Monday, September 27, 2010

मेरी आवारगी...

कई बरस हो चले, मेरी आवारगी को

हुई कैसे शुरुआत, याद कुछ अब नहीं

देखता हूँ पीछे मुड़कर मैं

धुंधला धुंधला सा नज़र सब आता है

भूली बिसरी कुछ यादों का

जुड़ा सा एक मेला, नज़र आता है

हाथों से छुटते कुछ हाथ नज़र आते है

थामता फिर कोई, दमन नज़र आता है

अधूरे कुछ वादे नज़र आते है

करना कुछ का पूरा, याद आता है

कुछ अद्ध जगी, राते नज़र आती है

कुछ उदास-उदास सवेरे नज़र आते है

की थी जो मस्तियाँ यारो के साथ

वो अभी भी गुद गुदाती है

चले जाना छोड़ कर, कुछ का राह में

नमी आखों में आज भी ले आता है

गुजरे ज़माने पर पड़ी है वक़्त की धुल

हाथ होता है जितना मैला,साफ़ उतना नज़र आता है

जाने आवारगी में कहाँ तक और चलते जाना है

सफ़र लगता मुझको यह बड़ा अनजाना है

हर कदम पर मुझको मंजिल मिलती है

और हर मंजिल पर, नई मंजिल का पता मिलता है ...

(मेरे इस पागलपन को छ: बरस होने वाले है, बस उसकी याद में ...)

--- अमित २७/०९/२०१०

Thursday, September 23, 2010

मैं खीचा चला जाऊँगा ...

अनायास ही, उसकी और खीचा चला जाता हूँ मैं
खूबसूरत नहीं है वो, जानता हूँ मैं,
फिर भी कुछ तो है ऐसा, रोक खुद को नहीं पाता हूँ मैं
रुखसारो पर उसकी जुल्फों, कभी लहराते नहीं देखा
खुल कर अगर वो हवा में बिखर जाती,
यक़ीनन, फिज़ा में ख़ुशबू और महक जाती...
झांकती चश्मे के पीछे से वो दो आँखे
अक्सर खामोश ही रहती है,
जाने मुझे क्यों लगता, ये ख़ामोशी कुछ कहती है
काश मैं ख़ामोशी की जुबा पढ़ पाता
छुपे राज उनके कुछ, शायद मैं जान पाता
मुमकिन है, तस्वीर तब कुछ और होती
बे-चैनी को मेरी, कुछ रहत तो होती ...
और कुछ ख़ास नहीं उसमें, जो मैं बताऊंगा
यों तो यह भी कुछ ख़ास नही,
मगर होता यह जिस अदा से, वो लफ्जों में कहाँ लाऊँगा ...
कल फिर सामना मेरा उससे होगा,
कल फिर मैं खीचा चला जाऊँगा ...
--- अमित २२/०९/२०१०

Saturday, September 18, 2010

फिल्म बनायेंगे ...

ख़ुराफात आज हम को नई सूझी
हालत पर अपनी. फिल्म बनायेंगे
चेतन्या तो होगा डायरेक्टर
केमरा, आशीष को थमाएंगे
स्क्रिप्ट का काम जे.पी को दिया जायेगा
डायलोग सबके और कौन लिख पायेगा
मीता और रितिका, तो पहले से ही हीरोईने है
प्रफोर्मांस एक रुचिका से आएगी
और सीरियस रोल यजु को दिया जायेगा
बाबा और जैन तो चेम्पियन है ही
हर जगह नज़र आयेंगे
और कॉमर्शियल ऐड की तरह
फ्रीकुअंट ट्रेवलर से महेश पुले नज़र आयेंगे
साइखोम मजबूत लड़का है
स्पोर्ट बखूबी निभायेगा
और जब होगा महूर्त
टोटका-टोना अशोक से कराया जायेगा
आप सोच रहे होंगे, हम कहाँ आयंगे
भाई, ख्याल तो ये अपना ही है
कहीं न कहीं फिट हो ही जायंगे.
अब बचा फाइनांस, वो कहाँ से लायेंगे
यह होम प्रोडक्शन की फिल्म है
सभी प्रोडयूसर बन जायेंगे
और लो बजट में
सुपर हिट फिल्म बनायेंगे ....

(लिटिल इण्डिया का विचार एक फिल्म बनाने का है , सो कौन क्या करेगा !!!)

---अमित १५ /०९ /२०१०

Sunday, September 12, 2010

ईद मुबारक ...

रोज़े खत्म हुए, ईद का चाँद निकला है
हूर के रुख पर तिल सा, तारा भी साथ निकल है ...
कल ईद की नमाज़ अदा की जायगी
गले मिलंगे सब, खुशिया मनाई जायेंगी ...
हम भी मुबारक बाद देने जाएँगे
खूब सेवैया खायंगे !!!

(ईद के एक दिन बाद चाँद से सट कर एक तारा निकला था ... वो फोटो मैं नहीं ले पाया , उसका खेद है ... ऐसा मैंने जिन्दगी में पहली बार देखा था ... तारा ऐसा था जैसे किसी मुस्कुराते होटों के नीचे इक छोटा सा तिल.)
---अमित १०/०९/२०१०

Wednesday, September 8, 2010

फैसले...

गाँव की चौपाल में,
कडवे उस नीम के तले
पंचायत करती थी
मीठे फैसले ...
समय बदला,
नीम कड़वा ही रहा
पंचायत अब भी होती है
और फैसले कडवे...
(बस कुछ ऐसे ही )
--- अमित ०८/०९/२०१०

आधुनिकता पड़ती हम पर भारी है ...

वाकया कभी कभी ऐसा घटता है
दिल दुखी हो, कुछ लिखने को करता है...
बाप ने औलाद से अपनी कुछ कहा
जबाब जो मिला, दिल टुकड़े उससे हुआ...
माँ-बाप ने आज़ादी दी, एक मुकाम दिया
आधुनिकता हमने ओढ़ी, और ढ़ाक सब दिया...
शर्म आँखों की जाने कहाँ गई
बे-शर्मी बन पर्दा, आँखों पे छा गई ...
आज आधुनिकता पड़ती हम पर भारी है
घर में "पड़ा" बुजुर्ग, मानो छूत की बीमारी है ...
यों तो रहते बस एक ही छत के नीचे
दरवाजा फिर भी तकती है आँखें
एक झकल को औलाद की , तरसती है आँखें ...
कान तो शयद अब पहचान न पायंगे
अदब भरे एक सलाम को, गर बच्चे करने आयेंगे...
जाने क्यों न हम समझ पाते है
जीवन तो बस एक पहिया है
चलते, बस चलते इसको जाना है
आज उनकी, तो कल अपनी बारी है
न जाने क्यों,
आधुनिकता पड़ती हम पर भारी है ...

(काफी परिवारों में बच्चो का माँ-बाप के प्रति रवैया देख कर )

--- अमित ०७/०९/२०१०

Tuesday, September 7, 2010

प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये ...

देखो मिग्रेशन करने वालो
प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये
रोहित न ये बोले, प्रफुल न चिल्लाये थी
जब डेड-लाइन टाईट, तुम काम न आये...
चेतन्या को देखो
अविदंत भुला , नीतू भी भूली
न अगर कुछ भुला डिलीवरी की डेट न भूली ...
देखो मिग्रेशन करने वालो ... प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये >>>>
दर्द से जब रुचिका चीखी
यजु तब उस से बोली
खाले तू भी पेन-किलर की गोली
स्टोन का क्या है , कल निकल जाएगा
दाग प्रोफेशन पर लगा, तो मिट न पायेगा ...
देखो मिग्रेशन करने वालो ... प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये >>>>
पवन को देखो , अशोक से सीखो
जाने कब सुबह उठे, जाने किस सुबह नहाए
जब भी दी गई आवाज,
क्यूबिकल में अपने नज़र आये...
देखो मिग्रेशन करने वालो ... प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये >>>>
आशीष की कुर्बानी न भूलो,
बनाये थे जो उसने कभी "डोले"
मसल्स आज ढीली हुई,
पेट भी आगे को डोले
देखो मिग्रेशन करने वालो ... प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये >>>>
रितिका की हालत न पूछो
कोड के भुत का उस पर साया है
लाइट न थी घर में और
लेपटाप अपना चलता पाया है ...
देखो मिग्रेशन करने वालो ... प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये >>>>
जे.पी. और महेश दुःख किसे सुनाये
न फंसता कोई रिप्लेसमेंट
घर को वापस वो कैसे जाए ...
देखो मिग्रेशन करने वालो ... प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये >>>>
हालत अपनी भी कुछ ख़ास नहीं
बे-शक हम हँसते नज़र आते है
कभी रेम का , तो कभी लिंक का
एस्क्लेशन रोज रोज नये आते है ...
देखो मिग्रेशन करने वालो ... प्रोफेशन पर यह इलज़ाम न आये >>>>
--- अमित ०७/०९/२०१०
(अपने दोस्तों कि हालत पर )