Thursday, May 31, 2007

साझा मंज़िल ...



जाने क्यों करता हूँ
वो मैं,
जो पसन्द नही तुम्हे
ना जाने क्यों करती हो तुम
वो,
जो मुझे मंज़ूर नही
चाह एक है
मज़िल एक है हमारी
तो,
रास्ते जुदा क्यों,
क्यों टकरा जाती
एक दूजे से यों
इच्चाए हमारी,
क्यों नही होती
साझा
इच्चाए हमारी,
क्या नही हो सकता
एक ही रास्ता हमारा
जो जाता हो
साझा मंज़िल को हमारी

---- अमित ३१/०५/०५

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