Saturday, January 23, 2010

जज्बातों का सैलाब सा आता...

कभी - कभी मेरी दिल में
जज्बातों का सैलाब सा आता,
ले सहारा कलम का,
बन शब्द, किसी कागज़ पर बह जाता,
कभी कभी मेरी दिल में
जज्बातों का सैलाब सा आता,
बैचैनी किसी से कैसे कहे
कहकहों कि भीड़ में, बस तन्हा सा रह जाता
कभी कभी मेरी दिल में
जज्बातों का सैलाब सा आता,
जम जाती जो यादों पर समय की धुल
तन्हाई में बन , अश्क की बुँदे
संग उसे येँ बहाले जाता
कभी कभी मेरी दिल में
जज्बातों का सैलाब सा आता,
--- अमित

Thursday, January 14, 2010

अँधेरा ...

सही ही कहा हैं कहने वाले ने
कंही नही मिलता हैं जब सहारा
कागज़ और कलम ही होते हैं
डूबते इन्सान का सहारा
लगता हैं मुझे, में हु अधुरा
मंजिल पर आकर ढूंड रहा किनारा
करता में ज्यों ज्यों कोशिश
बढ़ता ही जाता येँ अँधेरा
समय के साथ सोच संभलती हैं
बदला हैं अपने आपको भी
बदली अपनी राहें और, थामा हाथ तुम्हारा
लगता था ...
बन जायेंगे एक दूजे का सहारा
समय के साथ सोच बदलती हैं
तुम भी कहा बच सकते थे
लड़खड़ाने फिर हम लगे
चाह था खुशहालियां होंगी
पर रंग अपना समय ने फिर दिखलाया
बढ़ता जा रहा अँधेरा
ज्यों ज्यों हाथ मेने बढ़ाया
......
अमित १३/०१/२०१०

Wednesday, January 13, 2010

दोस्तों कि शिकायत (^_^)...

कहते हैं यार हमारे
सो गया हैं कवी अन्दर का हमारे
हुआ अब अरसा
निकली न कोई कविता
कलम से हमारे
केसे हम समझाएं
कवी कभी सोता नही
हो अगर बंद आंखे
ख्यालो में अपने होता
ध्यान उसका चारो और लगा होता
जेसे ही मिलता
कुछ अनोखा, दिल को जो छूता
दे उसको अपनी कलपना का रंग
कवी अपने शब्दों में पिरोता
देखो, दोस्तों कि शिकायत
दिल को अपने " भा " गयी
और ले कविता का रूप
सामने आपके आ गयी
धन्यवाद्

२०१२- नए युग...

नया युग आने को हैं,
चिन्ह देते हैं, आज दिखाई
आकर्टिक और हिमालय से पिघलती बर्फ,
देती हैं इसकी गवाही...
आने को हैं, नया
युग चिन्ह देते हैं आज दिखाई
धरती का सीना चीर,
जो कल भूकम्प आया था
संदेशा वह यही लेकर आया था
आने को हैं नया युग
चिन्ह देते हैं आज दिखाई
रेगिस्तान में आती ,
बाढ़ और पड़ती बर्फ पचास साल बाद
हमको अब चेताती हैं ...
संभल इन्सान
आने को हैं नया युग
चिन्ह देते हैं आज दिखाई,
ऊँची लहरे सुनामी कि
दिखाती अपना विकराल स्वरुप
देख के उसकी शक्ति अपार
बोना लगा आज इन्सान
इतनी गलतिया कर चूका इंसान
कि अब संभल पाना है कठिन ...
नए युग कि अब पूरी तैयारी है
देखना बस येँ है, कि...
किस कि बारी है
हम करेंगे इसका स्वागत
या पड़ना है येँ हमारे बच्चो पे भारी ...
--- अमित 0१/०१/२०१०