Thursday, September 23, 2010
मैं खीचा चला जाऊँगा ...
Saturday, September 18, 2010
फिल्म बनायेंगे ...
Sunday, September 12, 2010
ईद मुबारक ...
Wednesday, September 8, 2010
फैसले...
आधुनिकता पड़ती हम पर भारी है ...
वाकया कभी कभी ऐसा घटता है
दिल दुखी हो, कुछ लिखने को करता है...
बाप ने औलाद से अपनी कुछ कहा
जबाब जो मिला, दिल टुकड़े उससे हुआ...
माँ-बाप ने आज़ादी दी, एक मुकाम दिया
आधुनिकता हमने ओढ़ी, और ढ़ाक सब दिया...
शर्म आँखों की जाने कहाँ गई
बे-शर्मी बन पर्दा, आँखों पे छा गई ...
आज आधुनिकता पड़ती हम पर भारी है
घर में "पड़ा" बुजुर्ग, मानो छूत की बीमारी है ...
यों तो रहते बस एक ही छत के नीचे
दरवाजा फिर भी तकती है आँखें
एक झकल को औलाद की , तरसती है आँखें ...
कान तो शयद अब पहचान न पायंगे
अदब भरे एक सलाम को, गर बच्चे करने आयेंगे...
जाने क्यों न हम समझ पाते है
जीवन तो बस एक पहिया है
चलते, बस चलते इसको जाना है
आज उनकी, तो कल अपनी बारी है
न जाने क्यों,
आधुनिकता पड़ती हम पर भारी है ...
(काफी परिवारों में बच्चो का माँ-बाप के प्रति रवैया देख कर )
--- अमित ०७/०९/२०१०
Tuesday, September 7, 2010
प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये ...
Thursday, August 19, 2010
बधाई गीत...
Sunday, August 15, 2010
आज़ादी का जश्न ...
Thursday, August 12, 2010
एक प्रयोग ...
अशोक चक्रधर जी की एक कविता हमने सुनी
कुछ ज्यादा ही प्रभावित, उससे हम हो गये ,
जुगाड़ लगा उनसे मिले,
समझा-बुझा, मन की बात बताने वाला यंत्र
उधार कुछ दिनों के लिए हम उनसे लिए.
सोचा चलो हम भी उस यंत्र को आजमाएंगे
क्या विचारे है हमारे बारे में, यह पता लगायेंगे
पहला शिकार श्री-मति जो को ही बनाया
सुनकर उनके विचार, सिर हमारा चकराया,
यंत्र के आवाज कुछ ऐसी आती थी
इंजिनियर जान कर इनसे ब्याही थी
यहाँ ये कवि, गले मेरे पड़ गया
कविताएं तो राम ही जाने कैसी करता है,
मगर कोई पूछे इनसे, कविताओं से क्या पेट भरता है?
पहले ही मोर्चे पर मुहं की हमने खाई थी
सहमे ज़रूर थे, पर हिम्मत न गवाई थी.
दूसरा शिकार हमारे बिहारी बाबू थे
अपनी कविताओं के दम पर, किये हम उनपर काबू थे
उम्मीद अबके पूरी थी, रिपोर्ट अच्छी ही आयेगी
सोच कर यही, ख़ुशी-ख़ुशी बटन यंत्र की दबाई
आवाज अपने कानो में फिर कुछ यूँ आई
आ गये है फिर, चार कविताये सुनायेंगे
तंग आ चुके है हम, ये ज़बरदस्ती वाह-वाह करवायेंगे.
लड़ाई पड़ रही अब भारी थी, दुसरे मोर्चे पर भी हार हमारी थी.
सोचा अबके , नये किसी मुर्गे को आजमाएंगे,
नया-नया मुल्ला है, अल्लाह ही अल्लाह पुकारेगा
सुन कर कुछ तारीफ़, खुश थोडा हम हो जायेंगे.
इसी उधेड़ बुन में, शर्मा जी का रुख हमने किया
जैसी उम्मीद थी, हाथों हाथ उन्होंने हमको लिया
लगता अभी सब कुछ अच्छा-अच्छा था,
जाने यंत्र के बटन पर ऊँगली कब अपनी दब गई,
दबी-दबी सी एक आवाज़ कानो में फिर आई
मरने की यहाँ फुर्सत नहीं, ये करते कविताई
वो भी करे तो ठीक है, करते बस हमारी खिचाई...
ख़ुशी यहाँ भी अपनी, गले हमे मिलने से रह गई
शक्ल अपनी घुटनों तक लटक अब थी
कोसा उस घडी को, जब इस प्रयोग की याद आई थी ...
(अपने जन्म दिन पर अपना ही शिकार किया ...अशोक चक्रधर जी की एक कविता से प्रभावित हैं )
--- अमित १२/०८/२०१०
Tuesday, August 10, 2010
फिर मार जाती है मुझे...

अदाये हुस्न की
आती है उसे...
इश्क हूँ मैं
अदाये हुस्न की
मार जाती है मुझे...
चाहता है वो
रहना, योंही बे-पर्दा
डर जमाने की
बद-निगाही का
फिर मार जाता है मुझे...
रहता है वो, बेख़ुद
ख़ुद ही का होश नहीं
यह बेख़ुदी उसकी
फिर मार जाती है मुझे...
रहता हैं वो तो
अपने मद में हरदम चूर,
बद-गुमानी यह उसकी
फिर मार जाती है मुझे...
यों तो भोला नहीं वो जरा
पर देखो कैसा अनजान बन रहा
अल्हड़पन यह उसका
फिर मार जाता है मुझे...
न-वाकिफ नहीं वो
हालत मेरी से
अदा हमको सताने की ये
फिर मार जाती है मुझे...
वो हुस्न है
अपनी अदाए भला कहाँ छोड़ेगा
और हम भी इश्क है
आशिकी कहाँ छोड़ी जाए हमसे ...
--- अमित (१०/०८/१० )
"माता" उधर ही आती है ...
पपीता कहूँ या फीता
सीता कहूँ या गीता
बसंती बोलूं या धन्नो
असल नाम तो राम है जानता
खैर नाम को तो छोडिये
नाम से हमे क्या काम
करते है चर्चा इसकी,
खाना सब लोगो का सर
यही है इनका, इकलौता काम...
अरे हाँ,
अदाकारी भी ज़बर इनको आती है
आप दे किरदार कोई, समा उसमें जाती है
काम यह पर अपने जोखिम पर कीजियेगा
न आये किरदार से बाहर, दोष हमे न दीजियेगा
हमने भी दो-तीन बार आजमाई है
और हमेशा ही मुहं की ही फिर खाई है
किरदार में यें कुछ ऐसी समाई
हफ़्तों फिर उससे बाहर न आईं
लाख समझाया हमने, लाख मनाया
दिए लालच और धमकी भी हमने
जुगत काम मगर एक न आई
लगता मानो, भैंस के आगे बीन बजाई
अपना दिल तो नाज़ुक है. तरस फिर भी खा गया
तरस मगर इनको किसी पर न आई
एक ही गलती, इन्होने बार-बार दोहराई
यह इनकी सजा है, जो कविता बनकर यहाँ आई ...
कविता हमने लिख तो दी, जी मगर घबराता है
दूर से कानो में कुछ आवाज सी आती है
"अमित जी" संभलिये "माता" उधर ही आती है ...
(लिटल इंडिया के एक सदस्य पर )
--- अमित १०/०८/१०
Friday, August 6, 2010
नाओ दिस इज टू मच बाबा...
Monday, August 2, 2010
कहानी एक फेन्सी ड्रेस शो की ...
सुझाव इस बार लिटिल इंडिया को अनोखा आया
क्यों न सुपर-स्टारों को घर जाए बुलाया
सबने हामी तुरंत भर दी और तयारी शुरू कर दी
पर समय की तंगी ने रंग में भंग कर दी
मगर कुछ शातिर दिमागों ने, महफ़िल फिर हरी कर दी
महफ़िल में लगा हर रंग का तड़का था
सितारों का जोश सबके अंग-अंग में फड़का था
कहीं शायरी के अपनी , तीर चलाते शायर भाई मिले
तो चीनी और लामा भी आ फिर गले मिले
जय-वीरू की दोस्ती देख, फिर हंसी आई
तो बक-बक ने बसंती की, सर सब की दुखाई
नन्ही परी का खून, जालिम एक चुड़ैल ने पिया
और पैसे का शो-ऑफ फिर किसी ने किया
गाँव से अपने, ओंकारा भी आये थे
पारो ने भी वहां, देवदास अपने मनाये थे
कुछ करतब जोकर ने भी अपने वहां दिखाए थे
एक माओवादी ने आ, फिर वहां आतंक मचाया
और आ सकते में, गजनी ने अपना होश गवाया
पुलिस ने भी फिर, हाथ गाने में आजमाया
और गावं की एक छोरी को, मिस-इण्डिया का ख्वाब आया
देख कर माहौल , बड़ा ही अजीब लगता था
चित्रण पागलखाने का, बड़ा सजीव लगता था
यहाँ कौन किस से कम रहने वाला है
सच ही है , लिटिल-इंडिया का अंदाज़ लिराला है ...
( सब दोस्तों से मिल कर एक फेन्सी ड्रेस शो किया , उसकी कहानी मेरी जुबानी )
---अमित ०२/०८/२०१०
Sunday, August 1, 2010
मेंटिनेंस प्रोजेक्ट की दास्ताँ ...
तुम मेंटिनेंस प्रोजेक्ट में आना
हमको तो कुछ अब होश नहीं
हो सके तो तुम ही बतलाना...
मेंटिनेंस प्रोजेक्ट अलोकेशन जब हो जाए
दिन-रात का अंतर तब खो जाए ,
जब आँखों में घुमे; दिन में तारे
तब समझो मेंटिनेंस प्रोजेक्ट अलोकेट हो गया प्यारे
रु रु रु ...रु रु रु ...रु रु रु ...
ये मेंटिनेंस प्रोजेक्ट हमे कहाँ ले आया
कमर सबकी करे "हाय",
बग रोज नये-नये आये
कोई ये बताये स्लूसन क्या होगा
वू वू वू ...वू वू वू ...वू वू वू ...
ये मेंटिनेंस प्रोजेक्ट हमे कहाँ ले आया...
अरे कोई हमारा कोड तो रीविऊ करा दो
अरे कोड रीविऊ से ही क्या हासिल होगा
अन्हान्स्मेंट की बाते क्या करते हो
पुराने बग न संभल अभी आते है
एस-एल-ए का जाने क्या होगा
रु रु रु ...रु रु रु ...रु रु रु ...
ये मेंटिनेंस प्रोजेक्ट हमे कहाँ ले आया...
जाने ऐसी भी क्या मज़बूरी
दे देते हर एस-एल-ए को मंजूरी
अरे दम हैं तो खुद कोड कर के दिखाओ
दिन में ऑफिस आओ , रातो को घर न जाओ
हम माने तुम को बड़ा, समय पर डिलीवरी कराओ
रु रु रु ...रु रु रु ...रु रु रु ...
ये मेंटिनेंस प्रोजेक्ट हमे कहाँ ले आया...
Friday, July 30, 2010
बाद जमानो के ...
बाद जमानो के
वो मिलने हम से आये
देख उनको तारे
ख़ुशी से और झिलमिलाये ...
चाँद तो,
उनसे जलता है ,
मिलना उनसे, हमारा
उसको बहुत खलता है ...
आते ही उनके
लाख चाले वो चलता है
हम भी,
हो चले अब श्याने है
जाएगा कहाँ वो
"पर" उसके.
हमने कुतर डालें है ...
--- अमित ३०/०७/२०१०
माइग्रेशन तेरे बाजार में ...
क्या से क्या हो गया
माइग्रेशन तेरे बाजार में
चाहा क्या , क्या मिला
माइग्रेशन तेरे बाजार में
चलो पी.ऍम का भरम तो टुटा
जाना के माइग्रेशन क्या है
कहती है जिसको
अंडर-एस्टिमेट ये दुनिया
माइग्रेशन चीज़ वो क्या है
हमने क्या के न सहा
माइग्रेशन तेरे बाजार में
चाहा क्या , क्या मिला ,
माइग्रेशन तेरे बाजार में ...
मौज-ओ-मस्ती के हमसे
जुदा-जुदा अब रास्ते है
यकीन अब ये होगा किसको
पांच बजे आफिस से
हम भी कभी घर को निकले है
खोना है जाने हमे क्या क्या
माइग्रेशन तेरे बाजार में
चाहा क्या , क्या मिला ,
माइग्रेशन तेरे बाजार में ...
(एक और पैरोडी ...)
--- अमित ३०/०७/२०१०
Wednesday, July 28, 2010
कहानी माइग्रेशन प्रोजेक्ट की ...
जाने क्यूँ लोग माइग्रेशन कराते है
जाने क्यूँ लोग कॉम्प्लीकेशन बढाते है
जाने क्यूँ , जाने क्यूँ ...
जाने क्यूँ , जाने क्यूँ ...
माइग्रेशन में देखिये तो बग ही बग है
माइग्रेशन हर दम डी-बग करना पड़ता है
माइग्रेशन में तो सर खपाना पड़ता है
कोड को हाथ लगाने से सब डरते है
टेंशन जाने क्यों जिन्दगी में भरते है
माइग्रेशन में जितने रिसोर्स हो , कम है
जाने क्यूँ लोग माइग्रेशन कराते है
जाने क्यूँ , जाने क्यूँ ...
जाने क्यूँ , जाने क्यूँ ...
माइग्रेशन में दिन डेस्क पर गुजर जाते है
माइग्रेशन में रात बीते घर जाते है
माइग्रेशन में हजार री-वर्क किये जाते है
माइग्रेशन में घंटों मीटिंग में बर्बाद जाते है
माइग्रेशन में हँसते चेहरे मुरझा जाते है
माइग्रेशन में तोंद बाहर निकल आते है
जाने क्यूँ लोग माइग्रेशन कराते है
जाने क्यूँ , जाने क्यूँ ...
जाने क्यूँ , जाने क्यूँ ...
माइग्रेशन में न कुछ लर्निंग है
माइग्रेशन तो खुद की बर्निंग है
माइग्रेशन से तो बेंच पे ही अच्छे है
माइग्रेशन की ओनसाईट से देश में अच्छे है
माइग्रेशन में न आगे से हम को जाना है
माइग्रेशन में जा मुफ्त में जान गवाना है
जाने क्यूँ लोग माइग्रेशन कराते है
जाने क्यूँ , जाने क्यूँ ...
जाने क्यूँ , जाने क्यूँ ...
( मेरी पहली पैरोडी ...)
Tuesday, July 27, 2010
मैं जो मुस्काता हूँ ...
मैं जो मुस्काता हूँ
लोग मुस्कान पर जाते
चंद पल का साथ है
राह फिर अपनी
निकल सब जाते है ...
लिए वो आते है
शिकन अपने माथे पे
और लिए मुस्कान जाते है ...
पीछे मुड़ कर
न कभी दिखा किसी ने,
ज़ख्म,
इस दिल में भी गहरे है
मेरी मुस्कान के पीछे
मेरी पलकों पर
मेरे आँशु ठहरे है ...
--- अमित २७/०७/२०१०
Tuesday, July 20, 2010
मैं और मेरी तन्हाई ...
Monday, July 19, 2010
नया धमाल ...
और सागर की गहराई
नाप हम चुके थे
"पर" राक्षसों की सेना के
खुल अब और चुके थे
करना है कोई बड़ा धमाल
मनसूबे नये बन चुके थे
घुट्टी अपने दिमागों की
फिर सबने मिलाई
जायंगे एक "रिसार्ट"
वोट सबकी यही आई थी
सेना फिर हुई तैयार
और हमला हुआ ज़ोरदार
सागर से लड़ने का
तजुर्बा अब सब को था
इस बार तो हशर
उसका बुरा ही होना था
सागर ने तो मान ली हार
स्विमिंग पूल के भी छक्के छूटे
योग-आसन के नियम
सारे फिर हमने तोड़े
और खज़ाने,
सारे गड़े, हमने उखाड़े
दिन ढले तो भूख सताई
जम कर खाई माल मलाई
ताकत और हौसला अभी बाकी था
तो छीनने अपनी हड्डी को
फिर कुत्तों ने की खूब लड़ाई
"लोटो" ने फिर लोग लूटे
आज, कल में बदल चुका था
शरीर अपना टूट चूका था
डेरो का अपने तब रुख किया
सूरज चढ़े पीछे फिर होश आई
खाने पर हुई फिर से चढ़ाई
डोल्फिन का शिकार
अपना अगला निशाना था
वापस आ फिर
स्विमिंग पूल, थकान मिटाना था
घड़ी अब कुछ इशारे कर रही थी
२४ घंटो की सुनहरी यादे लिए
सेना वापस कूच कर रही थी ...
( लिटल इंडिया के मोरिशस के एक रिसार्ट में आराम फरमाने के अंदाज़ पर...वहां जो खेल खेले उनका हिंदी रूपांतरण ... )
Friday, July 16, 2010
हमको प्यार नहीं आता ...
हमको प्यार नहीं आता
बने फिरते है शायर
इजहारे महोब्बत नहीं आता
जा कहीं, सीखे हम जरा
किसे कहते है प्यार
ताना अक्सर हमे दिया जाता
इन्ही नादानियों पे उनकी
हमको और प्यार आता
कैसे उन्हें कोई समझाए
अफ्सानाएं महोब्बत
लफ्जों से कम,
आँखों से बयां होता है
आँखों को पढ़ती है आँखें
और ज़ज्बात,
दिल समझ जाता है
ख़ामोशी की जो जुबाँ होती है
समझ उनको आती है
दिलो में जिनके
बस महोब्बत और महोब्बत होती है ...
Tuesday, July 13, 2010
बुराई और मैं ...
Saturday, July 10, 2010
मत लिखो तुम वीर रस...
रह जाएगा फिर यह
चंद किताबों में बंद
मत लिखो तुम वीर रस ,
ना आएगा उसमें उबाल अब
रगो में ना दौड़ता लहू अब
मत लिखो तुम वीर रस,
सजाने को ड्राइंग-रूम अपना
बिक गई अब इंसानियत
मत लिखो तुम वीर रस,
पृथ्वीराज नहीं पैदा अब होते
जयचंद काम ना कुछ आयगा
मत लिखो तुम वीर रस,
हो चुके नपुंसक सब अब
मानेगा ना कोई यह सब
मत लिखो तुम वीर रस,
गर दिल ना मने फिर भी
तो दिखाओ जमाने को वीर रस
बदल जायंगे दिन तब सबके
और फिर कोई "चंदबरदाई"
फिर लिखेगा अमर वीर रस ...
(पता नहीं क्यों लिखा हैं , बस दिल में आया )
--- अमित १०/०७/२०१०
