Tuesday, November 13, 2007

मैं सोच में हूँ ...

उसने जन्म दिया एक बच्ची कों
और छोड दिया रेल की पटरी पर मरने कों
लोगो ने कहा , नाजायज औलाद थी
औलाद भी नाजायज होती है , पता नही था
कुदरत ने करिश्मा किया
और बच्ची कों जीवन दान दिया
लोगो ने फिर कहा
"जाको राखे सैयाँ , मार सके न कोई "
किसी ने जा उसे अस्तपताल ने भर्ती किया
लोगो ने ख़ुशी मनाई और फिर किसी ने कहा
देखो , कितना नेक काम किया
अब इस कों अच्छा भविष्य मिलजायेगा
जाने क्यों , यह सुन मैं सोच मैं पड़ गया
माँ-बाप के होते बच्ची कहाँ सुरक्षित है
और कितना अच्छा भविष्य पाती है
ये तो अनाथ है , कितना आगे जायगे
कहीं ऐसा ना हो
किसी के हाथों बेच दी जाएगी ...
(कुछ दिन पहले एक ४ दिन की बच्ची रेल की पटरी पर मिली थी, उसकी खबर टीवी में सुन कर ये लिखा है होसकता है कुछ कों बुरा लगे , तो माफ़ी चाहूँगा)
--- अमित १३/११/०७

3 comments:

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

प्रिय अमित,

यदि मानव जीवन एक सीधी रेखा होती तो जीवन बहुत आसान होता. टेढी रेखा होती तो भी जैसे तैसे काम चला लेते. लेकिन वास्तविक जीवन शैतान की आंतों के समान उलझा हुआ है जहां यह पता नहीं चलता कि आदि कहां है, अंत कहां है, एवं कुल कितने 'धागे' हैं. इस कविता में एक धागे के एक हिस्से को पकडा गया है. वर्णन अच्छा है, लेकिन एक सटीक चरमोत्कर्ष होना जरूरी था -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
इस काम के लिये मेरा और आपका योगदान कितना है?

शब्द said...

amit
its nice that you have stated writng on socially relvent issues . change take time to come but if we can bring out such issues regularly then slowly people will not only start reading but start commenting also .
its important to write and write what we and see

Yatish Jain said...

वर्णन बहुत अच्छा है, पर शास्त्री जी ने सही कहा