Thursday, August 30, 2007

इत्तिफाक ...

इत्तिफाक से
इत्तिफाक बड़ी हसीं चीज़ है
इत्तिफाक से
आदम मिले हव्बा से
और बनी ये दुनिया
इत्तिफाक से
हम भूलें रास्ता
और पहुंचे तेरी गलियों में
इत्तिफाक से
तकती थी तुम किसी का रास्ता
इत्तिफाक से
किस्मत थी हमारी मेहरबान
और हुआ तुम को
मेरा कोई दुसरा शक्स होने का मुगालता
इत्तिफाक से
उस दिन अपना दिल भी ना माना
और रहने दिया हमने वो मुगालता
जब हुआ ज़ाहिर ये इत्तिफाक
दिल अपना हमे दे चुके थे आप
मगर ये सच मानो तुम
इतना सब होना
नही था महज़ एक इत्तिफाक
उपर खुदा ने लिख दिया था
पहले ही हमारा-तुम्हारा
जीवन भर का साथ ...
--- अमित ३०/०८/०७

मायने ...

क्यों करती हो तुम
बार-बार बस एक ही सवाल
आख़िर क्या मायने है
तुम्हारी जिन्दगी के
क्यों मिला है तुम्हे ये जन्म
समझाया है मैंने हमेशा तुम को
बनाने वाले ने सब को एक सा बनाया
दिए सब को दो पैर- दो हाथ
एक दिल , दो आंख और एक दिमाग
दी आंखें, देखो दुनिया को
दिया दिमाग, समझो इस को
दिया दिल , करो साहस रखो विश्वास
दिए पैर, हिम्मत कर खडे होने को
और हाथ, कुछ कर गुजरने को
फिर क्यों पूछते हो यह बार-बार
नही तो तुम मजलूम
नही हो तुम लाचार
उठो, अगर नही मिलते मायने जिन्दगी के
करो कुछ नया सर्जन
और दो खुद के मायने
जिन्दगी को अपनी तुम ...
--- अमित ३०/०८/०७

अहसास !!!

अहसास !!!
मानो तो एक जीवन
ना मानो तो बस एक शब्द
मुझे अहसास है की
तू मेरे साथ है
और यह अहसास ही
मेरे जीने की आस है
तेरे प्यार का अहसास
यही तो है जिसने दिया
इस ज़र्रे को खास होने का अहसास
यह अहसास ही तो है
जिसने दूरी को भी नजदीकियां कर दिया
मैंने ज़रा बंद की अपनी आँखें
और दिल में तेरे चहरे का दीदार कर लिया
अभी चल रहा है विरह माना
मैंने तो करता हूँ, तुम भी कभी आजमाना
बंद अपनी आंखे करना
अपने मन में मेरा स्पर्श का अहसास लाना
देखना विरह ना तुम्हे सतायेगी
और अपने मिलन का अहसास तुम कर पाओगी ....

--- अमित ३०/०८/०७

Tuesday, August 21, 2007

ख़ून-ए-दिल ...

दुखता है अब बहुत दिल मेरा
होता है बेचैन दिल मेरा
जुबान से नही होते बयां
अब मेरे ज़ज्बात
और आँखें करती
हर ज़ज्बात बयां हमारा
मैं तो रहा हमेशा ही
महफिलों में भी अकेला
इस अकेलेपन में भी
किसी ने ना हमे कभी छोडा
हम तो किसी से कुछ ना बोले
लोगो ने हर कदम
हम को किया रुसवा
हमारा दिल तोडा
और दिया है हमे
ज़ज्बातों से खेलने का इलज़ाम
मेरी जुबां हमेशा चुप रही
दिल का लहू मगर चुप ना रहा
और ज़ोर ज़ोर पुकारा
देखों कभी गरेबान में अपने
मेरे दिल का ही नही
ना जाने कितनों का
ख़ून-ए- दिल है जो
ले रहा है नाम तुम्हारा ...
--- अमित २१/०८/07

यह सच है मगर ...

तुम मानोगे नही
यह सच है मगर
दिल कभी तुम्हारा
दुखाया नही हमने जानकर
कुछ समय का साथ ऐसा था
सब कुछ लुटा, कुछ पाया नही
चाहा है तुम्हे तह-ए-दिल से
काम मगर ये कुछ आया नही
हमने हमेशा तुम्हारी खुशियाँ ही चाही
और ना जाने ऐसा क्यों हुआ
हुई कुछ गलत फेहमिया
और ख़ुशी के बदले दुःख हम दोनो ने पाया
तुम को लगता पत्थर हूँ मैं
देखा तुमने कभी नही
इस पत्थर दिल इन्सान ने
सीने में मॉम सा एक दिल पाया है
आप ने किया गुस्सा हम पर
बुरा बहुत हम को बताया
तोड़ रिश्ता हमसे कहीँ और जोड़ लिया
हम तो आज भी तनहा रहते है
और सब से कहते है
कभी किसी का दिल ना दुखाना ...
--- अमित २१/०८/०७

Sunday, August 19, 2007

समझते हो हमे ...

क्यों करते हो नाहक कोशिश
समझ हम को जाने की
रखा था जिसने
नौ महिने अपने गर्भ में
पाला-पोसा , बड़ा किया जिसने
करती है वो आज भी कोशिश
समझ हम को जाने की
तुम से हमारा तो
बस इत्तिफाक है चन्द मुलाकातों का
और उस पर दावा है
तुमने हमे समझा है, तुमने हमे जाना है
क्यों छलते हो अपने आप को
करते जाओ योंही कोशिश
हमे समझना आसान नही
यह तो एक लम्बा सफ़र है
जिसका तुम्हे अनुमान नही
ये तो तुम्हारा आगाज़ ही है
अंजाम किसी को पता नही ...
--- अमित १९/०८/०७

Tuesday, August 14, 2007

हम हिंदुस्तानी ...


उठी है जब भी

कोई ऊँगली तुझ पर

और हुई कोई गुस्ताखी

तेरी शान में

चढ़ी है हमेशा ही त्योरिया

और आया है उबल

रगो में दौड़ता लहू

फड़क उठती है भुजाये

और जल उठते है आंखों में शोले

वो सोच भी सकते है कैसे

जो खडे हो हमारे खिलाफ

हम तो ऐसे है

जो घर से बाहर ना झाकें

और ऐसे भी

जो डाले हम पर बुरी नज़र

हम उसको ना छोड़े कहीँ पर

आये जो नेक नियत से

उससे मिले हम खुले दिल से

सीखाया है उसे सबक बडा अनोखा

की जिसने भी कोशिश दे हमे धोखा

हम तो अपनी राह चलते है

खुश रहते है ,औरों को खुश रखते है

उन्नति को और अपना हर कदम बढाते है

सारे जग में "हिंदुस्तानी " हम कहलाते हैं ...


--- अमित १४/०८/०७

Saturday, August 11, 2007

कुछ अनकही सी...

मिले वो बाद अर्से के आज
हुई फिर उनसे
बाते कुछ अनकही सी
लब उनके सिले थे
लब हमारे सिले थे
खामोशी से आंखों-आंखों मे
बातों के वो दौर चले थे
देती थी सुनाई
उनके दिल की धड़कन
छूती थी मुझको
उनके साँसों ही गर्माहट
होती थी साफ महसूस
हरारत उनके बदन की
झलकती थी बेताबी चेहरे पर
उनके चंचल मन की
आपस में उलझी उँगलियाँ
दिखाती थी उथल-पुथल
कुछ ख्यालों की
जो चल रही थी
अंतर-मन में कहीँ
वो हिज़र भी क्या था खुदा
जो था उन्होने
उपर से नीचे तक ओढा हुआ
एक दूजे की आंखों में
दोनो यों डूबे थे
कुछ ख़बर ना थी
कब दिन का दामन छुटा
और शब ने कलाई थाम ली
अब तो वक़्त-ए-रुखसत था
जाने कैसे इन पलकों ने
अश्कों की बाढं
आंखों के साहिल पर थाम ली ...
--- अमित ११/०८/०७

Friday, August 10, 2007

तेरी चुडियॉ ...


लगती हैं बड़ी सुंदर तुम पर
फबती हैं हर दम तुम पर
मोह लेती मेरा मन
जब करती ये छन-छन
नाज़ुक है तेरी कलाईयां
बनाती ये उनको और सुंदर
जब चढती यें उन पर
नीली-पीली हैं रंग बिरंगी
मेरे प्यार की यें है सोगात
कांच की हैं, पर पूरा करती यें तेरा शृंगार
कीमत तो है इनकी, झलकता इनसे प्यार
तू है सुहागन दर्शाती हैं यें हर दम
रहे तू सदा सुहागन , यही कहता है
तेरी कलाई में पडी हर चूड़ी का मन ...


--- अमित १०/०८/०७

Tuesday, August 7, 2007

मेरी माँ ...


बोलना जब आता नही था


मेरा हर इशारा समझती थी वो,


चलना जब आता नही था


ऊँगली थाम चलाती थी वो,


रहता था जब मैं बीमार
रात रात भर कहॉ सोती थी वो,


ज्ञान का पहला पाठ पढाने वाली थी वो,


जागा किया करता था जब पढने को


मेरा पूरा ख़्याल रखती थी वो,


जब भी कभी चोट लगी मुझको


ना जाने कितने प्यार से संभालती थी वो,


याद है मुझे जब गया था दूर काम को मैं


खुश थी मगर जुदाई के अंशु छुपाती थी वो,


हुई थी जब मेरी शादी


ख़ुशी से हर तरफ नाचती थी वो,


मैं बस सोचता भर ही हूँ


मेरे मन की हर बात जान जाती है वो,


तुम पूछते हो कैसी है वो
और मैं सोचता हूँ


शब्दों मैं कैसे तुम को बता दूं


मेरी "माँ" है वो बस इश्वेर के जैसी है वो...






--- अमित ०७/०८/०७

Monday, August 6, 2007

यह मजबूरी ...

सूरज ने अभी ठीक से आँखें भी ना खोली थी
और आधी दुनिया नींद के झूले में झूल रही थी
ऐसे में कोई उठा और निकल पडा रोजी की तालाश में
परवाह है ना उसे अधूरी नींद की और ना फिक्र आराम की
कम्बख्त, जेठ की गरमी भी बड़ी निरदयी है
यह देखती है ना कोई मजबूरी ,ना कोई लाचारी
यह देखती है ना कोई नंगा शरीर और ना भूखा पेट
यह जानती है बस झुल्साना शरीर का
लगा हुआ है मगर वो अपने काम में
भूलाकर इस तपती धुप का प्रहार
धुप की जलन कहॉ उसको जलाती है
यह तो पेट की आग है जो उस से ना सही जाती है
परिवार उसका भूखा है यह सोच कुदाल और तेज़ हो जाती है
सच है, यह पेट की भूख , ये मजबूरी
इस इन्सान से ना जाने क्या क्या करवाती है ...
--- अमित ०६/०८/०७

Sunday, August 5, 2007

तुझ से मिलना ...

देखा था जब आते तुझे
मंदिर में पहली बार
रह गया था, एक सकते में मैं
थी तो तुम एक दम सादा
किया था मगर इस सादगी ने
मुझे आकर्षित बहुत ज्यादा था
आकर तेरा वो झुक कर, मंदिर का दर छूना
कर के दुपट्टा सिर पर , वो आरती लेना
की थी जब तुने पूजा में बंद आँखें
लगता था चहरे की आभा से
लगी हो जैसे पुकार तेरी , सीधी इश्वेर से जाके
ना जाने क्यों लगा था मुझे
सफल होगया मेरा जीवन उस दिन वहाँ आके
और फिर अपनी माँ के साथ मेरी करीब आना
लिये आंखों में हया, वो मुझसे बाते करना
ज्यों ज्यों मैं तुम से बाते किया जाता था
बस तेरी सादगी पर ही मैं आसक्त हुआ जाता था
तेरी कही एक एक बात तेरे मन का आईना था
सच इश्वेर ने बड़ी सादगी से तुम्हे बनाया था
मेरी किस्मत ने आज खटखटाया मेरा दरवाजा था
और हम बने जीवन साथी, यह दोनो दिलों का फैसला करवाया था ...
--- अमित ०५/०८/०७

Friday, August 3, 2007

बस तेरे लिए ...

दी है रब ने मुझे ये आंखें
तेरा दीदार करने के लिए
दी है रब ने मुझे साँसे
तुझे प्यार करने के लिये
दिये है रब ने मुझे ये होंठ
तेरे रुप का बयां करने के लिये
दिये है रब ने मुझे यह हाथ
तेरा शृंगार करने के लिये
दिया है रब ने मुझे दिल
तुझको दुनिया की नज़र से बचा कर रखने के लिए
दी है इस दिल में धड़कने
तुझे बे-इन्तहा मोहब्बत करने के लिये
तुम मानो या ना मानो
दिया है रब ने मुझे जन्म
बस तेरे लिये ...
--- अमित ०३/०८/०७

ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे ...

ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
सावन में बरसती
रिम झिम बरखा में
ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
बहारों में खिले
फूलों के गुलिस्तां में
ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
उगते सूरज की लालिमा में
ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
चांद की चांदनी में
ढून्ढता हूँ मैं तुम्हे
मस्जिद से उठती अज़ानो में
और मंदिर से आती आरती में
जैसे ढून्ढता कस्तूरी मृग
कस्तूरी को हर जगह
मैं ढून्ढता तुम को
हर जगह और जानता नही
तुम बसी "मेरे दिल में "...
--- अमित ०३/०८/०७

Tuesday, July 31, 2007

बचपन ...

उड़ता था मन मेरा तब


मेरी किताब के कागज़ के जहाज़ पर


लेती थी हिचकोले


जब चलती थी


वो कागज़ की कश्ती


बारिश के ठहरे पानी पर


डोर कहॉ किस के पास कभी थी


बिन डोर ही उड़ता था मन


इस उंचे अनंत आकाश पर


छोटी छोटी उन आंखों में


ना जाने कितने सपने थे


कल का सपना था क्या


ये किसको याद होता था


हर दिन देखे एक नया सपना


बस यही काम तो अपना होता था


सच ही तो है


बचपन को किसी से क्या मतलब होता है


उसको तो बस कल के दिन का इन्ज़ार है


कल उसको नया कुछ करना है ...
--- अमित २/०८/०५

Monday, July 30, 2007

तनहाईयां...

जब भी मैं उदास होता हूँ
और दुनिया से क्या अपने से भी भाग जाना चाहता हूँ
तव मैं बस तनहाईयां तलाशता हूँ
वहाँ जाकर आता है , मेरे दिल को करार
और मिलता है मेरी बेचैनी को आराम
माँ की गोद सी भाती है मुझे तन्हाई
आते ही जहाँ, दूर होती थकान
और आती जिस्म में नई जान
यो तो आते है और भी यहाँ
चन्द घड़ियाँ ही बस वो बताते यहाँ
और फिर खो जाते फिर इस दुनिया में
और नही सुन पाते अपने दिल की जुबान
मैं तो अक्सर आता यहाँ
करता घंटो अपने दिल से बात
मेरे दिल की आवाज़ मुझे सीखाती
कैसे इस दुनिया में है अपनी लडाई लड़ी जाती
कैसे बचाये जाते अपने नैतिक मुल्य
और कैसे बना जाता एक अच्छा इन्सान
हक़ीकत है , तन्हाई
कभी कभी बडा काम आती
और कुछ करे या ना करे
मुझे हमेशा ही जीने की नई राह दिखाती ...
--- अमित ०९/०४/०५

वो शख्स ...

देखा , आज सुबह
एक जाना पहचाना मगर अनजान चेहरा
देखकर जिस को ,
दो पल को समय जैसे ठ्हेरा
और याद आया
एक दिल अजीज़ शख्स
बडा ही जिंदा दिल
बडा खुश मिजाज़ , वो शख्स
जिंदा दिली इतनी की
जिन्दगी भी जीने का हुनर उससे सीखे
और खुश मिजाजी इतनी
खुशियाँ भी चन्द घड़िया उससे उधार मांगे
दुनिया को अपना बनाने की कला
भी बखूबी उसने पाई
अपना दिल उसको दे बैठा
हर एक शख्स , जो उसके करीब आया
मैं भी था खुश नसीब
मेरा भी कुछ नाता उनसे बन पाया
घड़ियाँ कब मगर एक सी घूमती है
वक़्त ने लिया एक दिन , बडा अजीब फेरा
और लगा गया हम सब की दिलो पर
आघात एक बडा ही गहरा
उस एक ख़बर ने
दिलों को सबके झकझोर दिया
हुई एक दुर्घटना
जिसमे उसने , जिन्दगी का दामन ही छोड़ दिया
घर से आती रोने की आवाज़
किसी से भी ना सही जाती थी
जहाँ दूर नज़र डालो
आंखों में बस नमी ही नज़र आती थी
कोई और नही
"शेलेंद्र भैया " ही थे वोह शख्स
जिनके जाने के गम मे सब रोये जाते थे
आज उनको गये अरसा हो गया
और हम सभी आज भी है उनकी यादें संजोये हुए ...
( अपने दोस्त के भाई की कार दुर्घटना में सपरिवार मृत्यु पर )
--- अमित ०४/०४/०५

Sunday, July 29, 2007

इन्सान ...

क्या, इस दुनिया में
धोखा, फरेब और
दुसरे का दिल तोड़ , खुश होना
बस, यही काम रह गया है इन्सान का
क्या बस, यही रह गई है इंसानियत
एक समय था जब
चोट मुझको लगती थी
और दर्द मेरे साथी को होता था
उसके घर में गम होता था
और चूल्हा मेरा ठण्डा सोता था
एक की जान में दुसरे की जान
एक के दिल में दूजे का दिल रहता था
मगर आज इन्सान को यह क्या हो गया
खुद ही दिल का दर्द बना है
उस पर झूटी हमदर्दी का
मरहम कर रहा
ग़र यही दुनिया , यही इनानियत है तो
मैं एक पल भी साथ ना इसका चाहुगा
कल का जाता इस दुनिया से
साथ आज ही इसका छोर जाऊँगा ...
--- अमित १०/०४/०५

सादगी ...

अब तक ना जाने
कितने लोग मेरी जिन्दगी में आये
किसी के लिये मैं ठहरा नही
मिला तो बहुतो से
दिल में इतना गहरा कोई उतरा नही
बातें तो सभी करते हैं
खरा कोई उतरा नही
देखा है मगर जबसे तुम्हे
ठहर गई है मेरी तालाश
तुझ सी सादगी, तुझ सा भोलापन
और कहीँ देखा नही
बनावट और देखावा
फरेब और छलावा
इन् शब्दों को जैसे
तुने कभी सुना ही नही
तेरी हर बात से झलकता
तेरे सुंदर मन का भोलापन
तू अच्छी है तो सब अच्छे है
ऐसा ही सदा तुमने माना
सबके लिये तेरे दिल मैं बस प्यार ही प्यार भरा
तेरी इसी अदा ने जीत लिया दिल साबका
मेरे दिल में तो बस तेरी ही तस्वीर बसी
जब दिल चाहता तेरी तस्वीर देख मैं इतराता
तू मेरे दिल का साथी है यह एह्साह सुकून बडा मुझे पहुँचता ...
--- अमित ०५/०५/०५

दो जिस्म एक जान ..

दो जिस्म एक जान है हम
यही तो कहा था तुमने
सच ही है क्या गलत कहा था तुमने
हम दो जिस्म एक जान ही है
तभी तो होता है
एक जिस्म का दर्द
जान से होकर दुसरे में जाता है
कहता मैं कुछ हूँ
जान कुछ समझती है
और दुसरे जिस्म तक जाते उसका रुप ही बदला जाता है
जान ही तो एक है हमारी
मस्तिष्क तो दोनो जिस्मो के हिस्से में अपना अपना आता है
और जब यह काम करता है तो
ऐसा क्यों लगता दोनो जिस्मो में से जान को जुदा कर जाता है ...
- अमित २९/०७/०७

जब प्यार किसी से होता है ...

क्यों होता है ऐसा

कोई अनजाना कभी कभी

लगता जान पहचाना
क्यों उठती हैं उमंगें

रह रह कर उस से मिलने की

क्यों रहता है दिल बेचैन

जा कर दूर उससे
आजाता है क्यों सुकून

करीब आकर उसके

क्यों लगती है राते लम्बी

और लगते है फिसलने दिन हाथों से

बातें चले औरो की

और ज़िक्र हो उसके

दिन भर रहा ना दूर उस से जाये

और रातों को भी नींद ना आये

हम जब भी सोये

तो आकर खावाबों में वो हमे जगाये

बैठे हो लिखने कुछ

और तस्वीर उसकी बन जाये

निकले हो हम अपने घर को

और पहुंच उसकी गली को जाये

नाम पूछा जाये हम से हमारा

और जुबां पर उसका नाम आये

जहाँ भी हम जाये, करीब ही उसको पाए

क्यों लगता है अपनी दुनिया

सिमटकर बस उसी पर ख़त्म हो जाये

हाँ , ऐसा ही सब कुछ होता है

जब प्यार किसी से होता है ...



--- अमित १४/०५/०५

Friday, July 27, 2007

मेरा रास्ता ...

ऐसा नही की मैं जानता नही

जो मैं लिखता हूँ , सब जानता हूँ मैं

क्या हुआ जो मेरे पास अच्छे शब्द नही

मेरी भावनाओ में कोई कमी नही

क्या हुआ जो मेरी सोच की जड़े गहरी नही

सोच मगर अपनी कहीँ ठहरी नही

निगाह है फलक पर मेरी और

पांव पड़ता है जमीन पर मेरा

बैर किसी से नही है मेरा
खुद का खुद से ही है वास्ता
दम अभी नही है किसी में
जो रोक सके मेरा रास्ता
चन्द घड़िया ज़रा बस रुका हूँ मैं
तय करना है मुझे अभी बहुत लम्बा रास्ता ...
--- अमित २८/०७/०७


Wednesday, July 25, 2007

दोस्त की मृत्यु ...

सुना बारे में उसके
मगर विश्ववास ना हुआ
देखा जब आंखों से
यकीन तव भी ना हुआ
भरा जब उसे बाहों में
तव भी लगा
नही , ऐसा कुछ ना हुआ
और ऐसा हो भी कैसे सकता था
वो, जो मेरी बाहों में था
मेरा दोस्त था और
कुछ देर पहले
सब कुछ ठीक था
और पल भर में
ये क्या हो गया
वो हम को छोड कर चला गया
लगा मैं कोई सपना देख रहा
काश ,
काश , ऐसा ही होता
यह एक सपना ही होता
तो वो जिस्म
जो मेरी बाहों में बेजान पडा था
मेरी बाँहों में हो , मेरे साथ होता
अफ़सोस , ऐसा कुछ ना हुआ
सच , बडा दुःख भरा था वो समय
जब यह सब हुआ
"विवेक " की मृत्यु सब को झकझोर दिया
बडा ही मुश्किल होता है वोह पल
जब छुट जाता है कोई अपना
और रह जाती है कुछ मुट्ठी भर यादें
हमे कभी कुछ याद कर ह्साने
और तन्हाई में जा कर
कुछ आंसुओं को बहाने ...

( अपने दोस्त विवेक की मृत्यु पर )
--- अमित १४/०५/०५

Tuesday, July 24, 2007

जानता हूँ मैं ...

क्या सोचती तो तुम
पता नही चलेगा, ग़र कहोगी नही तुम
जानता हूँ , चाहती हो मुझे
तेरी आंखों की शरारत
तेरे होंठों की मुस्कराहट
तेरे दिल की कसक
सब है पता मुझे
मगर चाहती हो तुम छुपाना
दिन कटता है हमारे साथ
और गुजर जाती है रात कर के हमेयाद
नींद तो तुम्हे अब आती नही
रहती हो ख्यालो में दिन रात
नही रह पाती हो दूर हम से
छुपा नही है अब यह राज़
दिल बेचैन , बेताब धड़कन और प्यासी नज़र
करती हैं अब बस हमारा इंतज़ार
तुम्हारा पहला प्यार हूँ मैं
और हूँ जिन्दगी से भी प्यारा
छौड दोगे ज़माना ,ग़र हो जाऊं तुम्हारा
जानता हूँ तेरे दिल की इक इक बात
जानती तुम नही
है अपना भी यही हाल
तुम को भी है यह एहसास
चाहती हो करु पहले मैं इकरार
हाँ, यह भी जानता हूँ मैं
चाहता हूँ अभी लेना तेरी तड़प का मज़ा
इस लिए अब तक चुप मैं रहा
अब मगर दूरी नही सही जाती है
तुम कहो या ना, जुबां मेरी कहना चाहती है
हाँ,
हाँ, हमे महौबत है ...
--- अमित २०/०५/०५

मेरी जिन्दगी ...

जानती नही तुम
लाकर मेरी जिन्दगी में तुम्हे
किया है अहसान उसने बडा
साँसे तो तव भी चल रही थी
जी रह हूँ अब मैं
खुश तो तव भी था
ख़ुशी को अब पहचान रह हूँ अब मैं
जब से आई हो जिन्दगी में
आये हैं नये मायने इस में
ख़्वाब तो देखे थे पहले भी
रंग उनको तुमने दिए
जिन्दगी तो गुजर ही रही थी
जीने के हुनर तुम ने दिए
ग़र कोई पूछ ले हम से
कहते किसे है हम "जिन्दगी"
सामने तुम को कर देंगे
और कह देंगे
यह ही है हमारी "जिन्दगी"
--- अमित २८/०५/०५

Friday, July 20, 2007

सच्चाई ...

बोलता हूँ मैं
सच सच बोलो तुम
मैं बस चाहता हूँ
सच सुनना
छोड़ दूगां मैं साथ तुम्हारा
ग़र लगा मुझे यह कोई अफसाना
डरी, सहमी सी वो बोली
हाँ,
कभी चाहा था मैने
उसको, हद्द से जयादा
यकीन जानो
हमेशा से जानती हूँ
मैं अपनी मरियादा
ना जाने फिर क्या हुआ
बस , इतना सुना
कहा उसने
नही रह सकते अब हम साथ
चली जाओ तुम मेरी जिन्दगी से आज
क्या
क्या, बस येही था सच्चाई का इनाम
या
बस इतना ही था साहस मिलने का उस से
सच्चाई है जिसका नाम।
--- अमित २०/०७/०७

Monday, July 16, 2007

यह जीवन ...

यह जीवन
बडा ही विचित्र
बडा ही रहस्मयी
और सदा ही भर्माता हमे
क्या छिपा है
भविष्य के गर्भ मे
यह कोई ना जान सका
उस पर भी देखो
यह मानव
अपने भविष्य की
क्या क्या सुनहरी
कल्पनाए कर रह
जनता यह इतना भी नही
होगा कल क्या
इस पर
यह समय
रोज देता हमे
नई चुनोती
और करता प्रयास
रोके हमारे बढते कदम
मगर यह तो है मानव धर्म
दिखलाए अपना परुसार्थ
स्वीकार करे इसकी चुनोती
और करे निरंतर प्रयास
अपनी विजय का
अगर ऐसा हुआ
यक़ीनन एक दिन आएगा
तुम्हारा आज
तुमसे पूछेगा
बता बन्दे
तू कल अपने लिए
कैसा जीवन चाहेगा ...
--- अमित २१/०४/०५

Friday, July 13, 2007

हिम्मत ...

राहे जिन्दगी में
ना जाने कितनी बार
लडखडाओगे तुम
ना जाने कितनी बार
गिरोगे तुम
कोई गम , कोई फिक्र
ना तुम को इस से आने पाए
जब भी लडखडाओ
और अधिक ताक़त अपने पैरों में लाओ
जब भी गिरो तुम
और लड़ने की लगन जगाओ तुम
तुम गिरे तो कोई गम नही , कोई हार नही
मन का विश्वास ना गिरने दो तुम
उम्मीदे ना अपनी कम होने दो तुम
जो विश्वास ना डग्मगायेगा
तो कोई मुश्किल
कोई परेशानी
क्यों ना तुम्हारे सामने आये
दूर तुम्हारे विश्वास से बस पल में हो जाये
ग़र मन में हो विश्वास मंज़िल पाने का
और हो उम्मीद जीत जाने की
तो बस देखना तुम
रास्ते खुद-ब-खुद बन जायेगे
और मंज़िल तुम्हे मिल जायेगी ...
--- अमित २८/०५/०५

Thursday, July 12, 2007

जा रही है तू ...

तुझे जाना है
मालूम था मुझे
तू जा रही है
मालूम है मुझे
मगर याद आ रही है मुझे
मुझसे कही तेरी हर बात
तेरे साथ गुजारा हर लम्हा
और तेरी बेपन्हा मोहबत
साथ ही तड़पा रही है
तुझ से होने वाली जुदाई
हाँ , स्वार्थी ही हूँ मैं
और हूँ भी क्यों ना
दिया हैं तुने मुझे कितना अनमोल एहसास
खोना जिस को आता नाही
ख्यालों मे भी मेरे पास
सोचते ही तुझसे दूरी का
निकल जाती है मेरी जान
लगती है वीरान यह दुनिया
और बेमानी सा यह जहान
कहॉ था मैं , एक अच्छा इन्सान
कहॉ था मैं , तेरे काबिल
की तुने बेपन्हा मोहबत
और बनाया मुझे इक इन्सान
अब जा रही है तू
लगता है मर रहा है वोह इन्सान
ना जा , रूक जा तू
तुझे तो पता है
तुझ में ही बसी है मेरी जान
ग़र हो गई तू दूर मुझसे
निकल जायेगी
मेरे जिस्म से मेरी जान ...
---- अमित २५/०६/०५

चले आओ यारो ...


आओ कभी ऐसे भी
बैठे हम साथ
नीचे ज़मीन
ऊपर हो खुला आकाश
खुशियों के दौर
और मस्त समां होगा
कुछ तुम अपनी सुनाओ
कुछ हम अपनी कहते हों
चलेगा जब दौर
बीती बातों का
ताजा हुआ
गुज़रे जमाने का एहसास होगा
चले आओ किसी शाम तो यारो
मुद्दत हुई है
जब गुजरा करती थी यारों के साथ अपनी शाम ...
--- अमित ०६/०७/ ०७

मीठे सपनो की आंखमीचोली...

भोंर बस होने को थी
आँखें मीठी नींद में डूबी थी
मेरे तन पर आलस्य पूरा छाया था
गई रात बड़ी सुहानी थी
सो मीठे सपनो का भी आना जाना था
अभी ना ये सब छोडा जाये
थोडी देर और इस खुमार मे जिया जाये
सुबह हो गई
अब तो हमे छोड़ो जी ,
तुम धीरे से बोली

और दिल करता रह

बस यों ही कानो में
रस घोलती रहे तुम्हारी शहद से मीठी बोली
और यों ही चलती रहे
हम से मीठे सपनो की आंखमीचोली...
--- अमित १२/०७/०७

तुम्हे क्या दे ...

सोचा किये तुम्हारे लिए
तारे तोड लाये
फिर ख्याल आया
ये आशिक कहॉ जायेंगे
जो तारे गिनते है
वोह अपनी रात कैसे बीतायेँगे
सोचा किये तुम्हारे लिए
चांद जमीन पर उतार लाये
ख्याल आया
ये शायर कहॉ जायेंगे
जो अपनी महबूबा देखते है चांद में
वोह अपनी ग़ज़ल कैसे बनायेगे
सोचा किये तुम्हारी राह में
फूलो को हम बिछायेंगे
ख्याल आया
ये भौरे कहॉ जायेंगे
जो लेते हैं कलियों का रस
वोह तो प्यासे ही मर जायेंगे
सोचते है तुम्हे और क्या दे
हमारे सूरज चांद सब तुम हो
तुम से दिन रात हमरी है
दिल तुम्हे दे चुके है
बस जिस्म हमारा है
और उस मे बसी जान तुम्हारी है.॥
--- अमित १२/०७/०७

Tuesday, July 3, 2007

प्यार किया है ...

जब साँसों का डोर उलझने लगेगी
जब नसों में दर्द जमने लगेगा
धुंधला चुकी होंगी जब आंखें
डूबा उम्मीद का तारा होगा
दूर तलक इस जहाँ में
कोई भी हमारा सहारा ना होगा
कभी तुम पुकार कर देखना
मौत से भी चंद लम्हे
मैं चुरा लाऊँगा
तुम्हे इतना प्यार किया है
इस तरह जहाँ से चला नही जाऊँगा .॥
--- अमित ०३/०७/०७

Monday, July 2, 2007

जब तुम बोलो ...

लगता जैसे दूर कहीँ
झरना गीरे पर्वतों से
लगता जैसे कल-कल बहे
करीब नदिया कहीँ से
लगता जैसे कूके कोयल
दूर कहीँ बन से
लगता छेड़े जैसे कोई बंसी की तान
ज़रा नजदीक से मेरे
लगता जैसे गूंजे घंटा
दूर कहीँ किसी मंदिर से
ये सब मुझको लगता
जब तुम बोलो हलके हलके.॥
--- अमित ०२/०७/०७

Sunday, July 1, 2007

यह मैसूर कि फिजा ...


कैसा सुहाना मौसम है
कैसी अल्हड हुई हवा है
झूम झूम तरु भी करते
अपनी खुशी का बखान
छाई है काली बदली
अनंत फैले इस आसमान में
ज़र्रा ज़र्रा धरती का
है हर ओर सुगंध अपनी फैलाये
रिमझिम होती बरखा
रहती है हर दम
मन को मेरे हर्षाए
सच है हो गई है
मोह्बत मुझे भी
इस हसीं फिजा से
सोचता है दिल
अब ना जाये हम
"मैसूर" की ज़मीं से कहीँ
क्योंकि जो फिजा यहाँ
वो नही ओर कहीँ ...


--- अमित ०२/०७/०७

Monday, June 25, 2007

नवेली ...

कल ही कि तो बात थी
आई थी लाल जोडे में सजकर
छन-छन करती उस घर में, वो
अभी बरस भर भी नही हुआ था
कि चली गई फिर उसी जोडे में कुछ कान्धो पर वो
सुना है, बीमार थी वो
जानते सब है क्या बीमारी थी वोह,
अभी छः महिने भी नही हुऐ
आयी नवेली कोई
सजकर लाल जोडे में फिर उस घर मे ...
--- अमित २५/०६/०७

Thursday, June 21, 2007

ये भौरें ...

कलियों की, बागीचे मे हमारे कमी नही
सच यह भी है
तुम सी हसींन कोई नही
बैठे है भौरें यहाँ हर कलि पर सभी
जमी है मगर सभी की नज़रे
तुम पर कहीँ ना कहीँ
हसरत तो ना जाने कितने है इनकी
तरसते है इस बात को भी
छुले एक बार , बस एक बार
वो भी तुम्हे कभी
भारी हो जाती हैं साँसे इनकी
गुज़र जाती है जब
तुम्हारी खुशबूँ भी करीब से कहीँ
थमी से रहती है जिन्दगी इनकी
जब तक ना पडे तुम पर नज़र इनकी
देखे जब तुमको
आ जाता है बेचैन दिल को इनके करार
दीवानगी ने इनकी किया है इनका नाम
और इन्होने ही दिया "एस-एस-टी" तुम को नाम...
(आपने "सी-सी-डी" के भाईयों के लिये एक प्रयास!)।
--- अमित २१/०६/07

Wednesday, June 20, 2007

ये प्यार है ...

जब गया करीब उसके
ज़रा दूर हो गई
जब की बात उससे
ज़रा खामोश हो गई
मैं हुआ खफ़ा तो
आज फिर उसने क्हा
मैं करती हूँ प्यार तुम्हे
समझते तुम क्यों नही
सही है हम ही ना समझ है
मगर फिर किसी ने क्यों कहा
ये प्यार है
पृदर्शन माँगता है यह...
--- अमित २०/०६/०७

Monday, June 18, 2007

एक भजन : स्वामीनारायण संस्था से ...

मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान
सृष्टी के इस तेरे बाग़ मे, पुष्पो की हम शान;
जीवनभर सौरभ फैलाकर गाये तव गुणगान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान
मात-पिता और गुरूजी को हम पूजे देव समान
विश्व बंधुता , मानव सेवा सब से हो मुस्कान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान
बोले मुह शुभ, देखे नैंयन शुभ और सुने शुभ कान
पैर हमारे ठहरे मंदिर , संत समागम स्थान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान
दिग दिगंत है तेरी महिमा , मुखरित हिन्दूस्तान

अक्षर
हम को ले ले गोद मे , हम तेरी संतान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान

स्त्रोत्र : http://swaminarayan.org/publications/audio/anandrang.htm

Saturday, June 16, 2007

आओ देखे ख्वाब ...

अक्सर
मैं खोया रहता हूँ

कुछ अनजाने ख्वाबो में
और बनाता रहता हूँ
अपनी जिन्दगी का फसाना
यही तो ख्वाब है
जो सिखाते है इन्सान को जीना
यही तो है जो बने
बुनियाद हमारी खुशियों की
हमे चाहिऐ देखे हम ख़्वाब
अपने सुनहरे भविष्य के
मगर यहाँ आकर हम को है संभालना
maanaa हक है देखे हम ख्वाब
बनाए उस में आशियाना
और बटोरे
जमाने की सारी खुशियाँ
मगर ध्यान रहे
ख्वाब ,ख्वाब ही ना रह जाये
एक ज़रूरी काम अभी बाक़ी है
अभी तो यह ख्वाब है
इसका हक़ीकत बनना अभी बाक़ी है
और करना है इस के लिये बडाकाम
उपर वाला है हमेश ही
हमारी खुशियाँ चाहने वाला
और हमे राह दिखाने वाला
उसने रात बनाई हम देखे ख्वाब
और फिर हमको दिया दिन
पूरा कर लो अपना हर ख्वाब ...

--- अमित ०५/05/०५



काश ...

काश :
काश: , तू जान पाती
मेरी इस बेकरारी का आलम
समझ पाती मेरे दिल का हाल
तो जान पाती , कैसे तडपाती है
मुझको तुझसे एक पल की भी दूरी
दीवानों सा हाल रहता है जब तक ना पडे
कानो में मीठी आवाज़ तेरी
मिलती है जब तेरी नज़रों से नज़रे मेरी
उठती है एक प्यार की लहर दिल मे मेरी
सच बड़ी चोर हो तुम
जानती नही हो तुम
क्या कये किया है तुमने चोरी
मेरा चैन गया
मेरा दिल गया
और तो और
नींदे तक चुरा ली तुमने मेरी
अब तो इन्तहा है हो गई
मेरी बेकरारी की ,मेरी दीवानगी की
है तुम से गुज़ारिश मेरी
आ मेरे करीब
रख दिल पर हाथ मेरे
और कर दे ख़त्म ये बेकरारी मेरी ...
--- अमित १८/०६/०५

गर्म चांदनी ...

आज जो हो रहा, ऐसा पहले तो ना हुआ
आज चांदनी रात है,
और ना जाने क्यों चांदनी जला रही मुझे,
ठण्डी हवा बह रही
और लू की मानिंद झुलसा रही मुझे ,
दिल पर मेरे बेचैनी है छाई
और इन आंखों को जैसे
नींद से दोस्ती बिल्कुल ना भायी,
ना जाने क्यों आज
चांदनी झुलसा रही मुझे,
शायद , ये तेरी यादें हैं
जो रह रह कर तडपा रही मुझे,
चांद में दिखता तेरा चेहरा
दूर से ही खिजा रहा मुझे,
तुझे क्या पता , क्या क्या इस दिल पर बीती है,
तेरी जुदाई में
घड़ियाँ भी सदियों में बीती है,
कहॉ है,
क्यों है तू दूर मुझसे ,
चली आ पास मेरे
काटे नही कटती तनहा
अब ज़िन्दगी मुझसे ...
--- अमित २६/०६/०५

Wednesday, June 13, 2007

आज ...

रोज़ मेरा आज आता मेरे सामने
और करता सवाल मुझसे ,
किया क्या आज ऐसा तूने
कह सके तू जिसे सार्थक
और जिस के लिये मिला तुझे मानव जन्म,
और मैं पड़ जाता सोच में
जुटाता दिन भर का ब्यौरा
और करता मुल्यांकन उनका ,
तब लगता
दिन यों ही व्यर्थ गया ,
किया नही आज कुछ ऐसा
जिसके लिये मिल यह जन्म ,
हमेशा लगता मुझे
और अच्छा कर सकता था मैं,
फिर क्यों ना कर सका ऐसा मैं
कदाचित यह मेरे आलस्य था
जिस में मैं जकडा था
और स्वतंत्र होने का प्रयास भी ना किया,
तब समय /आज देता साहस और कहता
सो गया है तेरे अन्दर का विश्वास
जगा इस विश्वास को और जुट जी जान से
फिर देखना वो ही होगा जो तू चाहेगा
तेरा मार्ग स्वम तेरे कदमो तले आजायेगा ...
--- अमित २८/०४/०५

नज़रिया ...

देखिए साहब
नज़रिया, है यह
साबका अपना-अपना होता है,
जो हमको पसंद आया
वो एक आंख ना उनको भाता है,
जिद्द होती है साथ चले
और बाहर निकले तो
हर दम रूठना मनाना होता है,
यह रूठना मनाना कुछ और नही
करीब आने का बहाना होता है,
वैसे भी
इस रूठने मनाने का मज़ा
कहीँ और कहॉ आना होता है,
कितना भी रूठे ; कितना भी झगडे
शाम का खाना साथ ही होना होता है,
जब देखे इस को ज़माना
तो वो भी बस कहता है
बस इसी का नाम "याराना" होता है ...
--- अमित १३/०६/०७

इतना टूटा हुआ हूँ ...

अभी टूट कर बिखरने वाला था
कि आया कोई जिन्दगी में और
दिया मुझे अपना सहारा
और थामा मुझे अपनी बाहों में,
मुझको भी लगा जैसे मिल गया कोई अपना
जो ना देगा मुझे बिखरने ,
मगर ना जाने क्यों
"किसी को" मेरी खुशियाँ बर्दाश्त नही
और फिर आगए
एक ख़ुशी के बदले हज़ार ग़म मुझको तडपाने,
अभी तो मैं संभला ही था और
मेरा सहारा ही मुझे छोड़ गया,
पूछता हूँ मैं उससे इक सवाल
क्यों करता है "वो" ऐसा मेरे साथ,
कब मैंने उस से कोई दुआ मांगी थी
या कोई शिकवा किया था,
फिर क्यों भेजा उसने ऐसा रहनुमा
जिस ने मरहम रख फिर ज़ख्मो को हरा किया,
मुझे बिखरना मंज़ूर है
एक बार ही सब गमो को गले लगाना मंज़ूर है ,
मगर मैं बर्दाश्त नही कर सकता
यों रोज़ रोज़
तिल तिल कर घुट घुट मरना,
अब मेरे यह हालात है
अब मैं इतना टूटा हुआ हूँ
कि कोई मुझे छुए भर
और मैं टूट कर बिखर जाऊं ...
--- अमित १६ /०५/०५

Sunday, June 10, 2007

कल्पना ...

सोचा है तुमने कभी
है सब से तेज़ रफ़्तार किसकी ,
कुछ और नही
बस मन की कल्पना है,
हैं सब से तेज़ रफ़्तार जिसकी,
कल्पनाए ही तो वो
जो बनाती हमे भार शून॒य
और करती सैर
अनंत आकाश की,
कभी कल्पना की उडान लेती
चांद की दिशा
और बनाती
खुशियों का वहाँ ये आशियाना
यह ही वो कल्पना है जो
तुम से दूर रहने पर भी
दूरियों को मिटती है
और तेरे करीब होने का
हर पल मुझको अहसास कराती है
ग़र यह कल्पना ना होती
तो शायरों की शायरी में यह बात ना होती
और जहान की खुबसुरती
ना यों ब-खूबी बयां होती
चाहता हूँ मैं तो बस
कल्पनाओं पर सवार रहना
यह ही तो है वोह
जो कराती है हर सपना पूरा...
--- अमित ०५/०४/०५

क्या हुआ मेरे साथ ...

बाद अर्से के फिर मैं बैठा
लेकर कलम हाथ में
चाहा कि लिखू आज कुछ मैं,
मगर ना जाने कलम क्यों चलती नही
मेरे शब्द बनते नही
और मन साथ देता नही,
ऐसा पहले तो कभी ना हुआ
मैं कलम लेकर बैठा और कुछ ना बना
अचानक आज ये क्या हुआ
क्यों मन ने कलम का दामन छौड दिया ,
वषों का साथ पल में कैसे छूट गया
टूटी दिल के उमंगें
और कलम हाथ से छूट गया,
मेरी शायरी मेरे काम ना आई
धरी रह गई कागज़, कलम, रोशनाई ,
ऐसा तो बस पहली बार हुआ
मेरी जिन्दगी में जब से तू आई
मेरी शक्सियत पर है बस तू छाई,
तेरी महोबत का है यह इनाम
दुनिया ने दिया है मजनू का नाम,
इतना होने पर भी हिम्मत ना हमने हारी है
आज हारे तो क्या हुआ , आखरी जीत हमारी है,
तुझसे वादा है मेरा जो निभाऊंगा
इक दिन तेरे रुप पर एक मुकमल ग़ज़ल बनाऊँगा ...


--- अमित २७/०३/०५

तेरा रुप ...

चाहा बहुत कभी लिंखू
तेरे रुप पर मैं
कि मगर जितनी भी कोशिशे
और उल्हज़्ता ही गया मैं,
कभी लगती मुझको दूर बड़ी
फिर लगता जैसे मेरे पास खडी
कभी लगता तुम हो ऐसी
फिर लगता तुम हो वैसी
कभी लगती परी सी
तो कभी अप्सरा सी,
और क्यों ना हो ऐसा
दुनिया में तेरे रुप का सानी कोई नही
और मेरा यह कहना
कोई बेमानी नही,
तेरा एक एक अंग
खुदा ने जैसे अपने हाथ से बनाया
जिसे देख, चौहदवीं का चांद भी शरमाया
तेरी एक भी मिसाल मुझसे ना बन पडी
और मैंने जाना , यह काम है मुश्किल बड़ी,
ज़ुल्फ़ों को तेरी क्या कहे, काले नाग भी इन से पीछे रहे
क्या तेरी भौंहो को कहे , कमान से भी आगे जो रहे
ये तेरे होंठ , ये दो गुलाबी कमल है
ये दो पंखुरियां, खुद मुकम्मल ग़ज़ल है,
दिल की खुबसुरती भी तुने पाई
मन में तेरे चंदन कि शीतलता
और बदन में हिरनी की चंचलता
सूरज की सी आभा तेरे चहरे में आई
नादान बालक की सी मुस्कान भी तुने पाई,
कोई मुझे बतलाए
करु क्या मैं जा कर मैखाना
उसकी दो आँखें खुद ही है पैमाना
जाम जो इन आंखों के पिए
ज़न्नत में वो जिए ,
तुझे तो पता है , किस कि मैंने आस लगाई
यह प्यार की जौंत सिर्फ तेरे लिये जगाई
मुझे तू ही बता, अब तेरे बिन कैसे जिए ...


--- अमित २९/०३/०५

Saturday, June 9, 2007

जब भी याद आया ...

जब भी याद आया,
बस वोही याद आया.
मिले थे जब तुम से हम,
वोही लम्हा, वोही मंज़र याद आया.
वो दो अजनबी आंखों का,
टकराना याद आया.
शर्मा कर उनका झुकना,
फिर देखने कि हसरत से;
वो उनका उठना याद आया.
सीने में बेताब धड़कता दिल
और दिल मे उभरते,
ज़ज्बातों का सैलाब याद आया.
दिल मे होती उस मीठी गुदगुदी,
का एहसास याद आया.
रह रह कर तेरे लबों पर,
धीमी से मुस्कान का आना याद आया.
जो कभी ना कही गई लफ़्ज़ों से,
आंखों से उन बातों का कहा जाना याद आया,
माँग ले खुदा से दुआ में बस तुम को,
मेरे दिल में तब हर येही ख़याल आया.
तुमे हो ना हो; हमे तो
पहली मुलाक़ात का हर लम्हा लम्हा रोज याद आया ...
--- अमित

गुस्ताखी...

खतावार हैं तुम्हरी
यह गुस्ताख निगाहें मेरी,
देखती हैं यह चोरी चोरी
हर एक अदा तेरी
तेरे रुप की करना चोरी
यह ही तो आदत है , इन निगाहो कि मेरी
मगर कसूर , इनका भी कुछ नही
सूरत ही इतनी प्यारी है तेरी
कहना तो चाहता हू में बहुत कुछ
पर सहारा ही नही देती
यह बेबस जुबान मेरी
गुस्ताखी बस इतनी ही है
इन निगाहो कि मेरी
कहना चहाती यह तुझसे
वोह सुब कुछ
जो कह ना सकी तुझसे
जुबान मेरी
अब पेशी तो तेरे दरबार में है मेरी
देखना है, होती है क्या मुझ पर
नज़रें करम तेरी
यकीन है मुझको
हो ना हो, तुझे भी कुबूल है
यह गुस्ताखी मेरी...

--- अमित २१/०४/०५

Wednesday, June 6, 2007

फिर आई उसकी याद ...

बाद अर्से के
फिर आई उसकी याद,
बता रही है आँखें मेरी
कहानी बीती रात की,
अभी तो हमने मिलन के
सपने संजोए भी ना थे ,
चिर निन्द्रा सी आंखों मे
आ बसी ये जालिम यादें,
चाहा तो दोनो ने ही दिल से था
इकरार भी दिलों का दिल से था,
किये थे सजदे खुदा के भी
माँगा भी दुआओं में दिल से था,
ना जाने क्यों खुदा को
हमारी मोह्बत ना रास आई,
और उसने जुदाई
हमारी तकदीर बनाई,
छिना तेरा दामन उसने मेरे हाथ से
और किये हमेशा को जुदा तेरे मेरे रास्ते ,
और दे दी तद्पाने को
वोह प्यार भरी यादें ,
सूख चुके थे अब तो सारे आंशु
और थक चुकी थी मेरी आँखें ,
दफ़न हो गए थे सारे अरमान
अधूरी रह गई सारी खवाहिशे
और रूठ गई थी मुझसे सारी खुशियाँ
तेरे जुदा होने से ,
फिर भी ना जाने क्यों
आज फिर आई तेरी याद,
मैं तो आज फिर दुआ को हाथ उठाता हूँ
खुदा से और कुछ नही
सिर्फ तेरी खुशियाँ माँगता हूँ ...


--- अमित २०/०३/०५

Tuesday, June 5, 2007

तुम सा हसीं ...

दुनिया में मुझसा खुशनसीब और नही
क्यों ना हो मुझे इस का गुमान,
दिलबर तो सबके हैं
तुमसा हसीं कोई नही
तुम से अदा , तुम सी शोखी
और किसी में कहीँ नही,
सच तो यह है दुनिया में
तेरा सानी कोई नही,
जनता हूँ
रंज करते है ये सारे हसीं
तुझ सी मासूमी जो इन में नही
हर दम जलता है इनका सीना
क्योंकि तुम हो
हुस्न का इक तराशा नगीना,
संकडौ दिल वाले फिरते हैं दिल को थामे
चाह हर इक कि ; अपनी भी किस्मत आज्माले,
हम से वोह खुशनसीब कहॉ
जिन पर यह इनाय्ते करम होती,
अपना हो जिन्दगी का खवाब पूरा हुआ
दुनिया का सब से हसीं
जिन्दगी का रहबर हमारी हुआ ...


--- अमित १६/०३/०५

यह दिल ...

लाख समझाया इसको
पागल फिर भी माने ना,
लाख मनाया इसको
यह दिल फिर भी माने ना,
तेरे लिये यह बेताब बड़ा
क्यों यह बेताबी तू पहचाने ना,
तुझको यह चाहे कितना
खुद भी यह जाने ना,
करता तुझ को इशारे
क्यों यह इशारे तू पहचाने ना,
कये छिपा हर इशारे में
इतना भी क्या तू जाने ना,
धड़कता है बस तेरे लिये
बात कोई यह जाने ना,
पाना यह बस तुम को चाहे
क्यों बात तू इस कि मने ना,
यह बेज़ुबान बेबस बड़ा
बेबसी इसकी क्यों तू माने ना,
धड़कन कहीँ इस की रूक जाये ना
इस से पहले तू इस को अपना लेना ...
--- अमित १२/०१/०५

बरसात ...




जब भी होती वर्षा
धुल जाता सब कुछ
और
आ जाती नई चमक
लगता सब कुछ सुंदर
लगता सब कुछ
अच्छा
क्यों ना हुआ फिर मेरा साथ

मेरे आशुँओं कि बरसात से

क्यों ना हुआ मन उसका हल्का

क्यों ना धुला बैर उसके मन का


--- अमित ०५/०६/०७







Sunday, June 3, 2007

सफाई ...

पहले सोचा
जाकर उसको बोल दूं,
फिर ख्याल आया
कहीँ वो समझे
मैंने सफाई दी,
सच ही तो था
मेरे जीवन कि किताब
उसने इतनी पास रखी
कि , उसकी लिखाई उसको दिखाई ना दीं ....


--- अमित ०३/०६/०७

जानँ हमारी ...

आज फिर हुए बे-आबरू
आज फिर हुए रुसवा
फिर टूटा दिल और
आँखें हुई नम,
कौन समझेगा दिल कि बातें
ज़ुबां जब उनको समझ ना आई ,
भरोसा क्या करे
किस का करे यकीन ,
वो जो थे दिल के मेहमान
वोह ही जब निकले रकीब,
निकले थे ऐसे उनके कुचे से हम
निकलता है जैसे जनाज़ा कोई,
जानँ है वो हमारी
और जान से भी जयादा
प्यारी है हमे "जानँ" हमारी ,
जाकर कह दे कोई
दे दी होती जान इस रुसवाई पर
डर था मगर
रह जायेगी अकेली
जालिम इस ज़माने में "जानँ" हमारी...
--- अमित १७/०१/०७

Thursday, May 31, 2007

वोह आँखें ...




प्यारी थी मगर ,
बहुत सहमी थी वोह आँखें ,
ज़ुबां सिली थी मगर
बहुत कुछ बोलती थी वोह आँखें,
साफ झलक पड़ता था
दर्द सीने का, उन आंखों में
बेबसी तो जैसे ,
ठहर गई थी उस चहरे
और आस के एक हलकी सी किरण
की तालाश में
पथरा चुकी थी वोह आँखें ,
अफ़सोस
दूर तलक दो हाथ भी ना थे
जो देते सहारा उसे ,
आख़िर हुआ वही जो होना था,
छीन गया था उससे
बचपन उसका ,
अब कुछ और नही था
वह नन्हा मासूम
दुनिया के हाथों का बस एक खेलौना था

--- अमित २१/०४/०५