Wednesday, January 13, 2010
दोस्तों कि शिकायत (^_^)...
२०१२- नए युग...
Friday, December 25, 2009
इश्तिहार बोर्ड...
बात हैं गये रविवार की
शाम ढले बैठे थे बाग़ में
किनारे की दूकान पर
आकर गाड़ी एक बड़ी रुकी
आदमी उससे उतरे दो
निकाल एक सीढ़ी
झट छत पर जा पहुंचे वो
हरकते कुछ संदिघ न थी
कौतुहल वश निगाह उन पर टिकी
सामने था उनके एक "इश्तिहार बोर्ड"
संभाला उन्होंने तब अपना समान
यकीन जानिये
पांच ही मिन्टो में ख़तम किया अपना काम
सामने था अब हमारे, ६*१० का नया इश्तिहार
दो दिन गये फिर निगाह फिर उस पर गई
देखा, जो था दाढ़ी बनाता आदमी
शरबत पी इठलाती लड़की बनी
दिखा उसे जब आज सुबह , चौक कर आँखें खुली
पाया आज फिर एक नया इश्तिहार
"यह जगह खाली हैं , आप दें अपना इश्तिहार" !!!
(सच्ची घटना पर आधारित )
--- अमित २०/१२/2009
मुद्दे ...
दुनिया घिरी हैं आज मुद्दों से
हल किसी से न एक होता !
सोचो अगर मेज से हट
फैसला इनका खुले मैदान होता !
कश्मीर का मुद्दा क्रिकेट से अगर तय होता
"शारजहाँ " में तो "पाक" कश्मीर हम से ले गया होता !
और रंगभेद को ले कोई सिडनी गया होता
"पोंटिंग भैया " ने तो आस्ट्रेलिया को क्लीन चिट दिला दिया होता !
आतंकवाद अगर "वहाईट हाउस" छोड़ "अफगानिस्तान" में हल होता
कौन जाने आज "ओबामा" नहीं "ओसामा" विश्व नेता होता !
परमाणु अप्रसार को अगर "लालू " को सौपा होता
सारा "युरेनियम" उसकी भैंसों ने पचा दिया होता !
सोचो बेमानी , घूसखोरी , भर्ष्टाचार का कॉम्पटीशन होता
धन्यवाद हमारे नेताओं को ,
स्वर्ण , रजत और कांस्य सब इन्होने "भारत" के नाम करा दिया होता ...
--- अमित ३/१२/२००९
गलत-फ़हमी...
कहानी एक शब्द की...
Wednesday, October 21, 2009
एक घटना ...
इसे साहस कहे या दुस्साहस
आधुनिकता कहे या बे-शर्मी ,
फैसला आप पैर छोड़ता हूँ
देखा जो इन आँखों से
किस्सा आप से वो कहता हूँ
करता था एक बस स्टेशन पर
श्री-मति जी का मैं इंतज़ार
माहौल बडा ही नीरस था
और बढती चहल कदमी से
खोता जा रहा धीरज था
निगाह हमारी आवारा पंछी सी
कहाँ एक जगह ठहरती हैं
इधर उधर घूम
साथ लगी बेंच पर पड़ी
अभी तक थी जो सुस्ती
वो अब अचरज बनी
बैठा बेंच परएक प्रेमी युगल था
फूटती दोनों से बडी प्रेम उमंग थी
गुजरने के लिए बीच
हवा को भी जगह तंग थी
देख कर उनके हाथों कि शरारत
हमको होती जा रही थी हरारत
जिस तरह वो थे एक दूजे में गम
देख कर उनको होते थे होश अपने गुम
उनकी देख येँ हरकत दिमाग अपना चल गई
जो देखी घटना, वो कविता बन सामने आ गई ...
--- अमित २२/११/०९
Wednesday, August 26, 2009
ऐसा बस यहीं होता...
Saturday, August 22, 2009
चरित्र चर्चा...
बडे एक शापिंग मॉल के
महंगे एक कैफे में
कर रहीं थी वो चुहल !
चर्चा बड़ी ही ख़ास थी
शर्मा जी के बेटी
जो दिखी वर्मा जी के बेटे के साथ !
एक ने कहा, " देखा "पर " निकल आए है !"
दूजी कहाँ चुप रहने वाली थी
अरे आप को नही होगा पता
"सुबह से शाम गुजरती साथ है "
आज कल तो बच्चो का चलन ही खराब है !
चर्चा चलती गई और कालिख पुतती गई !
घनन -घनन तभी मैडम का फ़ोन घंनाया
हंस खिलखिला कर दो बातें हुई
थोडी देर में मिलने का समय ठहराया !
किया सहेली को विदा अपनी
और घर फ़ोन लगाया
बेटा , पापा को बोलना
मम्मा को अर्जंट मीटिंग का कॉल आया,
आते घर शाम को देर होगी जरा !
थोडी देर गये पापा का भी फ़ोन आया था
फंस गये है वो मीटिंग में ये फरमाया था ,
मम्मा, बेचारी को कहाँ था पता
पापा की मीटिंग है उसी सहेली के साथ
चरित्र चर्चा चल रही थी जिसके साथ ...
--- अमित २२/०८/०९
Sunday, August 9, 2009
फर्क कहाँ हुआ ???
Sunday, May 3, 2009
कहाँ जाऊं मैं ...
दिल करता है
ज़ोर से चिल्लाऊं मैं
सामने है जो दिवार
उस से सर टकराऊं मैं
देखता हूँ जब आइना
करता है दिल कर दूँ चूर आइना मैं
घुटा है दम में इस चार दिवारी में
तोड़ के ये बंदिशें भाग जाऊं मैं
सभी तो यहाँ अपने ही है
इल्जाम किस के कत्ल का लूँ मैं
अपनों को कत्ल कर नही सकता मैं
हौसला नही कर लूँ ख़ुद -कुशी मैं
सोचता हूँ अब
जहाँ न ढूँढ सके कोई मुझे
जा कर ऐसी जगह खो जाऊं मैं ...
--- अमित ३ /०५/२००९
Wednesday, April 29, 2009
उस्तादों के उस्ताद...
Sunday, April 19, 2009
जुगाड़ की कहानी ...
Tuesday, April 14, 2009
जलाई "जोत" ...
कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल में थी
अपने लिए तो सबको होती है
दुसरो के लिए , दिल में उसके थी ...
भीड़ से अलग रास्ता बनाना
काम येँ इतना आसान नही
आसानी से जो मिल जाए
वो मकाम , उसका मकाम नही ...
तैयारी अपनी भी पूरी थी
पता था ज़माना यों साथ न आएगा
ना जाने कब और कहाँ
यें ज़माना उंगली अपनी उठाएगा...
डर कोसो उसके कदमो से दूर था
पता था,
चाह है अगर रौशनी की
जलाना कुछ तो जरूर होगा ...
जले भी , तडपे भी ,
देख बदलते लोगो को
दिल दुखा भी ...
कदमो को पीछे हटा लेना
उसने कहाँ सीखा था
ऐसे लोग कहाँ मंजिल तक जाते है
मंजिल ख़ुद उनके क़दमों तक आती है ...
जीत आख़िर सच की ही होती है
उसकी दिखाई "जोत "
ज्वाला आज बनी जाती है ...
काम उसका हुआ पूरा
बारी अब हमारी है
जलाए यें जोत रखना
जिम्मेदारी अब हमारी है ...
( अपने गुरु जी को समर्पित )
--- अमित १४/०४/२००९
Monday, April 6, 2009
बे-शर्मी ...
Monday, March 30, 2009
कुर्सी और यें ...

कुर्सी,
इस शब्द में ही अजीब सा खिंचाव है
देखते ही अपनी और खिंच लेती है
और जाते ही आगोश में इसके
जैसे मिट ही जाता सारा दर्द...
तभी तो देखा है
जितना बुड्ढा होता कोई
उतनी है बडी कुर्सी लेता ...
पता नही ,
कुछ को ये कुर्सी रास क्यों नही आती
या कुर्सी को "कोई" पसंद नही आता
और लेती कुर्सी किसी को तडपाने का मज़ा ...
देखते ही इनको कुर्सी को सूझता मजाक
ऐसा ही कुछ होता इनके साथ
जब होते ये जनाब कुर्सी के पास
उग जाते जैसे कांटे कुर्सी में
जिन्हें देख भागते फिरते यें ...
दूर से यें देंखे तो फूलों सी लगती कुर्सी
और बैठते ही इनके
अंगारों सी दहकती कुर्सी ...
खींचती कभी चुम्बक की तरह
और बैठते ही इनके
बिजली का झटका दिखाती कुर्सी ...
गज़ब है ये कुर्सी
जाने क्यों इनको इतना तडपाती
है ये बैरन कुर्सी ...
--- अमित ३० /०३ /२००९
Sunday, March 22, 2009
घुमने गये पार्क ...

बडा मजा आता था
Monday, March 9, 2009
ठहराव...
ठहर सी गई है जिन्दगी;
अब कुछ ऐसा लगता है ...
आ कर एक दोराहे पर
कुछ सोच में पड़ गई है जिन्दगी
अब कुछ ऐसा लगता है ...
करने को तो है बहुत कुछ अभी
जाने जान हाथों से निकल गई हो
अब कुछ ऐसा लगता है ...
शयद सुबह करीब ही है
घना हुआ अँधेरा सा लगता है
मैं तो चाहता हूँ नींद से उठना
जाने क्यों शरीर थका सा लगता है ...
कुछ तो हो ऐसा अब
जो कर दे मुझे सागर सा चंचल
ये ठहराव अजीब सा लगता है अब ...
पता नही क्यों ...
Friday, March 6, 2009
शांत रहो ...
हर गये दिन जुमला एक
कानो में हमारे पड़ता हैं
छोड़ा हमको नही जायेगा
हर हिसाब हम से
एक दिन लिया ज़रूर जाएगा ,
कह कर कोई
गुस्से से अकड़ता हैं ...
आदत से हम भी मजबूर हैं
गुस्से पर मुस्काते हैं
जले हुए दिल को ,थोड़ा और जलाते हैं ...
येँ जनाब भी , जरा हट के हैं
सोचते हो हैं , जाने क्या कर देंगे
पकड़ कर कान चाँद का
जमीन पर ला रख देंगे
और पकड़ कर दुम शेर की
बना दरबान ,
खडा दरवाजे पर कर दंगे ...
धाक जम मगर कहीं न पाती हैं
बनती - बनती बाजी इनकी , बिगड़ ही जाती हैं
पासे जाने पलट कैसे जाते हैं
होकर इनका , इन्हे ही चिडाते हैं ...
खिसाय्नी बिल्ली सी इनकी हालत रहती हैं
और दुम सदा टांगो में छिपी रहती हैं ...
पडे जब भी उस पर पैर हमारा
"शांत रहो - शांत रहो "
गूंजता हैं कानो में येँ नारा ...
--- अमित
आला रे आला ...
आला रे आला
SPICE-08 आला
सब टीमो ने अपना
परचम संभाला
आला रे आला
SPICE-08 आला
"सुखोई" जहाँ
ताकत में मदमस्त है ,
"पृथ्वी " भी वहां
सम्मान बनाये रखने की जुगत में व्यस्त है .
"अग्नि " और "भार्मोस"
दोनों तरफ़ से न कुछ आहट है
कमजोर न कोई इनको समझो
रणनीति के गुरुओं से भरपूर
दोनों टीमो की पुरी तैयारी है
देखना बस यह है
तरकश में तीर किस के कितने है
अब मैंदान में आने की बारी है ...
(SPICE : A sport event in Infosys for CCD Project...)
--- अमित
Thursday, October 9, 2008
सब से अलग है पहचान हमारी ...
पनपते है हजारो सपने
हमारी आंखों में
और करते है हम सर्जन
उन रास्तों का
हो जिन से सच हमारे सपने
दी गई जब भी कोई चुनौती
हमने हाथो हाथ लिया
दृढ़ निश्चय कर हम आगे बढे
आसान माना ये डगर नही
साहस, भी यहाँ कम नही
रख अपने मूल्यों को ऊँचा
हर चुनौती पर विजय हमने पाई
देख ये बढ़ता हुआ आत्म विस्वास हमारा
जुड़ता जा रहा है हमसे दुनिया का हर किनारा
और आगे ही बढता जा रहा है कारवां हमारा
सबसे आगे जाने की है पूरी तैयारी
समय से तेज है रफ़्तार हमारी
हाँ , सब से अलग है पहचान हमारी ...
--- अमित २८ /०९ /०८
Tuesday, July 29, 2008
संघर्ष...
मगर महनेत रंग लाती है
Saturday, July 12, 2008
इतने तुम याद आओगे
चाहे जहाँ चाहो
चले तुम जाओ
कौन परवाह करता है
क्या तुम्हे लगता है
बस तुम से ही हम है
न होगे तुम तो
कहीं न हम होंगे
तुम्हे क्या पता
बस, अपने दम से है हम
याद न एक दिन आयगी
मजे में बसर जिन्दगी हो जायेगी
क्यों ये विश्वास
आज हमे धोखा दिए जाता है
रह रह साथ गुजारा
हर पल याद आता है
की जो तुम से बे-रुखियाँ
जला उनसे आज मन जाता है
याद तुम न आओगे
ये महज एक धोखा था
न पाकर तुम्हे करीब
दिल अपना रोता है
ये न सोचता था कभी
इतने तुम याद आओगे ...
--- अमित १२/०७/०८
Friday, July 11, 2008
आज़ादी ...
शब्द सुनते ही,
जोश की लहर दौड़ जाती
जोश तो जोश है
समय, बे-समय आ जाती
Monday, June 30, 2008
हालात ...
कहते है वो ...
कहते है वो
हम से भी हो परदा
तो क्या हुआ
जो हम है एक - दूजे के
शर्म तो हमारा गहना है
आप कुछ कहे
हमें तो परदा-नशीं ही रहना है
ना रहे परदे में तो
हया से आँखे झुक जाती है
हाथों में लगी हिना की लाली
रुखसारों पे आ जाती है
सर्द सा जिस्म होने लगता है
जान सी जैसे, निकली जाती है
आप तो बडे बे-शर्म है
शर्म आप को कहाँ आती है
मिलती है आप से नज़रे
और जान हमारी जाती है
हलकी सी एक छुहन
सिरहन एक जिस्म में दौड़ जाती है
अभी रहो जरा दूर ही हम से
महोबत की ये खुमारी
हम से न सही जाती है ...
---अमित ३०/०६/०८
Wednesday, May 14, 2008
नारी कहे ...
नारी कहे
क्यों बनू मैं सीता
तुम राम बनो या न बनो
मैं अग्नि परीक्षा में झोकी जाऊँगी
तुम तो फ़िर रहोगे महलो में
और मैं वनवास को जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं द्रोपदी
तुम धर्म-राज बनो या न बनो
मैं तो जुए में फ़िर हार दी जाऊँगी
तुम करोगे महाभारत सत्ता को
इसकी दोषी मैं रख दी जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं तारा
तुम हरिश्चंद बनो या न बनो
मैं तो नीच कहलादी जाऊँगी
मेरे बच्चे को मारोगे तुम
उसे जीवित कराने को मैं बुलाई जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं मीरा
तुम कान्हा बनो या न बनो
मेरी भक्ति तो फ़िर लज्जित की जायेगी
तुम को तो कुछ न होगा
और मैं विषपान को विवश की जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं अहिल्या
मैं तो फ़िर किसी इन्द्र के द्वारा छली जाऊँगी
और जीवन पत्थर बन राम की प्रतिक्षा में बिताओंगी
नारी कहे , कोई बताय
क्यों बनू मैं आदर्श नारी
क्या कोई आदर्श पुरूष मैं पाऊँगी ...
--- अमित १४/०५/०८
आई-टी २०५० में ...
Saturday, April 26, 2008
भावनाए ...
Friday, April 25, 2008
सोच ...
Monday, April 7, 2008
काश करता कोई हमे भी प्यार...
Wednesday, April 2, 2008
अप्रैल फूल...
अप्रैल का महीना करीब आ रहा था
कैसे लोगो को बेवकूफ बनाये
यही ख्याल जहन मेबार-बार आ रहा था
रोज नई तरकीबे बन जाती थी
इस में ये कमी है , उसमे वो कमी हैं
ये सोच छोड़ दी जाती थी
एक नया विचार तव आया
ऑफिस वालो को अप्रैल फूल बनाने का
प्लान तव हमने बनाया
एक तारीख को ऑफिस जा हम ने
इस्तीफा अपना दे डाला
होंटों पर मुस्कान लिए
ऑफिस में हम घूमते जाते थे
मेनेजर साब का क्या ज़बाब आएगा
इस इंतज़ार में समय बिताते थे
थोडी देर में उनका कॉल आया
खुशी खुशी हमने भी फ़ोन उठाया
दहाड़ने की आवाज उधर से आती थी
साहब ने फरमाया ,
इस्तीफा हम मंजूर करते हैं
तुम हम से मिलने आओ
इसी बीच एकाउण्ट डिसेबल हम करते हैं
ये सुन हम सकते में आ गए
देख अपना एकाउण्ट डिसेबल और घबरा गए
मेनेजर साब के आगे " सॉरी सर "
यही दो शब्द जबान से बोले जाते थे
देख हमे परेशान हाल
मंद मंद वो मुस्काते थे
एक बार वो फ़िर से गरजे
क्या सोचते थे, अप्रैल फूल हमे बनाओगे
ये सब हथकंडे हमी पर अजमाओगे
मेनेजर हम यों ही नही हैं, सभी का ख्याल रखते हैं
"अप्रैल फूल" अब तुमबन चुके
और मजाक भी बहुत कर चुके
जाओ जा कर काम करो
एकाउण्ट तुम्हारा अनेबल हम कर चुके
जान मे तव जान हमारी आई
सोचा न था व्यस्त मेनेजर ध्यान इतना दे पायेंगे
"अप्रैल फूल" का मजाक यो पकड़ पायेगे
कान हम अब पकड़ते हैं ,
ऐसा "अप्रैल फूल" न अब किसी को बनाएगे
सीमाये अपने अब न भुलायेगे ,
मजाक हैं , मजाक तक हैं इस्तमाल में लायेंगे ...
--- अमित ०२/०४/०८
Monday, March 24, 2008
बडा शिकार ...
Tuesday, March 11, 2008
आई एक मेल ...
Friday, March 7, 2008
इन से भी मिलते है ...
चलते-चलते आप से भी मिलते है
बाकी सब की तरह
आप की भी अपनी ढपली अपना राग है
मगर, आप का रिकार्ड जरा ख़राब है
बजता हमेशा बस एक ही राग है
यों तो शान्ति है इनको प्यारी
मगर तुनक मिजाजी ने की गड़बड़ सारी
बात जरा सी भी नाक पर आ जाती
और बेचारी नाक हर जगह अड़ जाती
नाक तो फिर नाक है
सारी दुनिया इसके आगे हारी है
Tuesday, March 4, 2008
ऐसे ही है ये ...
Sunday, March 2, 2008
नबाबी ठाठ...
ठाठो में है लाखो ठाठ
शौको में है लाखो शौक
अदाओं में है लाखों अदा
देर से आने की अदा
सबसे जुदा है ये अदा
और हो भी क्यों न
नबाबी है इसका अंदाज़
और लगता जैसे
बढ़ गया अपना रुबाब
बोला दोस्तों को साथ चलेंगे
पहुंचे जब सब
देखा नवाब सोये पडे है
किया वादा की नाश्ता साथ करेंगे
और दिखाई रात को दिए
जब उन्होंने हमे कहा
बस १० मिनट रुको
हम रुके तो ज़रूर
और घड़ी के घूमते काटे गिने
करते कोशिश है बहुत
करे खिचाई औरो को
और हमेशा ही उलटी पड़ी
देख उनकी झेप
चढती सबको मस्ती बडी
प्यारे ये हम सभी के है
आदत से मगर सब घबराते है
चाहे सब करे कितनी भी मिन्नत
"नबाब साब" अपने समय से ही आते है ...
--- अमित २/०३/०८
Friday, February 29, 2008
मित्र हमारे ...
घड़ी घड़ी अपनी जुल्फों को बनाते है
आप बस फोटो का नाम ले
अनायस हाथ जुल्फों में उलझ जाते है
Friday, February 22, 2008
किसे पता ???
Tuesday, February 19, 2008
जो है अधिकार मेरा !
भीख सा
जो है अधिकार मेरा !
क्यों स्विकारू मैं
दया सा
आत्म सम्मान है मेरा !
क्यों समझते हो
स्वं को
सबका सर्वेसर्वा !
मैं जन्मा नही
जन्मी हूँ मैं
तो कोई
अपराध नही है
एक मानव हूँ मैं
और अधिकार है मेरा
पाना एक मानव का सम्मान !
