एक आइना मैंने
दिखा रहा था सच मेरा
करता मैं क्या
बर्दाशत ही नहीं होता
आईने में
अक्स मेरा !!!
सुना एक मुहावरा कई बार
खाली दिमाग शैतान का वास
जब भी सुनते बडे खुश होते
लगता हमको देख बना
यों तो सूरत सीरत भोली है अपनी
दिमाग मगर जरा गड़बड़ है अपना
बे-लगाम घोडे सा ये भागता
कहाँ कब कैसे , करे कोई खुराफात
ये तो बस ये ही जानता
गये दिन की ही बात है
हम यारो के अपने साथ थे
गौर करने की बात है
दिमाग से वो भी तंग हाथ थे
ये तो सोने पे सुहागे वाली बात थी
पूरी बारात शैतानो की साथ थी
बहुत हुआ सब पुराना
चलो आज करे नया कारनामा
ख्यालों के फ़िर सैलाब आने लगे
ये करे या वो करे , दिमाग सब लडाने लगे
शैतानो को ख्याल कब अच्छे आने थे
ज़ोर पर ज़ोर लगते गये और
सारे प्रस्ताव ओंधे गिरते गये
एक विचार तव अंधरे में जुगनू सा चमका
क्यों न सब ज्ञान और हुनर अपना मिलाये
और मंच ऐसा बनाये , जो सबके काम आए
कमर कस कर ली हमने तैयारी है
देखना दुनिया वालो , अब हमारी बारी है ...
--- अमित

दौर मंदी का अब गया
और बाज़ार गर्म हो गया
अब तक जो बंद थे 'पर'
खुलने अब वो लगे ,
छोड़ कर पुरानी शाखे
आशियाना 'पंछी' नया लगे बनाने !
देख देख ये सब ,
मालिक कमज़ोर शाखों के लगे घबराने
ना हो वीरान, अपना आशियाना
पैतरे इसलिए नये नये लगे लगाने !
कल तक जो लगते थे खुद पर बोझ
आँगन के फूल नज़र अब वो आने लगे !
प्रलोभन रोज अब नये दिए जाते है ,
राई के भी अब तो , पहाड़ बना दिए जाते है !
हर छोटी खबर भी, मसाला साथ लिए होती है
और गई हर शाम 'पत्री' एक नई मिली होती है !
लाभ आज से आप को ये दिया जाता है,
वेतन में इजाफा किया इतना जाता है ,
आश्वासन लोगो को ये दिए अब जाते है !
देख देख इनकी ये सब चाल
'पंछी' भी अब हो गये श्याने है
उड़ना तो एक दिन फुर्र ही है
बस भागते इस 'भूत' के
लंगोट और हथियाने है ...
(आर्थिक मंदी का दौर ख़तम होने पर कंपनी और कर्मचारी के बीच की खीचा तानी पर )
--- अमित (२०/०४/२०१०)
बात हैं गये रविवार की
शाम ढले बैठे थे बाग़ में
किनारे की दूकान पर
आकर गाड़ी एक बड़ी रुकी
आदमी उससे उतरे दो
निकाल एक सीढ़ी
झट छत पर जा पहुंचे वो
हरकते कुछ संदिघ न थी
कौतुहल वश निगाह उन पर टिकी
सामने था उनके एक "इश्तिहार बोर्ड"
संभाला उन्होंने तब अपना समान
यकीन जानिये
पांच ही मिन्टो में ख़तम किया अपना काम
सामने था अब हमारे, ६*१० का नया इश्तिहार
दो दिन गये फिर निगाह फिर उस पर गई
देखा, जो था दाढ़ी बनाता आदमी
शरबत पी इठलाती लड़की बनी
दिखा उसे जब आज सुबह , चौक कर आँखें खुली
पाया आज फिर एक नया इश्तिहार
"यह जगह खाली हैं , आप दें अपना इश्तिहार" !!!
(सच्ची घटना पर आधारित )
--- अमित २०/१२/2009
दुनिया घिरी हैं आज मुद्दों से
हल किसी से न एक होता !
सोचो अगर मेज से हट
फैसला इनका खुले मैदान होता !
कश्मीर का मुद्दा क्रिकेट से अगर तय होता
"शारजहाँ " में तो "पाक" कश्मीर हम से ले गया होता !
और रंगभेद को ले कोई सिडनी गया होता
"पोंटिंग भैया " ने तो आस्ट्रेलिया को क्लीन चिट दिला दिया होता !
आतंकवाद अगर "वहाईट हाउस" छोड़ "अफगानिस्तान" में हल होता
कौन जाने आज "ओबामा" नहीं "ओसामा" विश्व नेता होता !
परमाणु अप्रसार को अगर "लालू " को सौपा होता
सारा "युरेनियम" उसकी भैंसों ने पचा दिया होता !
सोचो बेमानी , घूसखोरी , भर्ष्टाचार का कॉम्पटीशन होता
धन्यवाद हमारे नेताओं को ,
स्वर्ण , रजत और कांस्य सब इन्होने "भारत" के नाम करा दिया होता ...
--- अमित ३/१२/२००९
इसे साहस कहे या दुस्साहस
आधुनिकता कहे या बे-शर्मी ,
फैसला आप पैर छोड़ता हूँ
देखा जो इन आँखों से
किस्सा आप से वो कहता हूँ
करता था एक बस स्टेशन पर
श्री-मति जी का मैं इंतज़ार
माहौल बडा ही नीरस था
और बढती चहल कदमी से
खोता जा रहा धीरज था
निगाह हमारी आवारा पंछी सी
कहाँ एक जगह ठहरती हैं
इधर उधर घूम
साथ लगी बेंच पर पड़ी
अभी तक थी जो सुस्ती
वो अब अचरज बनी
बैठा बेंच परएक प्रेमी युगल था
फूटती दोनों से बडी प्रेम उमंग थी
गुजरने के लिए बीच
हवा को भी जगह तंग थी
देख कर उनके हाथों कि शरारत
हमको होती जा रही थी हरारत
जिस तरह वो थे एक दूजे में गम
देख कर उनको होते थे होश अपने गुम
उनकी देख येँ हरकत दिमाग अपना चल गई
जो देखी घटना, वो कविता बन सामने आ गई ...
--- अमित २२/११/०९
बडे एक शापिंग मॉल के
महंगे एक कैफे में
कर रहीं थी वो चुहल !
चर्चा बड़ी ही ख़ास थी
शर्मा जी के बेटी
जो दिखी वर्मा जी के बेटे के साथ !
एक ने कहा, " देखा "पर " निकल आए है !"
दूजी कहाँ चुप रहने वाली थी
अरे आप को नही होगा पता
"सुबह से शाम गुजरती साथ है "
आज कल तो बच्चो का चलन ही खराब है !
चर्चा चलती गई और कालिख पुतती गई !
घनन -घनन तभी मैडम का फ़ोन घंनाया
हंस खिलखिला कर दो बातें हुई
थोडी देर में मिलने का समय ठहराया !
किया सहेली को विदा अपनी
और घर फ़ोन लगाया
बेटा , पापा को बोलना
मम्मा को अर्जंट मीटिंग का कॉल आया,
आते घर शाम को देर होगी जरा !
थोडी देर गये पापा का भी फ़ोन आया था
फंस गये है वो मीटिंग में ये फरमाया था ,
मम्मा, बेचारी को कहाँ था पता
पापा की मीटिंग है उसी सहेली के साथ
चरित्र चर्चा चल रही थी जिसके साथ ...
--- अमित २२/०८/०९
दिल करता है
ज़ोर से चिल्लाऊं मैं
सामने है जो दिवार
उस से सर टकराऊं मैं
देखता हूँ जब आइना
करता है दिल कर दूँ चूर आइना मैं
घुटा है दम में इस चार दिवारी में
तोड़ के ये बंदिशें भाग जाऊं मैं
सभी तो यहाँ अपने ही है
इल्जाम किस के कत्ल का लूँ मैं
अपनों को कत्ल कर नही सकता मैं
हौसला नही कर लूँ ख़ुद -कुशी मैं
सोचता हूँ अब
जहाँ न ढूँढ सके कोई मुझे
जा कर ऐसी जगह खो जाऊं मैं ...
--- अमित ३ /०५/२००९
कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल में थी
अपने लिए तो सबको होती है
दुसरो के लिए , दिल में उसके थी ...
भीड़ से अलग रास्ता बनाना
काम येँ इतना आसान नही
आसानी से जो मिल जाए
वो मकाम , उसका मकाम नही ...
तैयारी अपनी भी पूरी थी
पता था ज़माना यों साथ न आएगा
ना जाने कब और कहाँ
यें ज़माना उंगली अपनी उठाएगा...
डर कोसो उसके कदमो से दूर था
पता था,
चाह है अगर रौशनी की
जलाना कुछ तो जरूर होगा ...
जले भी , तडपे भी ,
देख बदलते लोगो को
दिल दुखा भी ...
कदमो को पीछे हटा लेना
उसने कहाँ सीखा था
ऐसे लोग कहाँ मंजिल तक जाते है
मंजिल ख़ुद उनके क़दमों तक आती है ...
जीत आख़िर सच की ही होती है
उसकी दिखाई "जोत "
ज्वाला आज बनी जाती है ...
काम उसका हुआ पूरा
बारी अब हमारी है
जलाए यें जोत रखना
जिम्मेदारी अब हमारी है ...
( अपने गुरु जी को समर्पित )
--- अमित १४/०४/२००९

कुर्सी,
इस शब्द में ही अजीब सा खिंचाव है
देखते ही अपनी और खिंच लेती है
और जाते ही आगोश में इसके
जैसे मिट ही जाता सारा दर्द...
तभी तो देखा है
जितना बुड्ढा होता कोई
उतनी है बडी कुर्सी लेता ...
पता नही ,
कुछ को ये कुर्सी रास क्यों नही आती
या कुर्सी को "कोई" पसंद नही आता
और लेती कुर्सी किसी को तडपाने का मज़ा ...
देखते ही इनको कुर्सी को सूझता मजाक
ऐसा ही कुछ होता इनके साथ
जब होते ये जनाब कुर्सी के पास
उग जाते जैसे कांटे कुर्सी में
जिन्हें देख भागते फिरते यें ...
दूर से यें देंखे तो फूलों सी लगती कुर्सी
और बैठते ही इनके
अंगारों सी दहकती कुर्सी ...
खींचती कभी चुम्बक की तरह
और बैठते ही इनके
बिजली का झटका दिखाती कुर्सी ...
गज़ब है ये कुर्सी
जाने क्यों इनको इतना तडपाती
है ये बैरन कुर्सी ...
--- अमित ३० /०३ /२००९

ठहर सी गई है जिन्दगी;
अब कुछ ऐसा लगता है ...
आ कर एक दोराहे पर
कुछ सोच में पड़ गई है जिन्दगी
अब कुछ ऐसा लगता है ...
करने को तो है बहुत कुछ अभी
जाने जान हाथों से निकल गई हो
अब कुछ ऐसा लगता है ...
शयद सुबह करीब ही है
घना हुआ अँधेरा सा लगता है
मैं तो चाहता हूँ नींद से उठना
जाने क्यों शरीर थका सा लगता है ...
कुछ तो हो ऐसा अब
जो कर दे मुझे सागर सा चंचल
ये ठहराव अजीब सा लगता है अब ...
हर गये दिन जुमला एक
कानो में हमारे पड़ता हैं
छोड़ा हमको नही जायेगा
हर हिसाब हम से
एक दिन लिया ज़रूर जाएगा ,
कह कर कोई
गुस्से से अकड़ता हैं ...
आदत से हम भी मजबूर हैं
गुस्से पर मुस्काते हैं
जले हुए दिल को ,थोड़ा और जलाते हैं ...
येँ जनाब भी , जरा हट के हैं
सोचते हो हैं , जाने क्या कर देंगे
पकड़ कर कान चाँद का
जमीन पर ला रख देंगे
और पकड़ कर दुम शेर की
बना दरबान ,
खडा दरवाजे पर कर दंगे ...
धाक जम मगर कहीं न पाती हैं
बनती - बनती बाजी इनकी , बिगड़ ही जाती हैं
पासे जाने पलट कैसे जाते हैं
होकर इनका , इन्हे ही चिडाते हैं ...
खिसाय्नी बिल्ली सी इनकी हालत रहती हैं
और दुम सदा टांगो में छिपी रहती हैं ...
पडे जब भी उस पर पैर हमारा
"शांत रहो - शांत रहो "
गूंजता हैं कानो में येँ नारा ...
--- अमित
आला रे आला
SPICE-08 आला
सब टीमो ने अपना
परचम संभाला
आला रे आला
SPICE-08 आला
"सुखोई" जहाँ
ताकत में मदमस्त है ,
"पृथ्वी " भी वहां
सम्मान बनाये रखने की जुगत में व्यस्त है .
"अग्नि " और "भार्मोस"
दोनों तरफ़ से न कुछ आहट है
कमजोर न कोई इनको समझो
रणनीति के गुरुओं से भरपूर
दोनों टीमो की पुरी तैयारी है
देखना बस यह है
तरकश में तीर किस के कितने है
अब मैंदान में आने की बारी है ...
(SPICE : A sport event in Infosys for CCD Project...)
--- अमित
पनपते है हजारो सपने
हमारी आंखों में
और करते है हम सर्जन
उन रास्तों का
हो जिन से सच हमारे सपने
दी गई जब भी कोई चुनौती
हमने हाथो हाथ लिया
दृढ़ निश्चय कर हम आगे बढे
आसान माना ये डगर नही
साहस, भी यहाँ कम नही
रख अपने मूल्यों को ऊँचा
हर चुनौती पर विजय हमने पाई
देख ये बढ़ता हुआ आत्म विस्वास हमारा
जुड़ता जा रहा है हमसे दुनिया का हर किनारा
और आगे ही बढता जा रहा है कारवां हमारा
सबसे आगे जाने की है पूरी तैयारी
समय से तेज है रफ़्तार हमारी
हाँ , सब से अलग है पहचान हमारी ...
--- अमित २८ /०९ /०८
चाहे जहाँ चाहो
चले तुम जाओ
कौन परवाह करता है
क्या तुम्हे लगता है
बस तुम से ही हम है
न होगे तुम तो
कहीं न हम होंगे
तुम्हे क्या पता
बस, अपने दम से है हम
याद न एक दिन आयगी
मजे में बसर जिन्दगी हो जायेगी
क्यों ये विश्वास
आज हमे धोखा दिए जाता है
रह रह साथ गुजारा
हर पल याद आता है
की जो तुम से बे-रुखियाँ
जला उनसे आज मन जाता है
याद तुम न आओगे
ये महज एक धोखा था
न पाकर तुम्हे करीब
दिल अपना रोता है
ये न सोचता था कभी
इतने तुम याद आओगे ...
--- अमित १२/०७/०८
कहते है वो
हम से भी हो परदा
तो क्या हुआ
जो हम है एक - दूजे के
शर्म तो हमारा गहना है
आप कुछ कहे
हमें तो परदा-नशीं ही रहना है
ना रहे परदे में तो
हया से आँखे झुक जाती है
हाथों में लगी हिना की लाली
रुखसारों पे आ जाती है
सर्द सा जिस्म होने लगता है
जान सी जैसे, निकली जाती है
आप तो बडे बे-शर्म है
शर्म आप को कहाँ आती है
मिलती है आप से नज़रे
और जान हमारी जाती है
हलकी सी एक छुहन
सिरहन एक जिस्म में दौड़ जाती है
अभी रहो जरा दूर ही हम से
महोबत की ये खुमारी
हम से न सही जाती है ...
---अमित ३०/०६/०८
नारी कहे
क्यों बनू मैं सीता
तुम राम बनो या न बनो
मैं अग्नि परीक्षा में झोकी जाऊँगी
तुम तो फ़िर रहोगे महलो में
और मैं वनवास को जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं द्रोपदी
तुम धर्म-राज बनो या न बनो
मैं तो जुए में फ़िर हार दी जाऊँगी
तुम करोगे महाभारत सत्ता को
इसकी दोषी मैं रख दी जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं तारा
तुम हरिश्चंद बनो या न बनो
मैं तो नीच कहलादी जाऊँगी
मेरे बच्चे को मारोगे तुम
उसे जीवित कराने को मैं बुलाई जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं मीरा
तुम कान्हा बनो या न बनो
मेरी भक्ति तो फ़िर लज्जित की जायेगी
तुम को तो कुछ न होगा
और मैं विषपान को विवश की जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं अहिल्या
मैं तो फ़िर किसी इन्द्र के द्वारा छली जाऊँगी
और जीवन पत्थर बन राम की प्रतिक्षा में बिताओंगी
नारी कहे , कोई बताय
क्यों बनू मैं आदर्श नारी
क्या कोई आदर्श पुरूष मैं पाऊँगी ...
--- अमित १४/०५/०८