Sunday, March 27, 2011
और हम करते है नाज़ ...
Monday, March 14, 2011
जाने किस उम्मीद में ...
Tuesday, March 8, 2011
कविता वीर रस की ...
गये दिनों कुछ कवि सम्मलेन सुने
वीर रस से थे सभी कवि तने...
बाते सबकी सुनकर मजा खूब आ रहा था,
कुछ ज़हन में बार बार मगर आ रहा था...
चाहे आप छोटा मुहं और बड़ी बाते बोले
तर्क अपना मैं ज़रूर सुनाऊंगा ...
ऐसी घटना बस हमारे यहाँ ही होती है ,
साल में बस दो ही दिन, देश भक्ति जगी होती है...
भर जोश में हर कोई दहाड़ता है,
इतिहास का शिक्षक, भूगोल बदलने की बात करता है...
आतंकी कोई किसी को तब बताता है ,
तो वन्दे मातरम् कोई "पाक" से गवाता है ...
शक नहीं की "पाक" को वन्दे मातरम् गाना पड़ सकता है,
डर है यह की अपनों को वन्दे मातरम् सिखाना पड़ सकता है ...
अपने यहाँ वन्दे मातरम् अब कौन गाता है
शकीरा और मडोना का गीत यहाँ धूम मचाता है...
बच्चा-बच्चा वहां कलमा जानता है
गायत्री मन्त्र, हनुमान चालीसा, जन गन मन और वन्दे मातरम् यहाँ कितनो को आता है ...
राम और लक्ष्मण से चरित्र न अब यहाँ जन्म पाते है,
भगत सिंह और "आज़ाद" को अपने अब आतंकी बताते है...
क्या हम सिखाते है अपने बच्चो को,
क्या उनको को अब आता है?
एक बार आप यह गिनती करा कर देखिये,
झुकती है कैसे शर्म से गर्दन , जरा फिर देखिये...
बस गाने से शोर्य गीत, कहानी न बदल जाती है,
खोखली हो नीव अगर, इमारत एक दिन तो ढेह जाती है ...
Saturday, March 5, 2011
जाने कौन समझ जाय ...
Wednesday, February 23, 2011
किया क्या जाए ...
किया क्या जाए
जिन्दगी न जब जी जाए !!!
कर लें खुदकुशी या
किसी को मार दिया जाए !!!
किया क्या जाए
जिन्दगी न जब जी जाए !!!
कितने करे जतन
उल्टा जब हर जतन जाए,
बात करे हम जिसके भले की
वही आ हम से भिड जाए !!!
किया क्या जाए
जिन्दगी न जब जी जाए !!!
सड़ चुके है रिश्ते सारे
ढोए उनको या
दफना दिया अब जाए !!!
किया क्या जाए
जिन्दगी न जब जी जाए !!!
किये थे हमने चंद वादे
कहीं खो गये उनके मायने
निभाया उनको अब जाए
या आज़ाद उनसे हुआ जाए !!!
किया क्या जाए
जिन्दगी न जब जी जाए !!!
मैं तो अब भी हाथ बढाता हूँ
भूल बिता हुआ सब जाता हूँ
किया क्या तब जाए
हाथ कोई अपना खीच जाए !!!
किया क्या जाए
जिन्दगी न जब जी जाए !!!
--- अमित (२३/०२/२०११ )
Monday, February 14, 2011
वैलंटाइंस डे : 2011
Tuesday, December 21, 2010
शुरुआत ज़रूरी हैं...
Tuesday, December 14, 2010
कमियाबी की कीमत ...
Monday, December 13, 2010
भैय्या जी ...
Sunday, December 12, 2010
एक नारी यह भी है ...
दुनिया किस और जा रही है आप को बताता हूँ
आइये , एक नारी से आप को मिलाता हूँ ...
बस से मैं ऑफिस जा रहा था,
आज दिन में नहीं, दोपहर में जा रहा था...
बस आ एक स्टॉप पर रुकी,
एक बीस-बाईस साल की युवती उसमे चढ़ी...
बगल में सीट हमारी खाली थी
आ वो उस सीट पर धरी...
शरीर पर उसके कपडे का बस किया नाम था,
कपड़ो से बड़ा बैग, लिया उसने अपने हाथ था...
बैठते ही , बैग उनका खुला
और बड़े बैग में के छोटा बैग मिला...
छोटे बैग से सबसे पहले शीशे साहब बहार आये,
देख अपना चेहरा युवती के अजीब से भाव आये...
फिर शरमाती हुई लिपस्टिक जी बाहर आईं
सूखे होठों की लाली फिर उसने बढ़ाई...
फेस पावडर की अबके बारी थी,
चेहरे में जान डालने की उसकी जम्मेदारी थी ...
इस के बाद एक और चीज़ निकल कर आई,
क्या थी वो, मुझ मुर्ख को समझ न आई ...
अब सबसे ज़रूरी चीज़ बाहर आई,
इस बार वह युवती इत्र में नहाई ...
यह बहुत ज़रूरी था,
पानी से नहाना न इतना ज़रूरी था...
देख कर यह सब, थोडा हमको हंसी आई
मगर इस किर्याकलाप में उसके जरा झेप न आई...
सच में नारी सदा ही महान है, जो चाहे करती है
नई दुनिया का निर्माण वही करती है ...
(यह व्यंग सिर्फ उस युवती विशेष पर है, अन्यथा न लें ...)