Wednesday, January 13, 2010

दोस्तों कि शिकायत (^_^)...

कहते हैं यार हमारे
सो गया हैं कवी अन्दर का हमारे
हुआ अब अरसा
निकली न कोई कविता
कलम से हमारे
केसे हम समझाएं
कवी कभी सोता नही
हो अगर बंद आंखे
ख्यालो में अपने होता
ध्यान उसका चारो और लगा होता
जेसे ही मिलता
कुछ अनोखा, दिल को जो छूता
दे उसको अपनी कलपना का रंग
कवी अपने शब्दों में पिरोता
देखो, दोस्तों कि शिकायत
दिल को अपने " भा " गयी
और ले कविता का रूप
सामने आपके आ गयी
धन्यवाद्

२०१२- नए युग...

नया युग आने को हैं,
चिन्ह देते हैं, आज दिखाई
आकर्टिक और हिमालय से पिघलती बर्फ,
देती हैं इसकी गवाही...
आने को हैं, नया
युग चिन्ह देते हैं आज दिखाई
धरती का सीना चीर,
जो कल भूकम्प आया था
संदेशा वह यही लेकर आया था
आने को हैं नया युग
चिन्ह देते हैं आज दिखाई
रेगिस्तान में आती ,
बाढ़ और पड़ती बर्फ पचास साल बाद
हमको अब चेताती हैं ...
संभल इन्सान
आने को हैं नया युग
चिन्ह देते हैं आज दिखाई,
ऊँची लहरे सुनामी कि
दिखाती अपना विकराल स्वरुप
देख के उसकी शक्ति अपार
बोना लगा आज इन्सान
इतनी गलतिया कर चूका इंसान
कि अब संभल पाना है कठिन ...
नए युग कि अब पूरी तैयारी है
देखना बस येँ है, कि...
किस कि बारी है
हम करेंगे इसका स्वागत
या पड़ना है येँ हमारे बच्चो पे भारी ...
--- अमित 0१/०१/२०१०

Friday, December 25, 2009

इश्तिहार बोर्ड...

बात हैं गये रविवार की

शाम ढले बैठे थे बाग़ में

किनारे की दूकान पर

आकर गाड़ी एक बड़ी रुकी

आदमी उससे उतरे दो

निकाल एक सीढ़ी

झट छत पर जा पहुंचे वो

हरकते कुछ संदिघ न थी

कौतुहल वश निगाह उन पर टिकी

सामने था उनके एक "इश्तिहार बोर्ड"

संभाला उन्होंने तब अपना समान

यकीन जानिये

पांच ही मिन्टो में ख़तम किया अपना काम

सामने था अब हमारे, ६*१० का नया इश्तिहार

दो दिन गये फिर निगाह फिर उस पर गई

देखा, जो था दाढ़ी बनाता आदमी

शरबत पी इठलाती लड़की बनी

दिखा उसे जब आज सुबह , चौक कर आँखें खुली

पाया आज फिर एक नया इश्तिहार

"यह जगह खाली हैं , आप दें अपना इश्तिहार" !!!

(सच्ची घटना पर आधारित )

--- अमित २०/१२/2009

मुद्दे ...

दुनिया घिरी हैं आज मुद्दों से

हल किसी से न एक होता !

सोचो अगर मेज से हट

फैसला इनका खुले मैदान होता !

कश्मीर का मुद्दा क्रिकेट से अगर तय होता

"शारजहाँ " में तो "पाक" कश्मीर हम से ले गया होता !

और रंगभेद को ले कोई सिडनी गया होता

"पोंटिंग भैया " ने तो आस्ट्रेलिया को क्लीन चिट दिला दिया होता !

आतंकवाद अगर "वहाईट हाउस" छोड़ "अफगानिस्तान" में हल होता

कौन जाने आज "ओबामा" नहीं "ओसामा" विश्व नेता होता !

परमाणु अप्रसार को अगर "लालू " को सौपा होता

सारा "युरेनियम" उसकी भैंसों ने पचा दिया होता !

सोचो बेमानी , घूसखोरी , भर्ष्टाचार का कॉम्पटीशन होता

धन्यवाद हमारे नेताओं को ,

स्वर्ण , रजत और कांस्य सब इन्होने "भारत" के नाम करा दिया होता ...

--- अमित ३/१२/२००९

गलत-फ़हमी...

गलत तो नहीं था वो
और शायद मैं भी नहीं
या कहूँ कि कोई नहीं
गलत तो हालात थे
और उनका अंजाम
"गलत-फ़हमी"...
येँ कब आ गई
उन दोनों के बीच
और दिखाया अपना रंग
पता ही नहीं चला ...
जिस्म में जान से थे दोनों
और यों जुदा हुए
जैसे कभी मिले ही न हो दोनों ...
हालात ने इस कदर तोडा हम को
सोच सके हम कुछ और
ऐसा भी न छोड़ा हम को...
जिन्दगी के उस दोराहे पर
जुदा हुए हमारे रास्ते
दूर ... बहुत दूर
जब जिन्दगी आज मुझे ले आई
जाने क्यों "तेरा" ख्याल आया ...
--- अमित २६ /२/२००९

कहानी एक शब्द की...

सुनाते हैं कहानी एक शब्द की
शब्द येँ देखिये बड़ा हैं भारी
और विचित्र बात येँ , नाम इसका "आभारी"
व्याकरण हमारी हैं कहती
गर जो जोड़ा "अ" उल्टा होता अर्थ
नाम को देखो हुआ "अनाम"
और मानुष बन गया "अमानुष"
कहानी इस शब्द की हैं जरा उलटी
होते अगर आप किसी के "आभारी"
इंसान वो पड़ता आप पर भारी
आभार व्यक्त करना तो क्रतज्ञता हैं
अर्थ को इसके न समझना क्रत्घनता हैं
आज मगर क्रतज्ञता, क्रत्घनता से हारी हैं
और हराने वालो का जग "आभारी " हैं ...
--- अमित २/१२/२००९

Wednesday, October 21, 2009

एक घटना ...

इसे साहस कहे या दुस्साहस

आधुनिकता कहे या बे-शर्मी ,

फैसला आप पैर छोड़ता हूँ

देखा जो इन आँखों से

किस्सा आप से वो कहता हूँ

करता था एक बस स्टेशन पर

श्री-मति जी का मैं इंतज़ार

माहौल बडा ही नीरस था

और बढती चहल कदमी से

खोता जा रहा धीरज था

निगाह हमारी आवारा पंछी सी

कहाँ एक जगह ठहरती हैं

इधर उधर घूम

साथ लगी बेंच पर पड़ी

अभी तक थी जो सुस्ती

वो अब अचरज बनी

बैठा बेंच परएक प्रेमी युगल था

फूटती दोनों से बडी प्रेम उमंग थी

गुजरने के लिए बीच

हवा को भी जगह तंग थी

देख कर उनके हाथों कि शरारत

हमको होती जा रही थी हरारत

जिस तरह वो थे एक दूजे में गम

देख कर उनको होते थे होश अपने गुम

उनकी देख येँ हरकत दिमाग अपना चल गई

जो देखी घटना, वो कविता बन सामने आ गई ...

--- अमित २२/११/०९

Wednesday, August 26, 2009

ऐसा बस यहीं होता...

देखा हमने एक नज़ारा
महाशय एक गरिया रहे थे
हाथ जोड़ थानेदार साहब
बस मिमिया रहे थे
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे
ऐसा बस यहीं होता ।
कर जमा शेरो की फौज़
मुट्ठी भर गिदडो से घबरा रहे
ऐसा बस यहीं होता ।
छोटी ' इ ' की मात्रा
उलटी नही सीधी लगती
हिन्दी के गुरुओ को
अंग्रेज़ी का छात्र
देता यह ज्ञान
ऐसा बस यहीं होता ।
छोड़ के अपने संगी साथी
दूर वेबसाइट पर
बनाता नए रिश्ते इन्सान
ऐसा बस यहीं होता ।
---अमित (२/०९/०९)

Saturday, August 22, 2009

चरित्र चर्चा...

बडे एक शापिंग मॉल के

महंगे एक कैफे में

कर रहीं थी वो चुहल !

चर्चा बड़ी ही ख़ास थी

शर्मा जी के बेटी

जो दिखी वर्मा जी के बेटे के साथ !

एक ने कहा, " देखा "पर " निकल आए है !"

दूजी कहाँ चुप रहने वाली थी

अरे आप को नही होगा पता

"सुबह से शाम गुजरती साथ है "

आज कल तो बच्चो का चलन ही खराब है !

चर्चा चलती गई और कालिख पुतती गई !

घनन -घनन तभी मैडम का फ़ोन घंनाया

हंस खिलखिला कर दो बातें हुई

थोडी देर में मिलने का समय ठहराया !

किया सहेली को विदा अपनी

और घर फ़ोन लगाया

बेटा , पापा को बोलना

मम्मा को अर्जंट मीटिंग का कॉल आया,

आते घर शाम को देर होगी जरा !

थोडी देर गये पापा का भी फ़ोन आया था

फंस गये है वो मीटिंग में ये फरमाया था ,

मम्मा, बेचारी को कहाँ था पता

पापा की मीटिंग है उसी सहेली के साथ

चरित्र चर्चा चल रही थी जिसके साथ ...

--- अमित २२/०८/०९

Sunday, August 9, 2009

फर्क कहाँ हुआ ???

उतारे जो उसने
कपड़े अपने तन से
मिटाने को भूख
अपने पेट की और
बेचा अपना शरीर
नाम हुआ "वेश्या"...
उतार कपड़े अपने
जब चलती
वो बल खाके
आगे एक कैमरे के
मिलती ख्याति
होता नाम...
सौपती जब खुद को
करने नया अनुभव वो
बस चंद रातो को
फिर मिलता नाम
"वेश्या" नहीं अब
सम्मानित स्त्री का स्थान ...
क्या अलग दोनों ने किया???
कमाल है
फर्क फिर भी हुआ यहाँ...
(रास्ट्रीय स्तर की एक महिला खिलाडी के धन और काम के आभाव में वेश्या वर्ती में आने पर ...)
--- अमित ०९/०८/०९

Sunday, May 3, 2009

कहाँ जाऊं मैं ...

दिल करता है

ज़ोर से चिल्लाऊं मैं

सामने है जो दिवार

उस से सर टकराऊं मैं

देखता हूँ जब आइना

करता है दिल कर दूँ चूर आइना मैं

घुटा है दम में इस चार दिवारी में

तोड़ के ये बंदिशें भाग जाऊं मैं

सभी तो यहाँ अपने ही है

इल्जाम किस के कत्ल का लूँ मैं

अपनों को कत्ल कर नही सकता मैं

हौसला नही कर लूँ ख़ुद -कुशी मैं

सोचता हूँ अब

जहाँ न ढूँढ सके कोई मुझे

जा कर ऐसी जगह खो जाऊं मैं ...

--- अमित ३ /०५/२००९

Wednesday, April 29, 2009

उस्तादों के उस्ताद...

करनी जो हो किसी की खिचाई
सबसे आगे नज़र हम आए
बात बे बात मारने में
महारत जो हमने पाई
बस एक बार भिड कोई हमसे जाए
समझो शामत उसकी आई
हुई न जब तक मान - मुनव्वल
किसी की न जान बची
दिन-ब-दिन बढता गुरुर जा रहा था
नाचीज़ अब हर कोई हमें नज़र आ रहा था
सोचता तो ऊंट भी है
नही है कोई उसका सानी
आता वो भी जब नीचे पहाड़ के
हो जाता गुरुर उसका भी पानी
हुआ हाल अपना भी उस ऊंट सा
हुआ जब सामना उस शख्स का
समझा जिसे बस धूल था
अपनी बातें, उलटी हम पर ही आती थी
जुबान अपनी आगे उसके खुल न पाती थी
नौसिखिये सी हालत अपनी नज़र आती थी
हम तो थे उस्ताद , मगर
मिल गये आज हमे " उस्तादों के उस्ताद "
सबक अच्छा हमको सिखाया
दूर रखो कला से गुरुर ,
ये गुरुर न कभी किसी के काम आया ...
--- अमित २९ /०४/०९

Sunday, April 19, 2009

जुगाड़ की कहानी ...

बचपन से सुना है एक शब्द हर मोड़ पर ...
नाम है उसका "जुगाड़ "
जो भी मिलता "जुगाड़ " का चर्चा करता ...
कैसे हुआ ये पैदा
इसकी भी अपनी कहानी है ,
जो पेश अपनी जुबानी है ...
हुई जब चाह एक बच्चे की,
किया गया "जुगाड़" के बेटा हो ...
हुआ बडा जब वो बच्चा,
किया "जुगाड़" स्कूल उसका अच्छा हो ...
बच्चे मास्टर जी के भी थे,
किया "जुगाड़" के कुछ टयूशन हो...
स्कूल , कालेज हुआ अब पुरा ,
लगा "जुगाड़" की डिग्रिया जमा ...
डिग्रिया तो आ गई अपने हाथ ,
किया "जुगाड़" नौकरी बाड़िया हो ...
"जुगाड़" सारे काम अपना कर गये ,
पटरी पर आ गई जीवन की गाड़ी ...
अब तो बच्चा जवान हो चला ,
दोहरानी है फ़िर यही कहानी ...
"जुगाड़" भी गज़ब है ,
देता "दो बूँद जिन्दगी की "...
चाहती है दुनिया ,
हमसे मिल जाए उनको भी ये "जुगाड़"...
जानते वो नही ,
चलते हम हिन्दुस्तानी लेकर नाम "जुगाड़"...
-- अमित १९ /०४/२००९

Tuesday, April 14, 2009

जलाई "जोत" ...

कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल में थी

अपने लिए तो सबको होती है

दुसरो के लिए , दिल में उसके थी ...

भीड़ से अलग रास्ता बनाना

काम येँ इतना आसान नही

आसानी से जो मिल जाए

वो मकाम , उसका मकाम नही ...

तैयारी अपनी भी पूरी थी

पता था ज़माना यों साथ न आएगा

ना जाने कब और कहाँ

यें ज़माना उंगली अपनी उठाएगा...

डर कोसो उसके कदमो से दूर था

पता था,

चाह है अगर रौशनी की

जलाना कुछ तो जरूर होगा ...

जले भी , तडपे भी ,

देख बदलते लोगो को

दिल दुखा भी ...

कदमो को पीछे हटा लेना

उसने कहाँ सीखा था

ऐसे लोग कहाँ मंजिल तक जाते है

मंजिल ख़ुद उनके क़दमों तक आती है ...

जीत आख़िर सच की ही होती है

उसकी दिखाई "जोत "

ज्वाला आज बनी जाती है ...

काम उसका हुआ पूरा

बारी अब हमारी है

जलाए यें जोत रखना

जिम्मेदारी अब हमारी है ...

( अपने गुरु जी को समर्पित )

--- अमित १४/०४/२००९

Monday, April 6, 2009

बे-शर्मी ...

सुनते है
शर्म आंखों में होती है
मतलब हुआ
ये सब के पास होती ...
फ़िर क्यों
हमेशा ये शर्म नही देती दिखाई
राम ने आँखें तो सब को दी ...
सम्भव है
वहां भी किसी ने दलाली खाई
किसी को दी ज्यादा
और कर दी किसी के साथ बे-वफाई ...
हमारे साथ भी कुछ यूँ ही हुआ
वफा हमारे हिस्से में और
उनको मिली बे-वफाई ...
बे-शर्मी के इनकी चर्चे आम है
और हम
अपनी शर्म से परेशान है ...
बाज ना आते अपनी हरकतों से यें
जब देखो
इधर - उधर टांग अपनी अडाते यें
और मुंह की खाने के बाद
शेखी और बघारते यें...
देख इनकी ये बे-शर्मी
तरस हम इन पर खाते है
ख़ुद हम शर्मा कर
दुसरे रस्ते हो जाते है ...
बे-शर्म ये भी कम नही
दिखाने कोई नया करतब
फिर यें पीछे पीछे चले आते है ...
--- अमित ६/०४/०९

Monday, March 30, 2009

कुर्सी और यें ...



कुर्सी,


इस शब्द में ही अजीब सा खिंचाव है


देखते ही अपनी और खिंच लेती है


और जाते ही आगोश में इसके


जैसे मिट ही जाता सारा दर्द...


तभी तो देखा है


जितना बुड्ढा होता कोई


उतनी है बडी कुर्सी लेता ...


पता नही ,


कुछ को ये कुर्सी रास क्यों नही आती


या कुर्सी को "कोई" पसंद नही आता


और लेती कुर्सी किसी को तडपाने का मज़ा ...


देखते ही इनको कुर्सी को सूझता मजाक


ऐसा ही कुछ होता इनके साथ


जब होते ये जनाब कुर्सी के पास


उग जाते जैसे कांटे कुर्सी में


जिन्हें देख भागते फिरते यें ...


दूर से यें देंखे तो फूलों सी लगती कुर्सी


और बैठते ही इनके


अंगारों सी दहकती कुर्सी ...


खींचती कभी चुम्बक की तरह


और बैठते ही इनके


बिजली का झटका दिखाती कुर्सी ...


गज़ब है ये कुर्सी


जाने क्यों इनको इतना तडपाती


है ये बैरन कुर्सी ...


--- अमित ३० /०३ /२००९

Sunday, March 22, 2009

घुमने गये पार्क ...


कई दिन गये ,

आज फ़िर गये हम

घुमने वही "पार्क"...

छोटे छोटे पेड़ों

फूलों की कियारियों

और सुंदर फ़वारे से सजा ,

बडा सुन्दर लगता वो "पार्क"...

आज तो दर्शय था बहुत प्यारा

छोटे छोटे , नन्हे - मुन्नों से भरा था वो "पार्क"...

इधर देखा वो छोटा बच्चा

छोटे छोटे कदमो से भागा जाता था

भाग रही थी माँ उसके पीछे

हाथ मगर कहाँ वो उसके आता था ...

एक कूदता पानी में फ़वारे के

दूसरा देखा उसे घबराता

और जा अपनी माँ पास छुप जाता

मन फ़िर करता पानी में कूदे

क्या करे वो डर फ़िर जाता ...

वो देखा गेंद से बालक एक खेलता

मारता कभी पाँव से गेंद को

और कभी ख़ुद ही गिर जाता

हो खडा और ज़ोर लगा पाँव मारता ...

देख देख बच्चों के करतब
बडा मजा आता था

मन तो अपने बचपन में भागा जाता था

काश रोज़ ऐसी शाम आए

जो बचपन में मेरे मुझे ले जाए ...



--- अमित २२-०३-२००९




Monday, March 9, 2009

ठहराव...

ठहर सी गई है जिन्दगी;

अब कुछ ऐसा लगता है ...

आ कर एक दोराहे पर

कुछ सोच में पड़ गई है जिन्दगी

अब कुछ ऐसा लगता है ...

करने को तो है बहुत कुछ अभी

जाने जान हाथों से निकल गई हो

अब कुछ ऐसा लगता है ...

शयद सुबह करीब ही है

घना हुआ अँधेरा सा लगता है

मैं तो चाहता हूँ नींद से उठना

जाने क्यों शरीर थका सा लगता है ...

कुछ तो हो ऐसा अब

जो कर दे मुझे सागर सा चंचल

ये ठहराव अजीब सा लगता है अब ...

पता नही क्यों ...

पता नही क्या था वो
समय का बहाव
या;
मेरे दिल में
कुछ ज़ज्बात दबे थे
जो बह निकले शब्द बन कर
और नाम हुआ कविता
पता नही ...
आज भी , वही मैं हूँ
वही मेरा दिल
वही मेरी ज़ज्बात
गर नही है कोई तो
बस शब्द ,
पता नही क्यों ...

Friday, March 6, 2009

शांत रहो ...

हर गये दिन जुमला एक

कानो में हमारे पड़ता हैं

छोड़ा हमको नही जायेगा

हर हिसाब हम से

एक दिन लिया ज़रूर जाएगा ,

कह कर कोई

गुस्से से अकड़ता हैं ...

आदत से हम भी मजबूर हैं

गुस्से पर मुस्काते हैं

जले हुए दिल को ,थोड़ा और जलाते हैं ...

येँ जनाब भी , जरा हट के हैं

सोचते हो हैं , जाने क्या कर देंगे

पकड़ कर कान चाँद का

जमीन पर ला रख देंगे

और पकड़ कर दुम शेर की

बना दरबान ,

खडा दरवाजे पर कर दंगे ...

धाक जम मगर कहीं न पाती हैं

बनती - बनती बाजी इनकी , बिगड़ ही जाती हैं

पासे जाने पलट कैसे जाते हैं

होकर इनका , इन्हे ही चिडाते हैं ...

खिसाय्नी बिल्ली सी इनकी हालत रहती हैं

और दुम सदा टांगो में छिपी रहती हैं ...

पडे जब भी उस पर पैर हमारा

"शांत रहो - शांत रहो "

गूंजता हैं कानो में येँ नारा ...

--- अमित

आला रे आला ...

आला रे आला

SPICE-08 आला

सब टीमो ने अपना

परचम संभाला

आला रे आला
SPICE-08 आला

"सुखोई" जहाँ

ताकत में मदमस्त है ,

"पृथ्वी " भी वहां

सम्मान बनाये रखने की जुगत में व्यस्त है .

"अग्नि " और "भार्मोस"

दोनों तरफ़ से न कुछ आहट है

कमजोर न कोई इनको समझो

रणनीति के गुरुओं से भरपूर

दोनों टीमो की पुरी तैयारी है

देखना बस यह है

तरकश में तीर किस के कितने है

अब मैंदान में आने की बारी है ...

(SPICE : A sport event in Infosys for CCD Project...)

--- अमित

Thursday, October 9, 2008

सब से अलग है पहचान हमारी ...

पनपते है हजारो सपने

हमारी आंखों में

और करते है हम सर्जन

उन रास्तों का

हो जिन से सच हमारे सपने

दी गई जब भी कोई चुनौती

हमने हाथो हाथ लिया

दृढ़ निश्चय कर हम आगे बढे

आसान माना ये डगर नही

साहस, भी यहाँ कम नही

रख अपने मूल्यों को ऊँचा

हर चुनौती पर विजय हमने पाई

देख ये बढ़ता हुआ आत्म विस्वास हमारा

जुड़ता जा रहा है हमसे दुनिया का हर किनारा

और आगे ही बढता जा रहा है कारवां हमारा

सबसे आगे जाने की है पूरी तैयारी

समय से तेज है रफ़्तार हमारी

हाँ , सब से अलग है पहचान हमारी ...

--- अमित २८ /०९ /०८

Tuesday, July 29, 2008

संघर्ष...

प्रचार का ज़माना है
प्रयास चारो ओर पुर ज़ोर है
हमें भी प्रतिस्पर्धा में आना था
हम क्या किसी से कम है
बस यही सब को दिखाना था
नित नये प्रयास किये जाते थे
खेल हुआ या हुआ कुछ सहयोग
बढ़ चढ़ कर हमने भाग लिया
परिणाम चाहे कुछ रहा हो
हम हर ज़गह नज़र आए
दिनों दिन हम आगे बढ़ते जा रहे थे
और सब की नज़र में चढ़ते जा रहे थे
ज्ञान बाटने से बढ़ता है,
यही सोच ठान लिया ,
ज्ञान बाटकर, ज्ञान बढाने का काम
और दिया "संघर्ष" इस शुरुआत का नाम
देर ही सही
मगर महनेत रंग लाती है
"संघर्ष" को देखो,
नया सीखने की चहा साफ़ नज़र आती है ...
संघर्ष: It was a knowledge sharing event in Infosys by my team CCD...
--- अमित २९/०७/०८

Saturday, July 12, 2008

इतने तुम याद आओगे

चाहे जहाँ चाहो

चले तुम जाओ

कौन परवाह करता है

क्या तुम्हे लगता है

बस तुम से ही हम है

न होगे तुम तो

कहीं न हम होंगे

तुम्हे क्या पता

बस, अपने दम से है हम

याद न एक दिन आयगी

मजे में बसर जिन्दगी हो जायेगी

क्यों ये विश्वास

आज हमे धोखा दिए जाता है

रह रह साथ गुजारा

हर पल याद आता है

की जो तुम से बे-रुखियाँ

जला उनसे आज मन जाता है

याद तुम न आओगे

ये महज एक धोखा था

न पाकर तुम्हे करीब

दिल अपना रोता है

ये न सोचता था कभी

इतने तुम याद आओगे ...

--- अमित १२/०७/०८

Friday, July 11, 2008

आज़ादी ...

आज़ादी,
शब्द सुनते ही,
जोश की लहर दौड़ जाती
जोश तो जोश है
समय, बे-समय आ जाती
होश अगर इसमे खो जाए
यारो, शामत बडी आ जाती
हाल अपना भी कुछ ऐसा हुआ
श्रीमति जी जो मायके गई
१५ अगस्त सा हर दिन लगता
किस को अब पडी है
जो सुबह सुबह उठता
सुबह की सैर अब कहाँ होती है
९ बजे आँखे अब खुलती है
घर का काज कैसे, क्या होता है
नई आज़ादी में ख्याल कहाँ होता है
अखाडे में जा अब देही कौन तोडे
काम और करने को हमने रख छोडे
फल अब से कहाँ खाए जाते है
रोज पिज्जा - बर्गर मगाए जाते है
आख़िर, आज़ादी का जोश था
आगे क्या होगा किसे होश था
श्रीमती जी कब वापस आएँगी
जोश मैं ये भी भूल गये
गई शाम घर जब लौटे तो
देख श्रीमती जी को घर पर
हाथ से तोते छूट गये
देख हालत घर की और हमारी
वो गुर्राई जाती थी
सुनके दहाड़े उनकी,
जोश को भी धीरे धीरे होश आई जाती थी
हालत पर अपनी बडा तरस आता था
अब हमे ख्याल आता था
जब से हुई शादी, दूर हुई हम से आज़ादी ...
--- अमित ११/०७/08


Monday, June 30, 2008

हालात ...

देता है हर कोई
दुहाई, अपने हालातो की
अगर हालात हुए कुछ और होते
तो अपना ये मुकाम न होता
जहाँ आज गिनते हो तुम औरों को
वही कहीं अपना भी नाम होता
ऐसा नही के हम काबिल न थे
बस, बदले जमाने से वाकिफ नही थे
दावं - पेच इसके हमें समझ नही आते थे
और साथी हमारे आगे निकल जाते थे
सच्ची लगन मगर कहाँ छुप पाती है
रात कितनी भी घनी हो
सुबह से हार ही जाती है
तुम रहो साथ मेरे ,
करो मेरा विश्वास
और कोई नही , ख़ुद बदलूँगा
मैं अपने हालात
मैं करता नही वादा
कि तारे मैं तोड़ कर लाऊँगा
साथ रहो तुम मेरे
आकाश तक तुम को ले जाऊं मैं ...
--- अमित ३०/०६/०८

कहते है वो ...

कहते है वो

हम से भी हो परदा

तो क्या हुआ

जो हम है एक - दूजे के

शर्म तो हमारा गहना है

आप कुछ कहे

हमें तो परदा-नशीं ही रहना है

ना रहे परदे में तो

हया से आँखे झुक जाती है

हाथों में लगी हिना की लाली

रुखसारों पे आ जाती है

सर्द सा जिस्म होने लगता है

जान सी जैसे, निकली जाती है

आप तो बडे बे-शर्म है

शर्म आप को कहाँ आती है

मिलती है आप से नज़रे

और जान हमारी जाती है

हलकी सी एक छुहन

सिरहन एक जिस्म में दौड़ जाती है

अभी रहो जरा दूर ही हम से

महोबत की ये खुमारी

हम से न सही जाती है ...

---अमित ३०/०६/०८

Wednesday, May 14, 2008

नारी कहे ...

नारी कहे

क्यों बनू मैं सीता

तुम राम बनो या न बनो

मैं अग्नि परीक्षा में झोकी जाऊँगी

तुम तो फ़िर रहोगे महलो में

और मैं वनवास को जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं द्रोपदी

तुम धर्म-राज बनो या न बनो

मैं तो जुए में फ़िर हार दी जाऊँगी

तुम करोगे महाभारत सत्ता को

इसकी दोषी मैं रख दी जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं तारा

तुम हरिश्चंद बनो या न बनो

मैं तो नीच कहलादी जाऊँगी

मेरे बच्चे को मारोगे तुम

उसे जीवित कराने को मैं बुलाई जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं मीरा

तुम कान्हा बनो या न बनो

मेरी भक्ति तो फ़िर लज्जित की जायेगी

तुम को तो कुछ न होगा

और मैं विषपान को विवश की जाऊँगी

नारी कहे

क्यों बनू मैं अहिल्या

मैं तो फ़िर किसी इन्द्र के द्वारा छली जाऊँगी

और जीवन पत्थर बन राम की प्रतिक्षा में बिताओंगी

नारी कहे , कोई बताय

क्यों बनू मैं आदर्श नारी

क्या कोई आदर्श पुरूष मैं पाऊँगी ...

--- अमित १४/०५/०८

आई-टी २०५० में ...

दोपहर को जब साहिब-जादे उठे
कुछ उदास से लगे
यों तो दिन सूरज चढ़े ही होता है
मगर यदा कदा दोपहर को भी होता है
हाल जब पूछा, तो यों जबाब आया
डैड,
सिस्टम मेरा सारा डाउन है
बिहेव बडा इम्प्रोपर है
प्रोसेसिंग हो रही स्लो हैं
मेर्मोरी से सी-पी-यू को सिग्नल नही जाता है
डाऊनलोड कुछ हो नही पाता है
प्रोसेसिंग शुरू होते ही सिस्टम हंग हो जाता है
कल से हार्ड डिस्क मेरी ब्लंक है
कल गर्ल फ्रंद का ई-मेल आया था
प्रोपोसल का रिफियूज़ल उसमें पाया था
पिंग भी कर दिया उसने ब्लाक है
सी-पी-यू तब से देता बीप है
हुआ वायरस एटैक सा मेरा हाल है
साहिब-जादे की हालत हमे समझ आ गई
फॉर्मेट अपने सिस्टम को कर डालो
पढ़ई का उसमे ओ-एस डालो
फिर न हो कोई वायरस एटैक
इसलिए लगाओ स्पोर्ट्स का फायर वाल
झट सॉल्यूशन हमने दे डाला
२०५० का है अपना अंदाज़ निराला
आई-टी बनके रह गया जग सारा...
--- अमित १४/०५/०७

Saturday, April 26, 2008

भावनाए ...

दिखाई नही येँ देती हैं
समझा बस इनको जाता है
बाँधी नही येँ जाती हैं
बंधा इनसे बस जाता है
जुबाँ कुछ होती नही इनकी
इन्ही से इनको समझा जाता है
जात- पात, धर्म-मजहब
इनको कुछ पता नही
रिश्तों की कोई ज़ंजीर नही
सरहदों से कहाँ येँ थम पाती हैं
चीर सरहदों को
दूर दिलो तक जाती हैं
नही कुछ और येँ
भावनाए हैं,
जो हर दिल में पाई जाती हैं ...
--- अमित २६/०४/०८

Friday, April 25, 2008

सोच ...

अक्सर मैं कुछ लोगो की
बातो पर बस मुस्काता हूँ
देख कर उनकी सोच समझ
ख़ुद सोच में पड़ जाता हूँ
ये कर देंगे, वो कर देंगे
ये ग़लत है, ये नही होने देंगे
नारे वो सब लगाते है
काम नही कुछ और उन्हें
बस बातों की वो खाते है
और बातों में ही वो जीते है
आए जब मौका कुछ करने का
दूर नज़र न ये आते है
कहना तब इन का होता है
हमने तो बस सोचा था
सोच से कहाँ कुछ होता है
हम तो अकेले ही है
अकेले जन से क्या होता है
अब मूढ़ों को कौन बताए
सोच से ही सब होता है
एक अकेला सोच अपनी बदले
देख उसे दूजा फिर सोचे
देख बदलता फ़िर दूजे को
तीसरा को लगता वो भी सोचे
सोच में वो ताकत
जब बढ़ कर रूप अपना लेले
सिहासन ख़ुद हिलने लगता है
और स्मिर्धि का फूल
हर तरफ़ खिलने लगता है ....
( अपने गुरु जी को समर्पित )
--- अमित २५/०४/०७

Monday, April 7, 2008

काश करता कोई हमे भी प्यार...

हमारे दिल में बस
हसरते पनपती रहती है
वो कोई और ही है
खुदा की रहमत
जिन पर बरसती है
उनको देखना और
देख कर आहे भरना
जिन्दगी अपनी यों गुजरती है
कौन जाने किस के पहलु में
श्यामें उनकी गुजरती होंगी
हम तो बस सोचते भर है
काश ऐसा होता
हमारे लिए भी
राहे कोई तकता
काश ऐसा होता
रूठे हुए हम होते
और कोई हमारी मनुहार करता
नित कर नये नये श्रृंगार
हमे भी कोई रिझाता
और होते जब हम उदास
होता वो हर दम पास
करते उससे हम अपनी
भावनाओं का इजहार
और होते उसे भी
हमारी भावनाओं से इकरार
काश,
काश करता कोई हमे भी प्यार ...
--- अमित ०७/०४/०८

Wednesday, April 2, 2008

अप्रैल फूल...

अप्रैल का महीना करीब आ रहा था

कैसे लोगो को बेवकूफ बनाये

यही ख्याल जहन मेबार-बार आ रहा था

रोज नई तरकीबे बन जाती थी

इस में ये कमी है , उसमे वो कमी हैं

ये सोच छोड़ दी जाती थी

एक नया विचार तव आया

ऑफिस वालो को अप्रैल फूल बनाने का

प्लान तव हमने बनाया

एक तारीख को ऑफिस जा हम ने

इस्तीफा अपना दे डाला

होंटों पर मुस्कान लिए

ऑफिस में हम घूमते जाते थे

मेनेजर साब का क्या ज़बाब आएगा

इस इंतज़ार में समय बिताते थे

थोडी देर में उनका कॉल आया

खुशी खुशी हमने भी फ़ोन उठाया

दहाड़ने की आवाज उधर से आती थी

साहब ने फरमाया ,

इस्तीफा हम मंजूर करते हैं

तुम हम से मिलने आओ

इसी बीच एकाउण्ट डिसेबल हम करते हैं

ये सुन हम सकते में आ गए

देख अपना एकाउण्ट डिसेबल और घबरा गए

मेनेजर साब के आगे " सॉरी सर "

यही दो शब्द जबान से बोले जाते थे

देख हमे परेशान हाल

मंद मंद वो मुस्काते थे

एक बार वो फ़िर से गरजे

क्या सोचते थे, अप्रैल फूल हमे बनाओगे

ये सब हथकंडे हमी पर अजमाओगे

मेनेजर हम यों ही नही हैं, सभी का ख्याल रखते हैं

"अप्रैल फूल" अब तुमबन चुके

और मजाक भी बहुत कर चुके

जाओ जा कर काम करो

एकाउण्ट तुम्हारा अनेबल हम कर चुके

जान मे तव जान हमारी आई

सोचा न था व्यस्त मेनेजर ध्यान इतना दे पायेंगे

"अप्रैल फूल" का मजाक यो पकड़ पायेगे

कान हम अब पकड़ते हैं ,

ऐसा "अप्रैल फूल" न अब किसी को बनाएगे

सीमाये अपने अब न भुलायेगे ,

मजाक हैं , मजाक तक हैं इस्तमाल में लायेंगे ...

--- अमित ०२/०४/०८

Monday, March 24, 2008

बडा शिकार ...

बहुत हुआ छोटा छोटा शिकार
चलो मारे एक बडा हाथ अब
ये मान्यवर,
साधारण श्रेणी से दूर
प्राणियों में गिने जाते है
छोटों की तो बात करे क्या
बडे - बडे इन से घबराते है
नीचे जो है इनके
बेचारे बस मिमियाते है
और अधिकारी जी देख इनको
कोने से सरक जाते है
कब दफ्तर को आना है
कब दफ्तर से जाना है
अपने मन का सौदा है
जब मन में आए आना है
जब मन में आए आ जाना है
काम होता है किस चिडिया का नाम
ये सवाल बहुत ही पुराना है
सुविधाओं को कहाँ इन्हे बरतना होता है
कैसे हो उसका हनन
जोर सारा वहाँ लगा होता है
और उस पर कहना ये
जो भी हो अपना क्या कुछ जाता है
कहाँ से कितना पैसा आए
किसने कितना पैसा पाया
यही सोच सोच कर दिन जाता है
जैसी देह विकराल है
बुद्धि भी वैसी पाई है
अक्ल के पीछे हमेशा लाठी होती है
पर ना जाने
व्यापारी बुद्धि कहाँ से इतनी आई है
कब किस को किसे लडवा दिया
कब किस की पीठ में छुर्रा लगा दिया
पता लगा मुश्किल है
और काम जो ये कर गया
समझो इनकी तिकड़म से बच गया
दूर से ही इनको करो प्रणाम
बच के इनसे रहने का रास्ता सब से आसान ...
--- अमित २०/०३/०८

Tuesday, March 11, 2008

आई एक मेल ...

आज सुबह जब ऑफिस पहुंचे
देखा एक गुड मोर्निंग का मेल आया
यों तो , ये हमारे नये मित्र है
पर हमे अचरज ये हुआ
यकायक इन्हे हमारा ख्याल क्यों आया
उत्सुकतावश हमे मेल जा खोला
मेल देख हुई बड़ी हैरानी
कुछ कुशल क्षेम न पूछी थी
बस एक वेब साइट का लिंक आया था
हम ठहरे , थोड़े शौकीन
सोचा किसी कविता का पता बताया होगा
पहुंचे जब हम वेब साइट
देख उसे सर हमारा चकराया
पॉप -उप होते विज्ञापनों में
बस पैसा-पैसा-पैसा छाया था
ये कुछ और नही
मनी कंट्रोल का लिंक आया था
हमारे ये मित्र भी अजीब है
इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी के हो कर
शेयर बाज़ार के करीब है
बाज़ार की तेज़ी - मंदी
इनकी नब्ज़ में झलकती है
जब भी मिल जाओ इनसे
बस शेयर की की बात चलती है
ये भी हम से अनजान है
शेयर की भाषा न हमे आती है
कविता करना बस एक शौक है
ये तो इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी है
जिस से हमारी रोटी चल जाती है ...
--- अमित ११/०३/२००८

Friday, March 7, 2008

इन से भी मिलते है ...

चलिए साब
चलते-चलते आप से भी मिलते है
बाकी सब की तरह
आप की भी अपनी ढपली अपना राग है
मगर, आप का रिकार्ड जरा ख़राब है
बजता हमेशा बस एक ही राग है
यों तो शान्ति है इनको प्यारी
मगर तुनक मिजाजी ने की गड़बड़ सारी
बात जरा सी भी नाक पर आ जाती
और बेचारी नाक हर जगह अड़ जाती
नाक तो फिर नाक है
सारी दुनिया इसके आगे हारी है
फिर अखाडे का क्या
कहीं भी जम जाता है
खाने की मेज़ वो जगह है
जहाँ आप फुल फॉर्म में पाये जाते है
इसे कुछ ग़लत न समझे
यों तो सामान्य लोगो सा ही खाते है
मगर भावनाओं में बह
भीड़ पर जरा भड़क जाते है
उठाई अगर किसी ने एक ऊँगली
पांचो उँगलियों से ज़बाब आपने दिया
बात हुई जब भी अपने "देस" की
परचम "देस" का अपने उपर किया
चाहे हो सही , चाहे हो ग़लत
अपने को ही उपर किया ...
--- अमित ०७/०३/०८

Tuesday, March 4, 2008

ऐसे ही है ये ...

सुबह सुबह उठना
नहा-धो तैयार हो
खुली आँख से सपने बुनना
बस यही काम है इनका
ऑफिस में सबसे पहले
कम्युनिकेटर ही ओपन होता है
कल कहाँ बात खत्म हुई थी
दीमाग पर यह ज़ोर होता है इनका
और क्यों न हो
रोज नया पाठ जो शुरू करना होता है
सुबह सुबह इनके दर्शन होते है
दोपहर से शाम कहाँ गुजरी
कहाँ किसे पता होता है
शाम को जब ये लौटे
फिर कम्युनिकेटर का ही ख्याल होता है
कुछ इधर घूम , कुछ उधर घूम
रात को घर जब ये पहुंचे
फ़ोन बेचार कान पर लगा होता है
कहीं डाउन न हो जाए बैट्री
इसलिए फ़ोन चार्जर पर लगा होता है
इनके साथ जो जाग सके
इतना साहस हमसे कहाँ होता है
लाख इन्हे हम समझाये
लाख इन्हे हम धमकाए
जबान पर तव इनकी, ताला होता है
"कोई भी " नाम इनका पुकारे
नाम के आगे "मीठा" लगा होता है ...
--- अमित ०४/०३/२००८

Sunday, March 2, 2008

नबाबी ठाठ...

ठाठो में है लाखो ठाठ

शौको में है लाखो शौक

अदाओं में है लाखों अदा

देर से आने की अदा

सबसे जुदा है ये अदा

और हो भी क्यों न

नबाबी है इसका अंदाज़

और लगता जैसे

बढ़ गया अपना रुबाब

बोला दोस्तों को साथ चलेंगे

पहुंचे जब सब

देखा नवाब सोये पडे है

किया वादा की नाश्ता साथ करेंगे

और दिखाई रात को दिए

जब उन्होंने हमे कहा

बस १० मिनट रुको

हम रुके तो ज़रूर

और घड़ी के घूमते काटे गिने

करते कोशिश है बहुत

करे खिचाई औरो को

और हमेशा ही उलटी पड़ी

देख उनकी झेप

चढती सबको मस्ती बडी

प्यारे ये हम सभी के है

आदत से मगर सब घबराते है

चाहे सब करे कितनी भी मिन्नत

"नबाब साब" अपने समय से ही आते है ...

--- अमित २/०३/०८

Friday, February 29, 2008

मित्र हमारे ...

हमारे एक मित्र है
आदतों से जरा विचित्र है
जरा शौकीन से है इनके मिजाज़
और सब से अलग है इनका अंदाज़
अक्ल का झोला तो है इनके पास
पर एक गाँठ है उस पर लगा हुआ
खत्म उसके हो जाने से डरते है
इस लिए जरा संभल कर खरचते है
अमूमन हमारे साथ ही विचरते हैं
और अपनी खुराफातो से चर्चा में रहते है
कौन जाने हम से डरते है या बडा दिल रहते है
जो हर दम हमारी खिचाई चुपचाप सहते है
हिन्दी बोलने का शौक बहुत है
पर जबान दगा कर जाती है
जब भी देखो, बेचारी फिसल जाती है
शब्द भी उनसे मजाक करते है
आगे पीछे हो, दिमाग खराब करते है
श्रीमान कब श्रीमती में बदले
जनाब ख़ुद भूल जाते है
इधर - उधर का अंतर रोज हम बताते है
कृष्णा के ये परम भक्त है
और अनुकम्पा हनुमान की पाते है
लाख करे ये लीला, लाख करे ये कोशिश
गोपियों को जरा कम ही भाते है
ज्ञान इनका अपरम-पार है
गोपी ने नाम भर से ही सारा पता बताते है
समाचार पत्र भी इन्ही की दया का पात्र है
अरे एक बात तो हम भी भूल गए
दुसरे शौक और भी अजीब है
घड़ी घड़ी अपनी जुल्फों को बनाते है
आप बस फोटो का नाम ले
अनायस हाथ जुल्फों में उलझ जाते है
यो तो हिन्दी से नही ठीक इनका व्यवहार है
पर अतिशोक्ति अलंकार से इन्हे बडा प्यार है
इनके आगे जहाज भी घडे में डूब जाते हैं
और ये तैर कर किनारे आ जाते हैं
शौक तो आख़िर शौक ठहरे,
जाने कैसे कैसे हो जाते है
पर जनाब दिल से है "हीरे "
तभी तो है हर दिल में ठहरे...

Friday, February 22, 2008

किसे पता ???

एक दिन मिले दो अजनबी
पास ज़रूर थी
कुछ- कुछ जाने पहचानो की भीड़ लगी
चंद पलों का ये साथ था
जीवन पर्यंत साथ रहने का शुरुआत था
क्या चंद पल पर्याप्त थे
किसे पता ???
कुछ दिन मेहमानों का मजमा लगा
खुशियाँ मनी , जश्न चला
और दो लोगो ने डरते-डरते
ढेरों उमांगो संग नवजीवन में प्रवेश किया
क्या होगा उन अरमानों का
किसे पता ???
सब अच्छा हो तो दिल खुश होता
कुछ लगे बुरा तो दिल रोता
दोनों चाहाते बस खुश रहना
पर क्या है वो जिससे सब ठीक रहता
किसे पता ???
--- अमित २५/०२/२००८

Tuesday, February 19, 2008

जो है अधिकार मेरा !

क्यों मांगू मैं
भीख सा
जो है अधिकार मेरा !
क्यों स्विकारू मैं
दया सा
आत्म सम्मान है मेरा !
क्यों समझते हो
स्वं को
सबका सर्वेसर्वा !
मैं जन्मा नही
जन्मी हूँ मैं
तो कोई
अपराध नही है
एक मानव हूँ मैं
और अधिकार है मेरा
पाना एक मानव का सम्मान !
--- अमित १९/०२/२००८


Thursday, February 14, 2008

पहला वैलेंटाइन डे ...

श्रीमती जी, अभी कुछ दिन हुए
ससुराल छोड़ , हमारे साथ आई
एअरपोर्ट उन्हें लेने जा
हमने भी पत्नी भक्ति दिखाई
यहाँ आ उनको लगा
नई आज़ादी उन्होंने पाई
जो लगते थे कभी कट गए
वो "पर" वापस निकल आए
दो दिन आराम करवा
उनको नए शहर की सैर कराई
देख कर खूबसूरती शहर की
वो खूब ही ह्र्षाई,और हमसे बोली
अब आसानी से घर नही जाऊँगी
चाहे जैसे रखो,
चुप-चाप आप के साथ रह जाऊँगी
हम भी खुश थे ,
वैसे भी अभी कहाँ अपने "घर" जाना था
श्रीमती जी नित नई फरमाइश ना करे
बस अपना इतना ही चाहना था
श्री मानो के चाहने से क्या होता है
परचम तो श्री मतियों का लहरा होता है
इसका आभास हमे कल हुआ
जब श्री मति जी ने पास आ प्यार से कहा
अजी कल का क्या प्रोग्राम है
हमने भी जरा लाड दिखाया और कहा
आप जे ओ बोले , बन्दा तो आप का गुलाम है
उन्होंने तव फरमाया , ठीक है
पहले तो डिस्को चलेंगे और फ़िर
रात का खाना बाहर करेंगे
अभी तक तो हम ठीक थे
ये सुन जरा घबरा गए
कल को ऐसा क्या "ख़ास " है
ये सवाल कर, आफत में आ गए
इस परवो जरा गरमा गई और
शेरनी सी धाड़ कर सामने आ गई
शादी होते ही सब भूल गए
प्यार के शौक चार दिन में धुल गए
कल "वैलेंटाइन डे" है , वो भी पहला
हम साथ में मनायंगे ,
जहाँ दिल चहयेगा , वहाँ जायेंगे
आवाज़ के रुख से समय को हम भाप गए
हमतो मजाक कर रहे थे , कह बात ताल गए
समझ गए थे , "संत वैलेंटाइन" तो गए स्वर्ग सिधार
और हम श्री मानो को छोड़ गए ये खेर्चे का त्यौहार ...
---- अमित १४/०२/२००८