मगर महनेत रंग लाती है
Tuesday, July 29, 2008
संघर्ष...
मगर महनेत रंग लाती है
Saturday, July 12, 2008
इतने तुम याद आओगे
चाहे जहाँ चाहो
चले तुम जाओ
कौन परवाह करता है
क्या तुम्हे लगता है
बस तुम से ही हम है
न होगे तुम तो
कहीं न हम होंगे
तुम्हे क्या पता
बस, अपने दम से है हम
याद न एक दिन आयगी
मजे में बसर जिन्दगी हो जायेगी
क्यों ये विश्वास
आज हमे धोखा दिए जाता है
रह रह साथ गुजारा
हर पल याद आता है
की जो तुम से बे-रुखियाँ
जला उनसे आज मन जाता है
याद तुम न आओगे
ये महज एक धोखा था
न पाकर तुम्हे करीब
दिल अपना रोता है
ये न सोचता था कभी
इतने तुम याद आओगे ...
--- अमित १२/०७/०८
Friday, July 11, 2008
आज़ादी ...
शब्द सुनते ही,
जोश की लहर दौड़ जाती
जोश तो जोश है
समय, बे-समय आ जाती
Monday, June 30, 2008
हालात ...
कहते है वो ...
कहते है वो
हम से भी हो परदा
तो क्या हुआ
जो हम है एक - दूजे के
शर्म तो हमारा गहना है
आप कुछ कहे
हमें तो परदा-नशीं ही रहना है
ना रहे परदे में तो
हया से आँखे झुक जाती है
हाथों में लगी हिना की लाली
रुखसारों पे आ जाती है
सर्द सा जिस्म होने लगता है
जान सी जैसे, निकली जाती है
आप तो बडे बे-शर्म है
शर्म आप को कहाँ आती है
मिलती है आप से नज़रे
और जान हमारी जाती है
हलकी सी एक छुहन
सिरहन एक जिस्म में दौड़ जाती है
अभी रहो जरा दूर ही हम से
महोबत की ये खुमारी
हम से न सही जाती है ...
---अमित ३०/०६/०८
Wednesday, May 14, 2008
नारी कहे ...
नारी कहे
क्यों बनू मैं सीता
तुम राम बनो या न बनो
मैं अग्नि परीक्षा में झोकी जाऊँगी
तुम तो फ़िर रहोगे महलो में
और मैं वनवास को जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं द्रोपदी
तुम धर्म-राज बनो या न बनो
मैं तो जुए में फ़िर हार दी जाऊँगी
तुम करोगे महाभारत सत्ता को
इसकी दोषी मैं रख दी जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं तारा
तुम हरिश्चंद बनो या न बनो
मैं तो नीच कहलादी जाऊँगी
मेरे बच्चे को मारोगे तुम
उसे जीवित कराने को मैं बुलाई जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं मीरा
तुम कान्हा बनो या न बनो
मेरी भक्ति तो फ़िर लज्जित की जायेगी
तुम को तो कुछ न होगा
और मैं विषपान को विवश की जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं अहिल्या
मैं तो फ़िर किसी इन्द्र के द्वारा छली जाऊँगी
और जीवन पत्थर बन राम की प्रतिक्षा में बिताओंगी
नारी कहे , कोई बताय
क्यों बनू मैं आदर्श नारी
क्या कोई आदर्श पुरूष मैं पाऊँगी ...
--- अमित १४/०५/०८
आई-टी २०५० में ...
Saturday, April 26, 2008
भावनाए ...
Friday, April 25, 2008
सोच ...
Monday, April 7, 2008
काश करता कोई हमे भी प्यार...
Wednesday, April 2, 2008
अप्रैल फूल...
अप्रैल का महीना करीब आ रहा था
कैसे लोगो को बेवकूफ बनाये
यही ख्याल जहन मेबार-बार आ रहा था
रोज नई तरकीबे बन जाती थी
इस में ये कमी है , उसमे वो कमी हैं
ये सोच छोड़ दी जाती थी
एक नया विचार तव आया
ऑफिस वालो को अप्रैल फूल बनाने का
प्लान तव हमने बनाया
एक तारीख को ऑफिस जा हम ने
इस्तीफा अपना दे डाला
होंटों पर मुस्कान लिए
ऑफिस में हम घूमते जाते थे
मेनेजर साब का क्या ज़बाब आएगा
इस इंतज़ार में समय बिताते थे
थोडी देर में उनका कॉल आया
खुशी खुशी हमने भी फ़ोन उठाया
दहाड़ने की आवाज उधर से आती थी
साहब ने फरमाया ,
इस्तीफा हम मंजूर करते हैं
तुम हम से मिलने आओ
इसी बीच एकाउण्ट डिसेबल हम करते हैं
ये सुन हम सकते में आ गए
देख अपना एकाउण्ट डिसेबल और घबरा गए
मेनेजर साब के आगे " सॉरी सर "
यही दो शब्द जबान से बोले जाते थे
देख हमे परेशान हाल
मंद मंद वो मुस्काते थे
एक बार वो फ़िर से गरजे
क्या सोचते थे, अप्रैल फूल हमे बनाओगे
ये सब हथकंडे हमी पर अजमाओगे
मेनेजर हम यों ही नही हैं, सभी का ख्याल रखते हैं
"अप्रैल फूल" अब तुमबन चुके
और मजाक भी बहुत कर चुके
जाओ जा कर काम करो
एकाउण्ट तुम्हारा अनेबल हम कर चुके
जान मे तव जान हमारी आई
सोचा न था व्यस्त मेनेजर ध्यान इतना दे पायेंगे
"अप्रैल फूल" का मजाक यो पकड़ पायेगे
कान हम अब पकड़ते हैं ,
ऐसा "अप्रैल फूल" न अब किसी को बनाएगे
सीमाये अपने अब न भुलायेगे ,
मजाक हैं , मजाक तक हैं इस्तमाल में लायेंगे ...
--- अमित ०२/०४/०८
Monday, March 24, 2008
बडा शिकार ...
Tuesday, March 11, 2008
आई एक मेल ...
Friday, March 7, 2008
इन से भी मिलते है ...
चलते-चलते आप से भी मिलते है
बाकी सब की तरह
आप की भी अपनी ढपली अपना राग है
मगर, आप का रिकार्ड जरा ख़राब है
बजता हमेशा बस एक ही राग है
यों तो शान्ति है इनको प्यारी
मगर तुनक मिजाजी ने की गड़बड़ सारी
बात जरा सी भी नाक पर आ जाती
और बेचारी नाक हर जगह अड़ जाती
नाक तो फिर नाक है
सारी दुनिया इसके आगे हारी है
Tuesday, March 4, 2008
ऐसे ही है ये ...
Sunday, March 2, 2008
नबाबी ठाठ...
ठाठो में है लाखो ठाठ
शौको में है लाखो शौक
अदाओं में है लाखों अदा
देर से आने की अदा
सबसे जुदा है ये अदा
और हो भी क्यों न
नबाबी है इसका अंदाज़
और लगता जैसे
बढ़ गया अपना रुबाब
बोला दोस्तों को साथ चलेंगे
पहुंचे जब सब
देखा नवाब सोये पडे है
किया वादा की नाश्ता साथ करेंगे
और दिखाई रात को दिए
जब उन्होंने हमे कहा
बस १० मिनट रुको
हम रुके तो ज़रूर
और घड़ी के घूमते काटे गिने
करते कोशिश है बहुत
करे खिचाई औरो को
और हमेशा ही उलटी पड़ी
देख उनकी झेप
चढती सबको मस्ती बडी
प्यारे ये हम सभी के है
आदत से मगर सब घबराते है
चाहे सब करे कितनी भी मिन्नत
"नबाब साब" अपने समय से ही आते है ...
--- अमित २/०३/०८
Friday, February 29, 2008
मित्र हमारे ...
घड़ी घड़ी अपनी जुल्फों को बनाते है
आप बस फोटो का नाम ले
अनायस हाथ जुल्फों में उलझ जाते है
Friday, February 22, 2008
किसे पता ???
Tuesday, February 19, 2008
जो है अधिकार मेरा !
भीख सा
जो है अधिकार मेरा !
क्यों स्विकारू मैं
दया सा
आत्म सम्मान है मेरा !
क्यों समझते हो
स्वं को
सबका सर्वेसर्वा !
मैं जन्मा नही
जन्मी हूँ मैं
तो कोई
अपराध नही है
एक मानव हूँ मैं
और अधिकार है मेरा
पाना एक मानव का सम्मान !
Thursday, February 14, 2008
पहला वैलेंटाइन डे ...
Friday, January 18, 2008
चलो आज थोडा सा रोमानी हो जाएँ ...
जीना हमे अभी बहुत है
Thursday, January 3, 2008
यों मना नया साल ...
खाने का क्या है, रोज ही तो खाते है
पलक झपकते ही ३१ दिसम्बर की शाम आई
Monday, December 24, 2007
बचपन ...
अलसाई आंखों से जो देखा
ओस सा ताज़ा और पाक़
ऐसा ही होता है बचपन
मुझे, बुलाता बचपन
पीछे मुड जब देखा, तो याद आया
Wednesday, December 19, 2007
रिश्ता ...
कुछ है जो
मैंने कुछ गलत किया
Thursday, November 15, 2007
कुछ ऐसा भी हो सकता है ...
और छोड दिया रेल की पटरी पर मरने कों
तो कुछ ने कहा , नाजायज औलाद थी
औलाद भी नाजायज होती है , पता नही था
खुशियाँ मनाई गई , इश्वेर को धन्यवाद दिया
ये तो जंगल की आग सी फ़ैल जाती है
औलाद के बिना जिन्दगी कैसी हो जाती है
Tuesday, November 13, 2007
मैं सोच में हूँ ...
जाने क्यों , यह सुन मैं सोच मैं पड़ गया
Wednesday, October 31, 2007
SPICE-07
Friday, October 26, 2007
अधिकार और समर्पण ...
"कहने " में अधिकार है
Tuesday, October 23, 2007
जाने क्या सोच कर...
फिर वही जिद्दोज़हद , वही परेशानी
जो उसके चेहरे से मालुम होती थी
Monday, October 22, 2007
भगवान् का फोन कॉल ...
"कैसे हो" यह बोला
भगवान् क्या फुरसत में है
पंडित जी ने कब उनको छोड़ दिया
दूसरी तरफ से हंसी की आवाज आई
दुनिया में शांति हो ,
जिन को सुन फ़ोन काट भगवान् भागे
माँ की आवाज कानो गूँज रही थी
होठो पे मुस्कान तैर रही थी
अपने लिए कुछ करने की नयी राह दीख रही थी ...
Wednesday, October 17, 2007
सिफर ...
हर मुकाम, हर मंज़िल
सिफर तो कहा तुमने
Tuesday, October 16, 2007
दर्द ...
दर्द से जो निकलते है
सबसे मीठे होते हैं
देखो तो ,
रह रह कर जो ,
Thursday, October 11, 2007
व्यस्त दिन ...
अभी पहुँचा तो बस सुना
दीवार टगी घड़ी से बजा
आख़िर पेट के लिए तो लडाई लड़ी है
काम बहुत होता है
Wednesday, October 10, 2007
सम्मान ...
Monday, October 1, 2007
ज़माना साथ आ गया...
और मिनट, घंटो में बदलते गये
दिन ना जाने कब शुरू हुआ
और कब रात ख़त्म हुई
नही कैसे हुआ था सफ़र एक
इक हल्का सा धुंधलका; बस बाक़ी है
कब जुबां खामोश होती चली गई
और कब दिल बोलने लगा
महफ़िलें , तनहाइयों में तब्दील हो गयीं
अकेलापन, तो खुद से घबरा गया
Sunday, September 23, 2007
ऐसे क्यों है हम ...
Thursday, September 20, 2007
बे-व्फाई
की थी मैंने भी वफा
जो मैं दिखा ना सका
दीवाना मुझे करार किया था
थीं मेरी कुछ मजबुरिया
हर कदम पर जिसने
लाचार मुझे किया था
तुम तो थी
जिसे हम पर पूरा यकीन था
फिर क्यों किया ऐसा
तुमने किया मुझे क्यों रुसवा
क्यों तुम ने वो सब सच माना
जो कभी हुआ न था
ऐसा क्या था दुनिया की बातों में
जो पल सारा विश्वास डोल गया
तुम तो करती इंतज़ार
तुम तो रखती हम पर एतबार
दुनिया का किसे डर था
किसे थी परवाह दुनिया की
मजबुरिया कब तक रास्ता रोकती
दुनिया कब तब आड़े आती
तुम साथ जो हमारा देती
कुछ भी जहाँ में होता
आख़िर जीत हमारी होती ...
--- अमित २२/०९/०७
Wednesday, September 19, 2007
ए वक़्त ...
Tuesday, September 18, 2007
सोचते है ...
कयामत की नज़र रखते है
बीता समय याद आता है
अपने दोस्तो का
उनकी हालत पर तरस आता है
Monday, September 17, 2007
तेरे दामन मे ...
छिपे बैठे थे
ए जिन्दगी
हमे बहुत मिलेगा
