Saturday, March 5, 2011

जाने कौन समझ जाय ...

जिस का काम उसी को सजता है
करे और कोई तो डंका बजता है...
शिक्षक हुआ करते थे कभी
आज साहूकार विद्यालय जाता है
बिगड़ रही है नई पीढ़ी,
यह दोष फिर युवाओं को दिया जाता है...
जनसेवक शासन करते थे कभी
उठाईगिरो से देश आज लुटा जाता है
दोष देते है संसद वालो को सब
गरेबाँ में अपने झाँका किसी से न जाता है ...
कुछ सिरफिरे हुआ करते थे
कुछ सिरफिरे हुआ करते हैं,
सरहद की रखवाली करते है
जाने क्यों खून अपना बहाते है,
दो दिन हम याद उनको करते है
तीन सों तरेसठ दिन भूल जाते है ...
गैरतमंद हुआ करते थे गये जमानो में
दफना दी गई गैरत आज कब्रिस्तानो में
करे जो कोई जतन कुछ जगाने का, तो जबाब आता है
अकेला चना कहाँ भाड़ फोड़ता पाता है...
मैं तो छोटा सा कवि हूँ
चंद शब्दों में अपनी बात कह जाऊँगा,
चंद होंगे जो सुनकर जाग जायेंगे
बहुत होंगे जो "ताली" बजा कर चले जायेंगे ...
समझ सको हो समझ जाओ
ताली बजाने से काम न चल पायेगा
पहले सफाई अपनी ज़रूरी है
बाकी खुद-ब-खुद साफ़ हो जाएगा ...
---अमित (०५/०३/२०११)

4 comments:

परमजीत सिँह बाली said...

बढिया अचना है।बधाई!

nishusharma said...

Very good...

रचना said...

good one

robin said...

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