Wednesday, December 1, 2010

मेरी लाचारी ...

अक्सर अब बंद ही रहता है, कमरा मेरा

अंधरों और ख़ामोशी से भरा रहता है, कमरा मेरा

उठती खांसी से कभी टूट जाती ख़ामोशी

लिख कर जलाई ग़ज़ल से, छटता कभी अँधेरा

सीलन की सी एक उसमें ब़ू रहती है

अक्सर आसुओं की नदी वहां बहती है

बे-जान हुआ फर्श, खो चुका चमक अपनी

मेरे टूटे अरमानों की, धुल पड़ी वहां रहती

किसी शोख़ के ग़म का मैं मारा नहीं

हालातों ने भी कुछ ऐसा था बिगाड़ा नहीं

बस, इस दुनिया के दस्तूर ही कुछ रास आये

यों तो थे यहाँ सब अपने, पर बरताव पराये

खून के रिश्तों को दौलत खा गई

आँखों की शर्म को, कबकी मौत गई

चंद सिक्को में जाने क्या-क्या बिक जाता है

और भूखे को यहाँ निवाला हाथ आता है

अपनी यहाँ ये लाचारी है

तोड़ दी गई छीन कर, कलम हमारी

कि जो कोशिश करे बुलंद आवाज

काट दी गई यहाँ, जुबान हमारी

घड़िया अब बस गिनते है

कौन जाने कब बारी हमारी है ...


--- अमित ( ०१/१२/२०१० )

अधूरी कवितायेँ ...

रह गई आज भी एक कविता अधूरी

बढ रही है संख्या कविताओं की, जो है अधूरी

यों तो खुद को शायर, कहलाते है हम

और ज़ज्बात भी ऊकेर पाते, कागज़ पे हम

मन की उथल पुथल आज फिर काम कर गई

एक और कविता, बनने से पहले ही दम तोड़ गई

जाने और कितने कत्ल लिखे मेरे नाम है

सिरहाने पड़ी मेरे वो लाशें तमाम

काश में उनमें फिर से जान फूंक पता

जो है अधूरी, पूरी उन्हें कर पता

शायर कहलाने का न कोई गुरुर होता

किया ज़ज्बातों को सही से ब्यान

बस इस बात का सुकून दिल को होता ...


--- अमित ( ०१/१२/२०१० )

Monday, November 1, 2010

गुणगान !!!

बुजुर्गों का कहा बहुत असर रखता है,

आज भी देखो अगर सब खरा उतरता है !

अपने बीच ऐसे प्राणी है, देख जिन्हें

"नंग बड़ा परमेश्वर से" कहना सही लगता !

शांत लोगो को, कहाँ ये बक्शते है

उनकी हरकत का बखान, हम यहाँ करते है !

पहली कुछ मुलाकातों में सोम्य उसका रूप था,

वो और कुछ नहीं "भेड़ की खाल में भेड़िया" का रूप था !

बाते यह धीरे धीरे जब खुल कर आई,

"मुंह में राम, बगल में छुरी" अदा जब उन्होंने दिखाई!

शुरू में सोचा कुछ ने, उनको जाए समझाया,

जो लगा मानो "भैंस के आगे बीन बजाया" !

यह उन में से है " जो अकाल के पीछे लठ रखते है"

"बिच्छु का मन्त्र जानते नहीं, और खिलवाड़ साँप से करते है" !

भगवान ही शायद जाने, किस बात का है इनको गुमान,

असल में यह है " ऊँची दुकान और फीके पकवान" !

सोचते यह है ऊँची आवाज से सब दब जायेंगे,

समझदार है लोग" कीचड़ में पत्थर" क्यों मारने जायेंगे!

और कितनी पहचाने इनकी बतायेंगे,

"समझदार को इशारा काफी" आखिरी कहावत बस यही सुनायेंगे !


--- अमित १/११/२०१०

Sunday, October 31, 2010

शीर्षक अभी समझ नहीं आया !!! सुझावों का स्वागत है !!!

आज शाम मैं उदास था ,
करने को कुछ न मेरे पास था !
पूरे दिन तोडा था बिस्तर मैंने ,
एक पल को बिस्तर, न छोड़ा था मैं !
पड़े-पड़े दुख रहा था अंग-अंग मेरा ,
करने निकले सैर, कम्बखत पैर न उठा मेरा !
पास के एक बाग़ की फिर राह ली ,
पेड़ के नीचे पड़ी बैंच हमने थाम ली !
वहां देख बच्चों की उछल कूद ,
खलबली मेरी उदासी में मची !
करते देख कसरत बुजुर्गो को ,
शरम कुछ अपने हाल पर आई !
ठंडी हवा पेड़ों से छन-छन कर आ रही थी.,
मन से उदासी भी , अब दूर जा रही थी !
आलस अपनी भी, पतली गली निकल लिया,
फिर लिखने को कुछ, अपना भी मन किया !
खुश होते मन ने, भावनाए शब्दों में पिरो दी,
और छोड़ आलस हमे, पंक्तिया आपस में जोड़ दी !
दिन अपना इतना भी व्यर्थ न गया,
जाते जाते यह सिखला कर गया !
चलती दुनिया हर दिल हो भाती है ,
और गर ठहर जाए तो बहुत खीज़ आती है !
(शाम को पार्क में उदास बैठा था, अचानक ये पंक्तिया दिमाग में आ गई ) ...
--- अमित ३१ /१०/२०१०

Thursday, October 7, 2010

एक सुन्दर कविता की दरकार है मुझको...

एक सुन्दर कविता की दरकार है मुझको
मैं ढून्ढ रहा हूँ, हर दम उसको
रूप की तुम्हारे की खूब तारीफ़ मैंने
आशिक के उस चोले से बहार आना है मुझको
एक सुन्दर कविता की दरकार है मुझको
चर्चे खूब किये हसिनाओ की बेवफाई के
शब्दों से अपने वफा अब करनी है मुझको
एक सुन्दर कविता की दरकार है मुझको
गुदगुदाया है बहुत यारो को अपने
होना संजीदा अब ज़रूरी है मुझको
एक सुन्दर कविता की दरकार है मुझको
लिखा जाने क्या क्या मैंने
सार्थक सा कुछ अब लिखना है मुझको
एक सुन्दर कविता की दरकार है मुझको
मैं ढून्ढ रहा हूँ, हर दम उसको
आज खाली गया तो क्या ,
कल न तो परसों, वो मिलेगी मुझको ...

--- अमित ०५/१०/२०१०