Monday, June 27, 2011

बदलती सोच ...

परिवर्तन प्रकर्ति का नियम

और बदलना मानव धर्म ...

होता जब कोई परिवर्तन

मानव करता नया सर्जन...

देख बदलती परिस्थियाँ

गिरगिट सा मानव, बदलता रंग...

और कहें जब नारी कि हो परिवर्तन

देखें फिर बदलता पल पल दृष्टिकोण...

बात यह जब करती कोई किशोरी

कहते सब, हाथों से निकलती है यह छोरी...

पढ़ी लिखी, थोडा और हुई वो सयानी

कहते सब, यथार्थ में आओ, जीवन नहीं परियों कि कहानी...

देखती वो घर और कामकाज भी है

उठता मगर बबाल उसकी स्वतंत्र सोच पर आज भी है...

ढल अब थोडा उसकी उम्र चली है

बुजुर्ग है, थोडा तो मान दो, प्रथा यह चल पड़ी है ...

जीवन काल जाने कितने बीत चुके

हम है मगर अभी वहीँ रुके हुए ...

लिंग देख प्रकर्ति कोई परिवर्तन नहीं लाती

साधारण सी ये बात, क्यों सभ्य समाज को समझ नहीं आती...

नारी भी है राष्ट्र की पूंजी,

और स्वागत करना परिवर्तन का है, सफलता की कुंजी ...

7 comments:

आशा said...

नारी पर अच्छा सोच |
बधाई
आशा

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति ... मानसिक बदलाव होना ज़रूरी है

prerna argal said...
This comment has been removed by the author.
anuradha srivastav said...

अच्छी अभिव्यक्ति.......... कम से कम नारी की स्थिति के बारे में किसी ने तो सोचा ।

वन्दना said...

वाह ………बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

nishusharma said...

Badlaw JIndagi jine ki kla hai jise apne bhut saral shabdo me sahej diya sikhne walo k liye... keep it up.

prerna argal said...

bahuat badiyaa abhbyakti.soch badalane ki jarurat hai,
happy friendship day.

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