरुर न कभी किसी के काम आया ...
--- अमित २९ /०४/०९

Sunday, April 19, 2009

जुगाड़ की कहानी ...

बचपन से सुना है एक शब्द हर मोड़ पर ...
नाम है उसका "जुगाड़ "
जो भी मिलता "जुगाड़ " का चर्चा करता ...
कैसे हुआ ये पैदा
इसकी भी अपनी कहानी है ,
जो पेश अपनी जुबानी है ...
हुई जब चाह एक बच्चे की,
किया गया "जुगाड़" के बेटा हो ...
हुआ बडा जब वो बच्चा,
किया "जुगाड़" स्कूल उसका अच्छा हो ...
बच्चे मास्टर जी के भी थे,
किया "जुगाड़" के कुछ टयूशन हो...
स्कूल , कालेज हुआ अब पुरा ,
लगा "जुगाड़" की डिग्रिया जमा ...
डिग्रिया तो आ गई अपने हाथ ,
किया "जुगाड़" नौकरी बाड़िया हो ...
"जुगाड़" सारे काम अपना कर गये ,
पटरी पर आ गई जीवन की गाड़ी ...
अब तो बच्चा जवान हो चला ,
दोहरानी है फ़िर यही कहानी ...
"जुगाड़" भी गज़ब है ,
देता "दो बूँद जिन्दगी की "...
चाहती है दुनिया ,
हमसे मिल जाए उनको भी ये "जुगाड़"...
जानते वो नही ,
चलते हम हिन्दुस्तानी लेकर नाम "जुगाड़"...
-- अमित १९ /०४/२००९

Tuesday, April 14, 2009

जलाई "जोत" ...

कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल में थी

अपने लिए तो सबको होती है

दुसरो के लिए , दिल में उसके थी ...

भीड़ से अलग रास्ता बनाना

काम येँ इतना आसान नही

आसानी से जो मिल जाए

वो मकाम , उसका मकाम नही ...

तैयारी अपनी भी पूरी थी

पता था ज़माना यों साथ न आएगा

ना जाने कब और कहाँ

यें ज़माना उंगली अपनी उठाएगा...

डर कोसो उसके कदमो से दूर था

पता था,

चाह है अगर रौशनी की

जलाना कुछ तो जरूर होगा ...

जले भी , तडपे भी ,

देख बदलते लोगो को

दिल दुखा भी ...

कदमो को पीछे हटा लेना

उसने कहाँ सीखा था

ऐसे लोग कहाँ मंजिल तक जाते है

मंजिल ख़ुद उनके क़दमों तक आती है ...

जीत आख़िर सच की ही होती है

उसकी दिखाई "जोत "

ज्वाला आज बनी जाती है ...

काम उसका हुआ पूरा

बारी अब हमारी है

जलाए यें जोत रखना

जिम्मेदारी अब हमारी है ...

( अपने गुरु जी को समर्पित )

--- अमित १४/०४/२००९

Monday, April 6, 2009

बे-शर्मी ...

सुनते है
शर्म आंखों में होती है
मतलब हुआ
ये सब के पास होती ...
फ़िर क्यों
हमेशा ये शर्म नही देती दिखाई
राम ने आँखें तो सब को दी ...
सम्भव है
वहां भी किसी ने दलाली खाई
किसी को दी ज्यादा
और कर दी किसी के साथ बे-वफाई ...
हमारे साथ भी कुछ यूँ ही हुआ
वफा हमारे हिस्से में और
उनको मिली बे-वफाई ...
बे-शर्मी के इनकी चर्चे आम है
और हम
अपनी शर्म से परेशान है ...
बाज ना आते अपनी हरकतों से यें
जब देखो
इधर - उधर टांग अपनी अडाते यें
और मुंह की खाने के बाद
शेखी और बघारते यें...
देख इनकी ये बे-शर्मी
तरस हम इन पर खाते है
ख़ुद हम शर्मा कर
दुसरे रस्ते हो जाते है ...
बे-शर्म ये भी कम नही
दिखाने कोई नया करतब
फिर यें पीछे पीछे चले आते है ...
--- अमित ६/०४/०९

Monday, March 30, 2009

कुर्सी और यें ...



कुर्सी,


इस शब्द में ही अजीब सा खिंचाव है


देखते ही अपनी और खिंच लेती है


और जाते ही आगोश में इसके


जैसे मिट ही जाता सारा दर्द...


तभी तो देखा है


जितना बुड्ढा होता कोई


उतनी है बडी कुर्सी लेता ...


पता नही ,


कुछ को ये कुर्सी रास क्यों नही आती


या कुर्सी को "कोई" पसंद नही आता


और लेती कुर्सी किसी को तडपाने का मज़ा ...


देखते ही इनको कुर्सी को सूझता मजाक


ऐसा ही कुछ होता इनके साथ


जब होते ये जनाब कुर्सी के पास


उग जाते जैसे कांटे कुर्सी में


जिन्हें देख भागते फिरते यें ...


दूर से यें देंखे तो फूलों सी लगती कुर्सी


और बैठते ही इनके


अंगारों सी दहकती कुर्सी ...


खींचती कभी चुम्बक की तरह


और बैठते ही इनके


बिजली का झटका दिखाती कुर्सी ...


गज़ब है ये कुर्सी


जाने क्यों इनको इतना तडपाती


है ये बैरन कुर्सी ...


--- अमित ३० /०३ /२००९

Sunday, March 22, 2009

घुमने गये पार्क ...


कई दिन गये ,

आज फ़िर गये हम

घुमने वही "पार्क"...

छोटे छोटे पेड़ों

फूलों की कियारियों

और सुंदर फ़वारे से सजा ,

बडा सुन्दर लगता वो "पार्क"...

आज तो दर्शय था बहुत प्यारा

छोटे छोटे , नन्हे - मुन्नों से भरा था वो "पार्क"...

इधर देखा वो छोटा बच्चा

छोटे छोटे कदमो से भागा जाता था

भाग रही थी माँ उसके पीछे

हाथ मगर कहाँ वो उसके आता था ...

एक कूदता पानी में फ़वारे के

दूसरा देखा उसे घबराता

और जा अपनी माँ पास छुप जाता

मन फ़िर करता पानी में कूदे

क्या करे वो डर फ़िर जाता ...

वो देखा गेंद से बालक एक खेलता

मारता कभी पाँव से गेंद को

और कभी ख़ुद ही गिर जाता

हो खडा और ज़ोर लगा पाँव मारता ...

देख देख बच्चों के करतब
बडा मजा आता था

मन तो अपने बचपन में भागा जाता था

काश रोज़ ऐसी शाम आए

जो बचपन में मेरे मुझे ले जाए ...



--- अमित २२-०३-२००९




Monday, March 9, 2009

ठहराव...

ठहर सी गई है जिन्दगी;

अब कुछ ऐसा लगता है ...

आ कर एक दोराहे पर

कुछ सोच में पड़ गई है जिन्दगी

अब कुछ ऐसा लगता है ...

करने को तो है बहुत कुछ अभी

जाने जान हाथों से निकल गई हो

अब कुछ ऐसा लगता है ...

शयद सुबह करीब ही है

घना हुआ अँधेरा सा लगता है

मैं तो चाहता हूँ नींद से उठना

जाने क्यों शरीर थका सा लगता है ...

कुछ तो हो ऐसा अब

जो कर दे मुझे सागर सा चंचल

ये ठहराव अजीब सा लगता है अब ...

पता नही क्यों ...

पता नही क्या था वो
समय का बहाव
या;
मेरे दिल में
कुछ ज़ज्बात दबे थे
जो बह निकले शब्द बन कर
और नाम हुआ कविता
पता नही ...
आज भी , वही मैं हूँ
वही मेरा दिल
वही मेरी ज़ज्बात
गर नही है कोई तो
बस शब्द ,
पता नही क्यों ...

Friday, March 6, 2009

शांत रहो ...

हर गये दिन जुमला एक

कानो में हमारे पड़ता हैं

छोड़ा हमको नही जायेगा

हर हिसाब हम से

एक दिन लिया ज़रूर जाएगा ,

कह कर कोई

गुस्से से अकड़ता हैं ...

आदत से हम भी मजबूर हैं

गुस्से पर मुस्काते हैं

जले हुए दिल को ,थोड़ा और जलाते हैं ...

येँ जनाब भी , जरा हट के हैं

सोचते हो हैं , जाने क्या कर देंगे

पकड़ कर कान चाँद का

जमीन पर ला रख देंगे

और पकड़ कर दुम शेर की

बना दरबान ,

खडा दरवाजे पर कर दंगे ...

धाक जम मगर कहीं न पाती हैं

बनती - बनती बाजी इनकी , बिगड़ ही जाती हैं

पासे जाने पलट कैसे जाते हैं

होकर इनका , इन्हे ही चिडाते हैं ...

खिसाय्नी बिल्ली सी इनकी हालत रहती हैं

और दुम सदा टांगो में छिपी रहती हैं ...

पडे जब भी उस पर पैर हमारा

"शांत रहो - शांत रहो "

गूंजता हैं कानो में येँ नारा ...

--- अमित

आला रे आला ...

आला रे आला

SPICE-08 आला

सब टीमो ने अपना

परचम संभाला

आला रे आला
SPICE-08 आला

"सुखोई" जहाँ

ताकत में मदमस्त है ,

"पृथ्वी " भी वहां

सम्मान बनाये रखने की जुगत में व्यस्त है .

"अग्नि " और "भार्मोस"

दोनों तरफ़ से न कुछ आहट है

कमजोर न कोई इनको समझो

रणनीति के गुरुओं से भरपूर

दोनों टीमो की पुरी तैयारी है

देखना बस यह है

तरकश में तीर किस के कितने है

अब मैंदान में आने की बारी है ...

(SPICE : A sport event in Infosys for CCD Project...)

--- अमित

Thursday, October 9, 2008

सब से अलग है पहचान हमारी ...

पनपते है हजारो सपने

हमारी आंखों में

और करते है हम सर्जन

उन रास्तों का

हो जिन से सच हमारे सपने

दी गई जब भी कोई चुनौती

हमने हाथो हाथ लिया

दृढ़ निश्चय कर हम आगे बढे

आसान माना ये डगर नही

साहस, भी यहाँ कम नही

रख अपने मूल्यों को ऊँचा

हर चुनौती पर विजय हमने पाई

देख ये बढ़ता हुआ आत्म विस्वास हमारा

जुड़ता जा रहा है हमसे दुनिया का हर किनारा

और आगे ही बढता जा रहा है कारवां हमारा

सबसे आगे जाने की है पूरी तैयारी

समय से तेज है रफ़्तार हमारी

हाँ , सब से अलग है पहचान हमारी ...

--- अमित २८ /०९ /०८

Tuesday, July 29, 2008

संघर्ष...

प्रचार का ज़माना है
प्रयास चारो ओर पुर ज़ोर है
हमें भी प्रतिस्पर्धा में आना था
हम क्या किसी से कम है
बस यही सब को दिखाना था
नित नये प्रयास किये जाते थे
खेल हुआ या हुआ कुछ सहयोग
बढ़ चढ़ कर हमने भाग लिया
परिणाम चाहे कुछ रहा हो
हम हर ज़गह नज़र आए
दिनों दिन हम आगे बढ़ते जा रहे थे
और सब की नज़र में चढ़ते जा रहे थे
ज्ञान बाटने से बढ़ता है,
यही सोच ठान लिया ,
ज्ञान बाटकर, ज्ञान बढाने का काम
और दिया "संघर्ष" इस शुरुआत का नाम
देर ही सही
मगर महनेत रंग लाती है
"संघर्ष" को देखो,
नया सीखने की चहा साफ़ नज़र आती है ...
संघर्ष: It was a knowledge sharing event in Infosys by my team CCD...
--- अमित २९/०७/०८

Saturday, July 12, 2008

इतने तुम याद आओगे

चाहे जहाँ चाहो

चले तुम जाओ

कौन परवाह करता है

क्या तुम्हे लगता है

बस तुम से ही हम है

न होगे तुम तो

कहीं न हम होंगे

तुम्हे क्या पता

बस, अपने दम से है हम

याद न एक दिन आयगी

मजे में बसर जिन्दगी हो जायेगी

क्यों ये विश्वास

आज हमे धोखा दिए जाता है

रह रह साथ गुजारा

हर पल याद आता है

की जो तुम से बे-रुखियाँ

जला उनसे आज मन जाता है

याद तुम न आओगे

ये महज एक धोखा था

न पाकर तुम्हे करीब

दिल अपना रोता है

ये न सोचता था कभी

इतने तुम याद आओगे ...

--- अमित १२/०७/०८

Friday, July 11, 2008

आज़ादी ...

आज़ादी,
शब्द सुनते ही,
जोश की लहर दौड़ जाती
जोश तो जोश है
समय, बे-समय आ जाती
होश अगर इसमे खो जाए
यारो, शामत बडी आ जाती
हाल अपना भी कुछ ऐसा हुआ
श्रीमति जी जो मायके गई
१५ अगस्त सा हर दिन लगता
किस को अब पडी है
जो सुबह सुबह उठता
सुबह की सैर अब कहाँ होती है
९ बजे आँखे अब खुलती है
घर का काज कैसे, क्या होता है
नई आज़ादी में ख्याल कहाँ होता है
अखाडे में जा अब देही कौन तोडे
काम और करने को हमने रख छोडे
फल अब से कहाँ खाए जाते है
रोज पिज्जा - बर्गर मगाए जाते है
आख़िर, आज़ादी का जोश था
आगे क्या होगा किसे होश था
श्रीमती जी कब वापस आएँगी
जोश मैं ये भी भूल गये
गई शाम घर जब लौटे तो
देख श्रीमती जी को घर पर
हाथ से तोते छूट गये
देख हालत घर की और हमारी
वो गुर्राई जाती थी
सुनके दहाड़े उनकी,
जोश को भी धीरे धीरे होश आई जाती थी
हालत पर अपनी बडा तरस आता था
अब हमे ख्याल आता था
जब से हुई शादी, दूर हुई हम से आज़ादी ...
--- अमित ११/०७/08


Monday, June 30, 2008

हालात ...

देता है हर कोई
दुहाई, अपने हालातो की
अगर हालात हुए कुछ और होते
तो अपना ये मुकाम न होता
जहाँ आज गिनते हो तुम औरों को
वही कहीं अपना भी नाम होता
ऐसा नही के हम काबिल न थे
बस, बदले जमाने से वाकिफ नही थे
दावं - पेच इसके हमें समझ नही आते थे
और साथी हमारे आगे निकल जाते थे
सच्ची लगन मगर कहाँ छुप पाती है
रात कितनी भी घनी हो
सुबह से हार ही जाती है
तुम रहो साथ मेरे ,
करो मेरा विश्वास
और कोई नही , ख़ुद बदलूँगा
मैं अपने हालात
मैं करता नही वादा
कि तारे मैं तोड़ कर लाऊँगा
साथ रहो तुम मेरे
आकाश तक तुम को ले जाऊं मैं ...
--- अमित ३०/०६/०८

कहते है वो ...

कहते है वो

हम से भी हो परदा

तो क्या हुआ

जो हम है एक - दूजे के

शर्म तो हमारा गहना है

आप कुछ कहे

हमें तो परदा-नशीं ही रहना है

ना रहे परदे में तो

हया से आँखे झुक जाती है

हाथों में लगी हिना की लाली

रुखसारों पे आ जाती है

सर्द सा जिस्म होने लगता है

जान सी जैसे, निकली जाती है

आप तो बडे बे-शर्म है

शर्म आप को कहाँ आती है

मिलती है आप से नज़रे

और जान हमारी जाती है

हलकी सी एक छुहन

सिरहन एक जिस्म में दौड़ जाती है

अभी रहो जरा दूर ही हम से

महोबत की ये खुमारी

हम से न सही जाती है ...

---अमित ३०/०६/०८

Wednesday, May 14, 2008

नारी कहे ...

नारी कहे

क्यों बनू मैं सीता

तुम राम बनो या न बनो

मैं अग्नि परीक्षा में झोकी जाऊँगी

तुम तो फ़िर रहोगे महलो में

और मैं वनवास को जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं द्रोपदी

तुम धर्म-राज बनो या न बनो

मैं तो जुए में फ़िर हार दी जाऊँगी

तुम करोगे महाभारत सत्ता को

इसकी दोषी मैं रख दी जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं तारा

तुम हरिश्चंद बनो या न बनो

मैं तो नीच कहलादी जाऊँगी

मेरे बच्चे को मारोगे तुम

उसे जीवित कराने को मैं बुलाई जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं मीरा

तुम कान्हा बनो या न बनो

मेरी भक्ति तो फ़िर लज्जित की जायेगी

तुम को तो कुछ न होगा

और मैं विषपान को विवश की जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं अहिल्या

मैं तो फ़िर किसी इन्द्र के द्वारा छली जाऊँगी

और जीवन पत्थर बन राम की प्रतिक्षा में बिताओंगी

नारी कहे , कोई बताय

क्यों बनू मैं आदर्श नारी

क्या कोई आदर्श पुरूष मैं पाऊँगी ...

--- अमित १४/०५/०८

आई-टी २०५० में ...

दोपहर को जब साहिब-जादे उठे
कुछ उदास से लगे
यों तो दिन सूरज चढ़े ही होता है
मगर यदा कदा दोपहर को भी होता है
हाल जब पूछा, तो यों जबाब आया
डैड,
सिस्टम मेरा सारा डाउन है
बिहेव बडा इम्प्रोपर है
प्रोसेसिंग हो रही स्लो हैं
मेर्मोरी से सी-पी-यू को सिग्नल नही जाता है
डाऊनलोड कुछ हो नही पाता है
प्रोसेसिंग शुरू होते ही सिस्टम हंग हो जाता है
कल से हार्ड डिस्क मेरी ब्लंक है
कल गर्ल फ्रंद का ई-मेल आया था
प्रोपोसल का रिफियूज़ल उसमें पाया था
पिंग भी कर दिया उसने ब्लाक है
सी-पी-यू तब से देता बीप है
हुआ वायरस एटैक सा मेरा हाल है
साहिब-जादे की हालत हमे समझ आ गई
फॉर्मेट अपने सिस्टम को कर डालो
पढ़ई का उसमे ओ-एस डालो
फिर न हो कोई वायरस एटैक
इसलिए लगाओ स्पोर्ट्स का फायर वाल
झट सॉल्यूशन हमने दे डाला
२०५० का है अपना अंदाज़ निराला
आई-टी बनके रह गया जग सारा...
--- अमित १४/०५/०७

Saturday, April 26, 2008

भावनाए ...

दिखाई नही येँ देती हैं
समझा बस इनको जाता है
बाँधी नही येँ जाती हैं
बंधा इनसे बस जाता है
जुबाँ कुछ होती नही इनकी
इन्ही से इनको समझा जाता है
जात- पात, धर्म-मजहब
इनको कुछ पता नही
रिश्तों की कोई ज़ंजीर नही
सरहदों से कहाँ येँ थम पाती हैं
चीर सरहदों को
दूर दिलो तक जाती हैं
नही कुछ और येँ
भावनाए हैं,
जो हर दिल में पाई जाती हैं ...
--- अमित २६/०४/०८

Friday, April 25, 2008

सोच ...

अक्सर मैं कुछ लोगो की
बातो पर बस मुस्काता हूँ
देख कर उनकी सोच समझ
ख़ुद सोच में पड़ जाता हूँ
ये कर देंगे, वो कर देंगे
ये ग़लत है, ये नही होने देंगे
नारे वो सब लगाते है
काम नही कुछ और उन्हें
बस बातों की वो खाते है
और बातों में ही वो जीते है
आए जब मौका कुछ करने का
दूर नज़र न ये आते है
कहना तब इन का होता है
हमने तो बस सोचा था
सोच से कहाँ कुछ होता है
हम तो अकेले ही है
अकेले जन से क्या होता है
अब मूढ़ों को कौन बताए
सोच से ही सब होता है
एक अकेला सोच अपनी बदले
देख उसे दूजा फिर सोचे
देख बदलता फ़िर दूजे को
तीसरा को लगता वो भी सोचे
सोच में वो ताकत
जब बढ़ कर रूप अपना लेले
सिहासन ख़ुद हिलने लगता है
और स्मिर्धि का फूल
हर तरफ़ खिलने लगता है ....
( अपने गुरु जी को समर्पित )
--- अमित २५/०४/०७