Saturday, May 18, 2013

बाई महिमा !!!

देवी जी कल एक, बस में हमारी आई
बैठ बगल में उन्होंने फ़ोन लगाई !

कानो में हमारे फिर उनकी मधुर वाणी आई
लगा हमे को सुबह सुबह बॉय- फ्रेंड को फ़ोन लगाई !

शब्द कानो में फिर कुछ और आये
क्या था असल माजरा हम तब समझ पाये !

दो दिन से "बाई जी" उनकी नहीं आई थी
चल रही उनपर मक्खन लगाई थी !

देवी जी हमको तो कुछ अबोध नज़र आई
"बाई महिमा" शायद अभी उनको नहीं समझ आई !

हे ईश्वर दे अज्ञानियों को कुछ ज्ञान
इसी भावना से करते हम "बाई महिमा" गुणगान !

हे बाई जी, अब सूरज की उपमा आप से दी जाती
जिस दिन आप न आये, सुबह ही न हो पाती !

घर की शोभा अब आप से दर्शायी जाती
जहाँ जितना आप का वास, उतनी ही समर्धि बताई जाती !

लक्ष्मी जी के गुणगान अब कुछ कम गाये जाते है
अन्नपुर्णा सब अब आप को ही बताते है !

सत- दिन न हो जिस घर आप के दर्शन
फिर आते उस घर बस नये ही कुछ बर्तन !

घर का कोना कोना आप की ही दया से दमकता
न हो दर्शन आप के तो अव्य्वस्तिथ सा सारा घर लगता !

पुरानी अपनी चीजों से हम काम अपना ही चलाते है
की जब भी आपने कोई इच्छा, चीजें आपको नई ही हम लाते है !

कोई कष्ट न छुने तक पाये आप की कोमल-कंचन काया
यही सोच सब सुविधा को हमने आप तक पहुँचाया !

बच्चे हमारे अब आप के ही हाथों पाले जाते है
माँ-बाप तो बस सुबह- शाम एक झलक पाने आते है !

आप की आज्ञा जो किसी अज्ञानी ने मानी
समझिये समस्यायें बहुवचन में उसने घर आनी !

खुशियों तो बस उनके ही हिस्से में आई
परम वन्दनीय जिन्होंने मानी अपनी "बाई" !

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