Thursday, July 12, 2007

चले आओ यारो ...


आओ कभी ऐसे भी
बैठे हम साथ
नीचे ज़मीन
ऊपर हो खुला आकाश
खुशियों के दौर
और मस्त समां होगा
कुछ तुम अपनी सुनाओ
कुछ हम अपनी कहते हों
चलेगा जब दौर
बीती बातों का
ताजा हुआ
गुज़रे जमाने का एहसास होगा
चले आओ किसी शाम तो यारो
मुद्दत हुई है
जब गुजरा करती थी यारों के साथ अपनी शाम ...
--- अमित ०६/०७/ ०७

2 comments:

Anonymous said...

This is the message for MR Amit Sharma just to paricaite that what he is wrinting its not poet but he is not a bad writer dont you think my friends as i cant says that can i just post some more comment to apreciate him to write some more bad stuffs

दुर्गा said...

bahut khoob!

:-)