
बडा मजा आता था

ठहर सी गई है जिन्दगी;
अब कुछ ऐसा लगता है ...
आ कर एक दोराहे पर
कुछ सोच में पड़ गई है जिन्दगी
अब कुछ ऐसा लगता है ...
करने को तो है बहुत कुछ अभी
जाने जान हाथों से निकल गई हो
अब कुछ ऐसा लगता है ...
शयद सुबह करीब ही है
घना हुआ अँधेरा सा लगता है
मैं तो चाहता हूँ नींद से उठना
जाने क्यों शरीर थका सा लगता है ...
कुछ तो हो ऐसा अब
जो कर दे मुझे सागर सा चंचल
ये ठहराव अजीब सा लगता है अब ...
हर गये दिन जुमला एक
कानो में हमारे पड़ता हैं
छोड़ा हमको नही जायेगा
हर हिसाब हम से
एक दिन लिया ज़रूर जाएगा ,
कह कर कोई
गुस्से से अकड़ता हैं ...
आदत से हम भी मजबूर हैं
गुस्से पर मुस्काते हैं
जले हुए दिल को ,थोड़ा और जलाते हैं ...
येँ जनाब भी , जरा हट के हैं
सोचते हो हैं , जाने क्या कर देंगे
पकड़ कर कान चाँद का
जमीन पर ला रख देंगे
और पकड़ कर दुम शेर की
बना दरबान ,
खडा दरवाजे पर कर दंगे ...
धाक जम मगर कहीं न पाती हैं
बनती - बनती बाजी इनकी , बिगड़ ही जाती हैं
पासे जाने पलट कैसे जाते हैं
होकर इनका , इन्हे ही चिडाते हैं ...
खिसाय्नी बिल्ली सी इनकी हालत रहती हैं
और दुम सदा टांगो में छिपी रहती हैं ...
पडे जब भी उस पर पैर हमारा
"शांत रहो - शांत रहो "
गूंजता हैं कानो में येँ नारा ...
--- अमित
आला रे आला
SPICE-08 आला
सब टीमो ने अपना
परचम संभाला
आला रे आला
SPICE-08 आला
"सुखोई" जहाँ
ताकत में मदमस्त है ,
"पृथ्वी " भी वहां
सम्मान बनाये रखने की जुगत में व्यस्त है .
"अग्नि " और "भार्मोस"
दोनों तरफ़ से न कुछ आहट है
कमजोर न कोई इनको समझो
रणनीति के गुरुओं से भरपूर
दोनों टीमो की पुरी तैयारी है
देखना बस यह है
तरकश में तीर किस के कितने है
अब मैंदान में आने की बारी है ...
(SPICE : A sport event in Infosys for CCD Project...)
--- अमित
पनपते है हजारो सपने
हमारी आंखों में
और करते है हम सर्जन
उन रास्तों का
हो जिन से सच हमारे सपने
दी गई जब भी कोई चुनौती
हमने हाथो हाथ लिया
दृढ़ निश्चय कर हम आगे बढे
आसान माना ये डगर नही
साहस, भी यहाँ कम नही
रख अपने मूल्यों को ऊँचा
हर चुनौती पर विजय हमने पाई
देख ये बढ़ता हुआ आत्म विस्वास हमारा
जुड़ता जा रहा है हमसे दुनिया का हर किनारा
और आगे ही बढता जा रहा है कारवां हमारा
सबसे आगे जाने की है पूरी तैयारी
समय से तेज है रफ़्तार हमारी
हाँ , सब से अलग है पहचान हमारी ...
--- अमित २८ /०९ /०८
चाहे जहाँ चाहो
चले तुम जाओ
कौन परवाह करता है
क्या तुम्हे लगता है
बस तुम से ही हम है
न होगे तुम तो
कहीं न हम होंगे
तुम्हे क्या पता
बस, अपने दम से है हम
याद न एक दिन आयगी
मजे में बसर जिन्दगी हो जायेगी
क्यों ये विश्वास
आज हमे धोखा दिए जाता है
रह रह साथ गुजारा
हर पल याद आता है
की जो तुम से बे-रुखियाँ
जला उनसे आज मन जाता है
याद तुम न आओगे
ये महज एक धोखा था
न पाकर तुम्हे करीब
दिल अपना रोता है
ये न सोचता था कभी
इतने तुम याद आओगे ...
--- अमित १२/०७/०८
कहते है वो
हम से भी हो परदा
तो क्या हुआ
जो हम है एक - दूजे के
शर्म तो हमारा गहना है
आप कुछ कहे
हमें तो परदा-नशीं ही रहना है
ना रहे परदे में तो
हया से आँखे झुक जाती है
हाथों में लगी हिना की लाली
रुखसारों पे आ जाती है
सर्द सा जिस्म होने लगता है
जान सी जैसे, निकली जाती है
आप तो बडे बे-शर्म है
शर्म आप को कहाँ आती है
मिलती है आप से नज़रे
और जान हमारी जाती है
हलकी सी एक छुहन
सिरहन एक जिस्म में दौड़ जाती है
अभी रहो जरा दूर ही हम से
महोबत की ये खुमारी
हम से न सही जाती है ...
---अमित ३०/०६/०८
नारी कहे
क्यों बनू मैं सीता
तुम राम बनो या न बनो
मैं अग्नि परीक्षा में झोकी जाऊँगी
तुम तो फ़िर रहोगे महलो में
और मैं वनवास को जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं द्रोपदी
तुम धर्म-राज बनो या न बनो
मैं तो जुए में फ़िर हार दी जाऊँगी
तुम करोगे महाभारत सत्ता को
इसकी दोषी मैं रख दी जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं तारा
तुम हरिश्चंद बनो या न बनो
मैं तो नीच कहलादी जाऊँगी
मेरे बच्चे को मारोगे तुम
उसे जीवित कराने को मैं बुलाई जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं मीरा
तुम कान्हा बनो या न बनो
मेरी भक्ति तो फ़िर लज्जित की जायेगी
तुम को तो कुछ न होगा
और मैं विषपान को विवश की जाऊँगी
नारी कहे
क्यों बनू मैं अहिल्या
मैं तो फ़िर किसी इन्द्र के द्वारा छली जाऊँगी
और जीवन पत्थर बन राम की प्रतिक्षा में बिताओंगी
नारी कहे , कोई बताय
क्यों बनू मैं आदर्श नारी
क्या कोई आदर्श पुरूष मैं पाऊँगी ...
--- अमित १४/०५/०८
अप्रैल का महीना करीब आ रहा था
कैसे लोगो को बेवकूफ बनाये
यही ख्याल जहन मेबार-बार आ रहा था
रोज नई तरकीबे बन जाती थी
इस में ये कमी है , उसमे वो कमी हैं
ये सोच छोड़ दी जाती थी
एक नया विचार तव आया
ऑफिस वालो को अप्रैल फूल बनाने का
प्लान तव हमने बनाया
एक तारीख को ऑफिस जा हम ने
इस्तीफा अपना दे डाला
होंटों पर मुस्कान लिए
ऑफिस में हम घूमते जाते थे
मेनेजर साब का क्या ज़बाब आएगा
इस इंतज़ार में समय बिताते थे
थोडी देर में उनका कॉल आया
खुशी खुशी हमने भी फ़ोन उठाया
दहाड़ने की आवाज उधर से आती थी
साहब ने फरमाया ,
इस्तीफा हम मंजूर करते हैं
तुम हम से मिलने आओ
इसी बीच एकाउण्ट डिसेबल हम करते हैं
ये सुन हम सकते में आ गए
देख अपना एकाउण्ट डिसेबल और घबरा गए
मेनेजर साब के आगे " सॉरी सर "
यही दो शब्द जबान से बोले जाते थे
देख हमे परेशान हाल
मंद मंद वो मुस्काते थे
एक बार वो फ़िर से गरजे
क्या सोचते थे, अप्रैल फूल हमे बनाओगे
ये सब हथकंडे हमी पर अजमाओगे
मेनेजर हम यों ही नही हैं, सभी का ख्याल रखते हैं
"अप्रैल फूल" अब तुमबन चुके
और मजाक भी बहुत कर चुके
जाओ जा कर काम करो
एकाउण्ट तुम्हारा अनेबल हम कर चुके
जान मे तव जान हमारी आई
सोचा न था व्यस्त मेनेजर ध्यान इतना दे पायेंगे
"अप्रैल फूल" का मजाक यो पकड़ पायेगे
कान हम अब पकड़ते हैं ,
ऐसा "अप्रैल फूल" न अब किसी को बनाएगे
सीमाये अपने अब न भुलायेगे ,
मजाक हैं , मजाक तक हैं इस्तमाल में लायेंगे ...
--- अमित ०२/०४/०८
ठाठो में है लाखो ठाठ
शौको में है लाखो शौक
अदाओं में है लाखों अदा
देर से आने की अदा
सबसे जुदा है ये अदा
और हो भी क्यों न
नबाबी है इसका अंदाज़
और लगता जैसे
बढ़ गया अपना रुबाब
बोला दोस्तों को साथ चलेंगे
पहुंचे जब सब
देखा नवाब सोये पडे है
किया वादा की नाश्ता साथ करेंगे
और दिखाई रात को दिए
जब उन्होंने हमे कहा
बस १० मिनट रुको
हम रुके तो ज़रूर
और घड़ी के घूमते काटे गिने
करते कोशिश है बहुत
करे खिचाई औरो को
और हमेशा ही उलटी पड़ी
देख उनकी झेप
चढती सबको मस्ती बडी
प्यारे ये हम सभी के है
आदत से मगर सब घबराते है
चाहे सब करे कितनी भी मिन्नत
"नबाब साब" अपने समय से ही आते है ...
--- अमित २/०३/०८