Monday, August 8, 2011

लंच टाइम ...


फिर दोपहर हुई, पेट से कुछ शोर आया
निगाह घडी पर डाली, लंच का ख्या आया...
ख्याल अच्छा था, फिर भी दिल जरा घबराया
जाया कहाँ आज जाए, दिमाग सब में लड़ाया...
यों तो खाना खाना रोज़ का ज़रूरी काम है
फूड़ कोर्ट में खाना; खाना मुश्किल जरा यह काम है...
फूड़ कोर्ट जा, मेन्यु पर निगाह दौड़ाई
बहुत थी चीज़े, क्या खाए यह बात समझ न आई...
अपने अपने स्वाद सबने आजमाए
खाने के लिए अलग-अलग पकवान सब ले आये...
अपनी थाली में कुछ पीले रंग का पानी आया था
कुछ कोशिश कर एक दो दाने दाल उसमें पाया था...
फूल सी नाज़ुक उसमें कुछ चपातियाँ आई थी
कच्ची उम्र में ही चूल्हे से प्लेट में हमारी वो आई थी...
आलू संग कुछ गाजर-गोभी भी एक प्लेट में नज़र आते थे
चबाने में उनको, दांत हमारे जरा दर्द सा कर जाते थे...
राजमा और छोले साब भी प्लेट की शोभा बढ़ते थे
देख तेल की मात्रा, दिल बाबू जरा घबराते थे ...
मसालों थे कि आपस में भाईचारा निभाते थे
धनिये कि जगह अक्सर गरम-मसाले जी सब्जी में डल जाते थे ...
चावल चचा का कर विश्वास, खाना हम खाने जाते थे
और बासमती के नाम पर, जाने क्या-क्या खा जाते थे...
अरे हाँ, फील गुड को थोडा मीठा भी दिया था,
एक बस यही था, काम जिसने अपना पूरा किया था...
हमारी ये सब बाते, आप बस हंसी में लिए जाते है
आप क्या जाने, कैसे इस जंग को लड़ने हम रोज़ जाते है...
(हमारे फ़ूड कोर्ट की हालत पर)

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