Sunday, July 29, 2007

दो जिस्म एक जान ..

दो जिस्म एक जान है हम
यही तो कहा था तुमने
सच ही है क्या गलत कहा था तुमने
हम दो जिस्म एक जान ही है
तभी तो होता है
एक जिस्म का दर्द
जान से होकर दुसरे में जाता है
कहता मैं कुछ हूँ
जान कुछ समझती है
और दुसरे जिस्म तक जाते उसका रुप ही बदला जाता है
जान ही तो एक है हमारी
मस्तिष्क तो दोनो जिस्मो के हिस्से में अपना अपना आता है
और जब यह काम करता है तो
ऐसा क्यों लगता दोनो जिस्मो में से जान को जुदा कर जाता है ...
- अमित २९/०७/०७

जब प्यार किसी से होता है ...

क्यों होता है ऐसा

कोई अनजाना कभी कभी

लगता जान पहचाना
क्यों उठती हैं उमंगें

रह रह कर उस से मिलने की

क्यों रहता है दिल बेचैन

जा कर दूर उससे
आजाता है क्यों सुकून

करीब आकर उसके

क्यों लगती है राते लम्बी

और लगते है फिसलने दिन हाथों से

बातें चले औरो की

और ज़िक्र हो उसके

दिन भर रहा ना दूर उस से जाये

और रातों को भी नींद ना आये

हम जब भी सोये

तो आकर खावाबों में वो हमे जगाये

बैठे हो लिखने कुछ

और तस्वीर उसकी बन जाये

निकले हो हम अपने घर को

और पहुंच उसकी गली को जाये

नाम पूछा जाये हम से हमारा

और जुबां पर उसका नाम आये

जहाँ भी हम जाये, करीब ही उसको पाए

क्यों लगता है अपनी दुनिया

सिमटकर बस उसी पर ख़त्म हो जाये

हाँ , ऐसा ही सब कुछ होता है

जब प्यार किसी से होता है ...



--- अमित १४/०५/०५

Friday, July 27, 2007

मेरा रास्ता ...

ऐसा नही की मैं जानता नही

जो मैं लिखता हूँ , सब जानता हूँ मैं

क्या हुआ जो मेरे पास अच्छे शब्द नही

मेरी भावनाओ में कोई कमी नही

क्या हुआ जो मेरी सोच की जड़े गहरी नही

सोच मगर अपनी कहीँ ठहरी नही

निगाह है फलक पर मेरी और

पांव पड़ता है जमीन पर मेरा

बैर किसी से नही है मेरा
खुद का खुद से ही है वास्ता
दम अभी नही है किसी में
जो रोक सके मेरा रास्ता
चन्द घड़िया ज़रा बस रुका हूँ मैं
तय करना है मुझे अभी बहुत लम्बा रास्ता ...
--- अमित २८/०७/०७


Wednesday, July 25, 2007

दोस्त की मृत्यु ...

सुना बारे में उसके
मगर विश्ववास ना हुआ
देखा जब आंखों से
यकीन तव भी ना हुआ
भरा जब उसे बाहों में
तव भी लगा
नही , ऐसा कुछ ना हुआ
और ऐसा हो भी कैसे सकता था
वो, जो मेरी बाहों में था
मेरा दोस्त था और
कुछ देर पहले
सब कुछ ठीक था
और पल भर में
ये क्या हो गया
वो हम को छोड कर चला गया
लगा मैं कोई सपना देख रहा
काश ,
काश , ऐसा ही होता
यह एक सपना ही होता
तो वो जिस्म
जो मेरी बाहों में बेजान पडा था
मेरी बाँहों में हो , मेरे साथ होता
अफ़सोस , ऐसा कुछ ना हुआ
सच , बडा दुःख भरा था वो समय
जब यह सब हुआ
"विवेक " की मृत्यु सब को झकझोर दिया
बडा ही मुश्किल होता है वोह पल
जब छुट जाता है कोई अपना
और रह जाती है कुछ मुट्ठी भर यादें
हमे कभी कुछ याद कर ह्साने
और तन्हाई में जा कर
कुछ आंसुओं को बहाने ...

( अपने दोस्त विवेक की मृत्यु पर )
--- अमित १४/०५/०५

Tuesday, July 24, 2007

जानता हूँ मैं ...

क्या सोचती तो तुम
पता नही चलेगा, ग़र कहोगी नही तुम
जानता हूँ , चाहती हो मुझे
तेरी आंखों की शरारत
तेरे होंठों की मुस्कराहट
तेरे दिल की कसक
सब है पता मुझे
मगर चाहती हो तुम छुपाना
दिन कटता है हमारे साथ
और गुजर जाती है रात कर के हमेयाद
नींद तो तुम्हे अब आती नही
रहती हो ख्यालो में दिन रात
नही रह पाती हो दूर हम से
छुपा नही है अब यह राज़
दिल बेचैन , बेताब धड़कन और प्यासी नज़र
करती हैं अब बस हमारा इंतज़ार
तुम्हारा पहला प्यार हूँ मैं
और हूँ जिन्दगी से भी प्यारा
छौड दोगे ज़माना ,ग़र हो जाऊं तुम्हारा
जानता हूँ तेरे दिल की इक इक बात
जानती तुम नही
है अपना भी यही हाल
तुम को भी है यह एहसास
चाहती हो करु पहले मैं इकरार
हाँ, यह भी जानता हूँ मैं
चाहता हूँ अभी लेना तेरी तड़प का मज़ा
इस लिए अब तक चुप मैं रहा
अब मगर दूरी नही सही जाती है
तुम कहो या ना, जुबां मेरी कहना चाहती है
हाँ,
हाँ, हमे महौबत है ...
--- अमित २०/०५/०५

मेरी जिन्दगी ...

जानती नही तुम
लाकर मेरी जिन्दगी में तुम्हे
किया है अहसान उसने बडा
साँसे तो तव भी चल रही थी
जी रह हूँ अब मैं
खुश तो तव भी था
ख़ुशी को अब पहचान रह हूँ अब मैं
जब से आई हो जिन्दगी में
आये हैं नये मायने इस में
ख़्वाब तो देखे थे पहले भी
रंग उनको तुमने दिए
जिन्दगी तो गुजर ही रही थी
जीने के हुनर तुम ने दिए
ग़र कोई पूछ ले हम से
कहते किसे है हम "जिन्दगी"
सामने तुम को कर देंगे
और कह देंगे
यह ही है हमारी "जिन्दगी"
--- अमित २८/०५/०५

Friday, July 20, 2007

सच्चाई ...

बोलता हूँ मैं
सच सच बोलो तुम
मैं बस चाहता हूँ
सच सुनना
छोड़ दूगां मैं साथ तुम्हारा
ग़र लगा मुझे यह कोई अफसाना
डरी, सहमी सी वो बोली
हाँ,
कभी चाहा था मैने
उसको, हद्द से जयादा
यकीन जानो
हमेशा से जानती हूँ
मैं अपनी मरियादा
ना जाने फिर क्या हुआ
बस , इतना सुना
कहा उसने
नही रह सकते अब हम साथ
चली जाओ तुम मेरी जिन्दगी से आज
क्या
क्या, बस येही था सच्चाई का इनाम
या
बस इतना ही था साहस मिलने का उस से
सच्चाई है जिसका नाम।
--- अमित २०/०७/०७

Monday, July 16, 2007

यह जीवन ...

यह जीवन
बडा ही विचित्र
बडा ही रहस्मयी
और सदा ही भर्माता हमे
क्या छिपा है
भविष्य के गर्भ मे
यह कोई ना जान सका
उस पर भी देखो
यह मानव
अपने भविष्य की
क्या क्या सुनहरी
कल्पनाए कर रह
जनता यह इतना भी नही
होगा कल क्या
इस पर
यह समय
रोज देता हमे
नई चुनोती
और करता प्रयास
रोके हमारे बढते कदम
मगर यह तो है मानव धर्म
दिखलाए अपना परुसार्थ
स्वीकार करे इसकी चुनोती
और करे निरंतर प्रयास
अपनी विजय का
अगर ऐसा हुआ
यक़ीनन एक दिन आएगा
तुम्हारा आज
तुमसे पूछेगा
बता बन्दे
तू कल अपने लिए
कैसा जीवन चाहेगा ...
--- अमित २१/०४/०५

Friday, July 13, 2007

हिम्मत ...

राहे जिन्दगी में
ना जाने कितनी बार
लडखडाओगे तुम
ना जाने कितनी बार
गिरोगे तुम
कोई गम , कोई फिक्र
ना तुम को इस से आने पाए
जब भी लडखडाओ
और अधिक ताक़त अपने पैरों में लाओ
जब भी गिरो तुम
और लड़ने की लगन जगाओ तुम
तुम गिरे तो कोई गम नही , कोई हार नही
मन का विश्वास ना गिरने दो तुम
उम्मीदे ना अपनी कम होने दो तुम
जो विश्वास ना डग्मगायेगा
तो कोई मुश्किल
कोई परेशानी
क्यों ना तुम्हारे सामने आये
दूर तुम्हारे विश्वास से बस पल में हो जाये
ग़र मन में हो विश्वास मंज़िल पाने का
और हो उम्मीद जीत जाने की
तो बस देखना तुम
रास्ते खुद-ब-खुद बन जायेगे
और मंज़िल तुम्हे मिल जायेगी ...
--- अमित २८/०५/०५

Thursday, July 12, 2007

जा रही है तू ...

तुझे जाना है
मालूम था मुझे
तू जा रही है
मालूम है मुझे
मगर याद आ रही है मुझे
मुझसे कही तेरी हर बात
तेरे साथ गुजारा हर लम्हा
और तेरी बेपन्हा मोहबत
साथ ही तड़पा रही है
तुझ से होने वाली जुदाई
हाँ , स्वार्थी ही हूँ मैं
और हूँ भी क्यों ना
दिया हैं तुने मुझे कितना अनमोल एहसास
खोना जिस को आता नाही
ख्यालों मे भी मेरे पास
सोचते ही तुझसे दूरी का
निकल जाती है मेरी जान
लगती है वीरान यह दुनिया
और बेमानी सा यह जहान
कहॉ था मैं , एक अच्छा इन्सान
कहॉ था मैं , तेरे काबिल
की तुने बेपन्हा मोहबत
और बनाया मुझे इक इन्सान
अब जा रही है तू
लगता है मर रहा है वोह इन्सान
ना जा , रूक जा तू
तुझे तो पता है
तुझ में ही बसी है मेरी जान
ग़र हो गई तू दूर मुझसे
निकल जायेगी
मेरे जिस्म से मेरी जान ...
---- अमित २५/०६/०५

चले आओ यारो ...


आओ कभी ऐसे भी
बैठे हम साथ
नीचे ज़मीन
ऊपर हो खुला आकाश
खुशियों के दौर
और मस्त समां होगा
कुछ तुम अपनी सुनाओ
कुछ हम अपनी कहते हों
चलेगा जब दौर
बीती बातों का
ताजा हुआ
गुज़रे जमाने का एहसास होगा
चले आओ किसी शाम तो यारो
मुद्दत हुई है
जब गुजरा करती थी यारों के साथ अपनी शाम ...
--- अमित ०६/०७/ ०७

मीठे सपनो की आंखमीचोली...

भोंर बस होने को थी
आँखें मीठी नींद में डूबी थी
मेरे तन पर आलस्य पूरा छाया था
गई रात बड़ी सुहानी थी
सो मीठे सपनो का भी आना जाना था
अभी ना ये सब छोडा जाये
थोडी देर और इस खुमार मे जिया जाये
सुबह हो गई
अब तो हमे छोड़ो जी ,
तुम धीरे से बोली

और दिल करता रह

बस यों ही कानो में
रस घोलती रहे तुम्हारी शहद से मीठी बोली
और यों ही चलती रहे
हम से मीठे सपनो की आंखमीचोली...
--- अमित १२/०७/०७

तुम्हे क्या दे ...

सोचा किये तुम्हारे लिए
तारे तोड लाये
फिर ख्याल आया
ये आशिक कहॉ जायेंगे
जो तारे गिनते है
वोह अपनी रात कैसे बीतायेँगे
सोचा किये तुम्हारे लिए
चांद जमीन पर उतार लाये
ख्याल आया
ये शायर कहॉ जायेंगे
जो अपनी महबूबा देखते है चांद में
वोह अपनी ग़ज़ल कैसे बनायेगे
सोचा किये तुम्हारी राह में
फूलो को हम बिछायेंगे
ख्याल आया
ये भौरे कहॉ जायेंगे
जो लेते हैं कलियों का रस
वोह तो प्यासे ही मर जायेंगे
सोचते है तुम्हे और क्या दे
हमारे सूरज चांद सब तुम हो
तुम से दिन रात हमरी है
दिल तुम्हे दे चुके है
बस जिस्म हमारा है
और उस मे बसी जान तुम्हारी है.
--- अमित १२/०७/०७

Tuesday, July 3, 2007

प्यार किया है ...

जब साँसों का डोर उलझने लगेगी
जब नसों में दर्द जमने लगेगा
धुंधला चुकी होंगी जब आंखें
डूबा उम्मीद का तारा होगा
दूर तलक इस जहाँ में
कोई भी हमारा सहारा ना होगा
कभी तुम पुकार कर देखना
मौत से भी चंद लम्हे
मैं चुरा लाऊँगा
तुम्हे इतना प्यार किया है
इस तरह जहाँ से चला नही जाऊँगा .
--- अमित ०३/०७/०७

Monday, July 2, 2007

जब तुम बोलो ...

लगता जैसे दूर कहीँ
झरना गीरे पर्वतों से
लगता जैसे कल-कल बहे
करीब नदिया कहीँ से
लगता जैसे कूके कोयल
दूर कहीँ बन से
लगता छेड़े जैसे कोई बंसी की तान
ज़रा नजदीक से मेरे
लगता जैसे गूंजे घंटा
दूर कहीँ किसी मंदिर से
ये सब मुझको लगता
जब तुम बोलो हलके हलके.
--- अमित ०२/०७/०७

Sunday, July 1, 2007

यह मैसूर कि फिजा ...


कैसा सुहाना मौसम है
कैसी अल्हड हुई हवा है
झूम झूम तरु भी करते
अपनी खुशी का बखान
छाई है काली बदली
अनंत फैले इस आसमान में
ज़र्रा ज़र्रा धरती का
है हर ओर सुगंध अपनी फैलाये
रिमझिम होती बरखा
रहती है हर दम
मन को मेरे हर्षाए
सच है हो गई है
मोह्बत मुझे भी
इस हसीं फिजा से
सोचता है दिल
अब ना जाये हम
"मैसूर" की ज़मीं से कहीँ
क्योंकि जो फिजा यहाँ
वो नही ओर कहीँ ...


--- अमित ०२/०७/०७

Monday, June 25, 2007

नवेली ...

कल ही कि तो बात थी
आई थी लाल जोडे में सजकर
छन-छन करती उस घर में, वो
अभी बरस भर भी नही हुआ था
कि चली गई फिर उसी जोडे में कुछ कान्धो पर वो
सुना है, बीमार थी वो
जानते सब है क्या बीमारी थी वोह,
अभी छः महिने भी नही हुऐ
आयी नवेली कोई
सजकर लाल जोडे में फिर उस घर मे ...
--- अमित २५/०६/०७

Thursday, June 21, 2007

ये भौरें ...

कलियों की, बागीचे मे हमारे कमी नही
सच यह भी है
तुम सी हसींन कोई नही
बैठे है भौरें यहाँ हर कलि पर सभी
जमी है मगर सभी की नज़रे
तुम पर कहीँ ना कहीँ
हसरत तो ना जाने कितने है इनकी
तरसते है इस बात को भी
छुले एक बार , बस एक बार
वो भी तुम्हे कभी
भारी हो जाती हैं साँसे इनकी
गुज़र जाती है जब
तुम्हारी खुशबूँ भी करीब से कहीँ
थमी से रहती है जिन्दगी इनकी
जब तक ना पडे तुम पर नज़र इनकी
देखे जब तुमको
आ जाता है बेचैन दिल को इनके करार
दीवानगी ने इनकी किया है इनका नाम
और इन्होने ही दिया "एस-एस-टी" तुम को नाम...
(आपने "सी-सी-डी" के भाईयों के लिये एक प्रयास!)।
--- अमित २१/०६/07

Wednesday, June 20, 2007

ये प्यार है ...

जब गया करीब उसके
ज़रा दूर हो गई
जब की बात उससे
ज़रा खामोश हो गई
मैं हुआ खफ़ा तो
आज फिर उसने क्हा
मैं करती हूँ प्यार तुम्हे
समझते तुम क्यों नही
सही है हम ही ना समझ है
मगर फिर किसी ने क्यों कहा
ये प्यार है
पृदर्शन माँगता है यह...
--- अमित २०/०६/०७

Monday, June 18, 2007

एक भजन : स्वामीनारायण संस्था से ...

मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान
सृष्टी के इस तेरे बाग़ मे, पुष्पो की हम शान;
जीवनभर सौरभ फैलाकर गाये तव गुणगान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान
मात-पिता और गुरूजी को हम पूजे देव समान
विश्व बंधुता , मानव सेवा सब से हो मुस्कान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान
बोले मुह शुभ, देखे नैंयन शुभ और सुने शुभ कान
पैर हमारे ठहरे मंदिर , संत समागम स्थान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान
दिग दिगंत है तेरी महिमा , मुखरित हिन्दूस्तान

अक्षर
हम को ले ले गोद मे , हम तेरी संतान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान, दे दे ऐसा वरदान
मेरे अच्छे भगवान

स्त्रोत्र : http://swaminarayan.org/publications/audio/anandrang.htm

Saturday, June 16, 2007

आओ देखे ख्वाब ...

अक्सर
मैं खोया रहता हूँ

कुछ अनजाने ख्वाबो में
और बनाता रहता हूँ
अपनी जिन्दगी का फसाना
यही तो ख्वाब है
जो सिखाते है इन्सान को जीना
यही तो है जो बने
बुनियाद हमारी खुशियों की
हमे चाहिऐ देखे हम ख़्वाब
अपने सुनहरे भविष्य के
मगर यहाँ आकर हम को है संभालना
maanaa हक है देखे हम ख्वाब
बनाए उस में आशियाना
और बटोरे
जमाने की सारी खुशियाँ
मगर ध्यान रहे
ख्वाब ,ख्वाब ही ना रह जाये
एक ज़रूरी काम अभी बाक़ी है
अभी तो यह ख्वाब है
इसका हक़ीकत बनना अभी बाक़ी है
और करना है इस के लिये बडाकाम
उपर वाला है हमेश ही
हमारी खुशियाँ चाहने वाला
और हमे राह दिखाने वाला
उसने रात बनाई हम देखे ख्वाब
और फिर हमको दिया दिन
पूरा कर लो अपना हर ख्वाब ...

--- अमित ०५/05/०५



काश ...

काश :
काश: , तू जान पाती
मेरी इस बेकरारी का आलम
समझ पाती मेरे दिल का हाल
तो जान पाती , कैसे तडपाती है
मुझको तुझसे एक पल की भी दूरी
दीवानों सा हाल रहता है जब तक ना पडे
कानो में मीठी आवाज़ तेरी
मिलती है जब तेरी नज़रों से नज़रे मेरी
उठती है एक प्यार की लहर दिल मे मेरी
सच बड़ी चोर हो तुम
जानती नही हो तुम
क्या कये किया है तुमने चोरी
मेरा चैन गया
मेरा दिल गया
और तो और
नींदे तक चुरा ली तुमने मेरी
अब तो इन्तहा है हो गई
मेरी बेकरारी की ,मेरी दीवानगी की
है तुम से गुज़ारिश मेरी
आ मेरे करीब
रख दिल पर हाथ मेरे
और कर दे ख़त्म ये बेकरारी मेरी ...
--- अमित १८/०६/०५

गर्म चांदनी ...

आज जो हो रहा, ऐसा पहले तो ना हुआ
आज चांदनी रात है,
और ना जाने क्यों चांदनी जला रही मुझे,
ठण्डी हवा बह रही
और लू की मानिंद झुलसा रही मुझे ,
दिल पर मेरे बेचैनी है छाई
और इन आंखों को जैसे
नींद से दोस्ती बिल्कुल ना भायी,
ना जाने क्यों आज
चांदनी झुलसा रही मुझे,
शायद , ये तेरी यादें हैं
जो रह रह कर तडपा रही मुझे,
चांद में दिखता तेरा चेहरा
दूर से ही खिजा रहा मुझे,
तुझे क्या पता , क्या क्या इस दिल पर बीती है,
तेरी जुदाई में
घड़ियाँ भी सदियों में बीती है,
कहॉ है,
क्यों है तू दूर मुझसे ,
चली आ पास मेरे
काटे नही कटती तनहा
अब ज़िन्दगी मुझसे ...
--- अमित २६/०६/०५

Wednesday, June 13, 2007

आज ...

रोज़ मेरा आज आता मेरे सामने
और करता सवाल मुझसे ,
किया क्या आज ऐसा तूने
कह सके तू जिसे सार्थक
और जिस के लिये मिला तुझे मानव जन्म,
और मैं पड़ जाता सोच में
जुटाता दिन भर का ब्यौरा
और करता मुल्यांकन उनका ,
तब लगता
दिन यों ही व्यर्थ गया ,
किया नही आज कुछ ऐसा
जिसके लिये मिल यह जन्म ,
हमेशा लगता मुझे
और अच्छा कर सकता था मैं,
फिर क्यों ना कर सका ऐसा मैं
कदाचित यह मेरे आलस्य था
जिस में मैं जकडा था
और स्वतंत्र होने का प्रयास भी ना किया,
तब समय /आज देता साहस और कहता
सो गया है तेरे अन्दर का विश्वास
जगा इस विश्वास को और जुट जी जान से
फिर देखना वो ही होगा जो तू चाहेगा
तेरा मार्ग स्वम तेरे कदमो तले आजायेगा ...
--- अमित २८/०४/०५

नज़रिया ...

देखिए साहब
नज़रिया, है यह
साबका अपना-अपना होता है,
जो हमको पसंद आया
वो एक आंख ना उनको भाता है,
जिद्द होती है साथ चले
और बाहर निकले तो
हर दम रूठना मनाना होता है,
यह रूठना मनाना कुछ और नही
करीब आने का बहाना होता है,
वैसे भी
इस रूठने मनाने का मज़ा
कहीँ और कहॉ आना होता है,
कितना भी रूठे ; कितना भी झगडे
शाम का खाना साथ ही होना होता है,
जब देखे इस को ज़माना
तो वो भी बस कहता है
बस इसी का नाम "याराना" होता है ...
--- अमित १३/०६/०७

इतना टूटा हुआ हूँ ...

अभी टूट कर बिखरने वाला था
कि आया कोई जिन्दगी में और
दिया मुझे अपना सहारा
और थामा मुझे अपनी बाहों में,
मुझको भी लगा जैसे मिल गया कोई अपना
जो ना देगा मुझे बिखरने ,
मगर ना जाने क्यों
"किसी को" मेरी खुशियाँ बर्दाश्त नही
और फिर आगए
एक ख़ुशी के बदले हज़ार ग़म मुझको तडपाने,
अभी तो मैं संभला ही था और
मेरा सहारा ही मुझे छोड़ गया,
पूछता हूँ मैं उससे इक सवाल
क्यों करता है "वो" ऐसा मेरे साथ,
कब मैंने उस से कोई दुआ मांगी थी
या कोई शिकवा किया था,
फिर क्यों भेजा उसने ऐसा रहनुमा
जिस ने मरहम रख फिर ज़ख्मो को हरा किया,
मुझे बिखरना मंज़ूर है
एक बार ही सब गमो को गले लगाना मंज़ूर है ,
मगर मैं बर्दाश्त नही कर सकता
यों रोज़ रोज़
तिल तिल कर घुट घुट मरना,
अब मेरे यह हालात है
अब मैं इतना टूटा हुआ हूँ
कि कोई मुझे छुए भर
और मैं टूट कर बिखर जाऊं ...
--- अमित १६ /०५/०५

Sunday, June 10, 2007

कल्पना ...

सोचा है तुमने कभी
है सब से तेज़ रफ़्तार किसकी ,
कुछ और नही
बस मन की कल्पना है,
हैं सब से तेज़ रफ़्तार जिसकी,
कल्पनाए ही तो वो
जो बनाती हमे भार शून॒य
और करती सैर
अनंत आकाश की,
कभी कल्पना की उडान लेती
चांद की दिशा
और बनाती
खुशियों का वहाँ ये आशियाना
यह ही वो कल्पना है जो
तुम से दूर रहने पर भी
दूरियों को मिटती है
और तेरे करीब होने का
हर पल मुझको अहसास कराती है
ग़र यह कल्पना ना होती
तो शायरों की शायरी में यह बात ना होती
और जहान की खुबसुरती
ना यों ब-खूबी बयां होती
चाहता हूँ मैं तो बस
कल्पनाओं पर सवार रहना
यह ही तो है वोह
जो कराती है हर सपना पूरा...
--- अमित ०५/०४/०५

क्या हुआ मेरे साथ ...

बाद अर्से के फिर मैं बैठा
लेकर कलम हाथ में
चाहा कि लिखू आज कुछ मैं,
मगर ना जाने कलम क्यों चलती नही
मेरे शब्द बनते नही
और मन साथ देता नही,
ऐसा पहले तो कभी ना हुआ
मैं कलम लेकर बैठा और कुछ ना बना
अचानक आज ये क्या हुआ
क्यों मन ने कलम का दामन छौड दिया ,
वषों का साथ पल में कैसे छूट गया
टूटी दिल के उमंगें
और कलम हाथ से छूट गया,
मेरी शायरी मेरे काम ना आई
धरी रह गई कागज़, कलम, रोशनाई ,
ऐसा तो बस पहली बार हुआ
मेरी जिन्दगी में जब से तू आई
मेरी शक्सियत पर है बस तू छाई,
तेरी महोबत का है यह इनाम
दुनिया ने दिया है मजनू का नाम,
इतना होने पर भी हिम्मत ना हमने हारी है
आज हारे तो क्या हुआ , आखरी जीत हमारी है,
तुझसे वादा है मेरा जो निभाऊंगा
इक दिन तेरे रुप पर एक मुकमल ग़ज़ल बनाऊँगा ...


--- अमित २७/०३/०५

तेरा रुप ...

चाहा बहुत कभी लिंखू
तेरे रुप पर मैं
कि मगर जितनी भी कोशिशे
और उल्हज़्ता ही गया मैं,
कभी लगती मुझको दूर बड़ी
फिर लगता जैसे मेरे पास खडी
कभी लगता तुम हो ऐसी
फिर लगता तुम हो वैसी
कभी लगती परी सी
तो कभी अप्सरा सी,
और क्यों ना हो ऐसा
दुनिया में तेरे रुप का सानी कोई नही
और मेरा यह कहना
कोई बेमानी नही,
तेरा एक एक अंग
खुदा ने जैसे अपने हाथ से बनाया
जिसे देख, चौहदवीं का चांद भी शरमाया
तेरी एक भी मिसाल मुझसे ना बन पडी
और मैंने जाना , यह काम है मुश्किल बड़ी,
ज़ुल्फ़ों को तेरी क्या कहे, काले नाग भी इन से पीछे रहे
क्या तेरी भौंहो को कहे , कमान से भी आगे जो रहे
ये तेरे होंठ , ये दो गुलाबी कमल है
ये दो पंखुरियां, खुद मुकम्मल ग़ज़ल है,
दिल की खुबसुरती भी तुने पाई
मन में तेरे चंदन कि शीतलता
और बदन में हिरनी की चंचलता
सूरज की सी आभा तेरे चहरे में आई
नादान बालक की सी मुस्कान भी तुने पाई,
कोई मुझे बतलाए
करु क्या मैं जा कर मैखाना
उसकी दो आँखें खुद ही है पैमाना
जाम जो इन आंखों के पिए
ज़न्नत में वो जिए ,
तुझे तो पता है , किस कि मैंने आस लगाई
यह प्यार की जौंत सिर्फ तेरे लिये जगाई
मुझे तू ही बता, अब तेरे बिन कैसे जिए ...


--- अमित २९/०३/०५

Saturday, June 9, 2007

जब भी याद आया ...

जब भी याद आया,
बस वोही याद आया.
मिले थे जब तुम से हम,
वोही लम्हा, वोही मंज़र याद आया.
वो दो अजनबी आंखों का,
टकराना याद आया.
शर्मा कर उनका झुकना,
फिर देखने कि हसरत से;
वो उनका उठना याद आया.
सीने में बेताब धड़कता दिल
और दिल मे उभरते,
ज़ज्बातों का सैलाब याद आया.
दिल मे होती उस मीठी गुदगुदी,
का एहसास याद आया.
रह रह कर तेरे लबों पर,
धीमी से मुस्कान का आना याद आया.
जो कभी ना कही गई लफ़्ज़ों से,
आंखों से उन बातों का कहा जाना याद आया,
माँग ले खुदा से दुआ में बस तुम को,
मेरे दिल में तब हर येही ख़याल आया.
तुमे हो ना हो; हमे तो
पहली मुलाक़ात का हर लम्हा लम्हा रोज याद आया ...
--- अमित

गुस्ताखी...

खतावार हैं तुम्हरी
यह गुस्ताख निगाहें मेरी,
देखती हैं यह चोरी चोरी
हर एक अदा तेरी
तेरे रुप की करना चोरी
यह ही तो आदत है , इन निगाहो कि मेरी
मगर कसूर , इनका भी कुछ नही
सूरत ही इतनी प्यारी है तेरी
कहना तो चाहता हू में बहुत कुछ
पर सहारा ही नही देती
यह बेबस जुबान मेरी
गुस्ताखी बस इतनी ही है
इन निगाहो कि मेरी
कहना चहाती यह तुझसे
वोह सुब कुछ
जो कह ना सकी तुझसे
जुबान मेरी
अब पेशी तो तेरे दरबार में है मेरी
देखना है, होती है क्या मुझ पर
नज़रें करम तेरी
यकीन है मुझको
हो ना हो, तुझे भी कुबूल है
यह गुस्ताखी मेरी...

--- अमित २१/०४/०५

Wednesday, June 6, 2007

फिर आई उसकी याद ...

बाद अर्से के
फिर आई उसकी याद,
बता रही है आँखें मेरी
कहानी बीती रात की,
अभी तो हमने मिलन के
सपने संजोए भी ना थे ,
चिर निन्द्रा सी आंखों मे
आ बसी ये जालिम यादें,
चाहा तो दोनो ने ही दिल से था
इकरार भी दिलों का दिल से था,
किये थे सजदे खुदा के भी
माँगा भी दुआओं में दिल से था,
ना जाने क्यों खुदा को
हमारी मोह्बत ना रास आई,
और उसने जुदाई
हमारी तकदीर बनाई,
छिना तेरा दामन उसने मेरे हाथ से
और किये हमेशा को जुदा तेरे मेरे रास्ते ,
और दे दी तद्पाने को
वोह प्यार भरी यादें ,
सूख चुके थे अब तो सारे आंशु
और थक चुकी थी मेरी आँखें ,
दफ़न हो गए थे सारे अरमान
अधूरी रह गई सारी खवाहिशे
और रूठ गई थी मुझसे सारी खुशियाँ
तेरे जुदा होने से ,
फिर भी ना जाने क्यों
आज फिर आई तेरी याद,
मैं तो आज फिर दुआ को हाथ उठाता हूँ
खुदा से और कुछ नही
सिर्फ तेरी खुशियाँ माँगता हूँ ...


--- अमित २०/०३/०५

Tuesday, June 5, 2007

तुम सा हसीं ...

दुनिया में मुझसा खुशनसीब और नही
क्यों ना हो मुझे इस का गुमान,
दिलबर तो सबके हैं
तुमसा हसीं कोई नही
तुम से अदा , तुम सी शोखी
और किसी में कहीँ नही,
सच तो यह है दुनिया में
तेरा सानी कोई नही,
जनता हूँ
रंज करते है ये सारे हसीं
तुझ सी मासूमी जो इन में नही
हर दम जलता है इनका सीना
क्योंकि तुम हो
हुस्न का इक तराशा नगीना,
संकडौ दिल वाले फिरते हैं दिल को थामे
चाह हर इक कि ; अपनी भी किस्मत आज्माले,
हम से वोह खुशनसीब कहॉ
जिन पर यह इनाय्ते करम होती,
अपना हो जिन्दगी का खवाब पूरा हुआ
दुनिया का सब से हसीं
जिन्दगी का रहबर हमारी हुआ ...


--- अमित १६/०३/०५

यह दिल ...

लाख समझाया इसको
पागल फिर भी माने ना,
लाख मनाया इसको
यह दिल फिर भी माने ना,
तेरे लिये यह बेताब बड़ा
क्यों यह बेताबी तू पहचाने ना,
तुझको यह चाहे कितना
खुद भी यह जाने ना,
करता तुझ को इशारे
क्यों यह इशारे तू पहचाने ना,
कये छिपा हर इशारे में
इतना भी क्या तू जाने ना,
धड़कता है बस तेरे लिये
बात कोई यह जाने ना,
पाना यह बस तुम को चाहे
क्यों बात तू इस कि मने ना,
यह बेज़ुबान बेबस बड़ा
बेबसी इसकी क्यों तू माने ना,
धड़कन कहीँ इस की रूक जाये ना
इस से पहले तू इस को अपना लेना ...
--- अमित १२/०१/०५

बरसात ...




जब भी होती वर्षा
धुल जाता सब कुछ
और
आ जाती नई चमक
लगता सब कुछ सुंदर
लगता सब कुछ
अच्छा
क्यों ना हुआ फिर मेरा साथ

मेरे आशुँओं कि बरसात से

क्यों ना हुआ मन उसका हल्का

क्यों ना धुला बैर उसके मन का


--- अमित ०५/०६/०७







Sunday, June 3, 2007

सफाई ...

पहले सोचा
जाकर उसको बोल दूं,
फिर ख्याल आया
कहीँ वो समझे
मैंने सफाई दी,
सच ही तो था
मेरे जीवन कि किताब
उसने इतनी पास रखी
कि , उसकी लिखाई उसको दिखाई ना दीं ....


--- अमित ०३/०६/०७

जानँ हमारी ...

आज फिर हुए बे-आबरू
आज फिर हुए रुसवा
फिर टूटा दिल और
आँखें हुई नम,
कौन समझेगा दिल कि बातें
ज़ुबां जब उनको समझ ना आई ,
भरोसा क्या करे
किस का करे यकीन ,
वो जो थे दिल के मेहमान
वोह ही जब निकले रकीब,
निकले थे ऐसे उनके कुचे से हम
निकलता है जैसे जनाज़ा कोई,
जानँ है वो हमारी
और जान से भी जयादा
प्यारी है हमे "जानँ" हमारी ,
जाकर कह दे कोई
दे दी होती जान इस रुसवाई पर
डर था मगर
रह जायेगी अकेली
जालिम इस ज़माने में "जानँ" हमारी...
--- अमित १७/०१/०७

Thursday, May 31, 2007

वोह आँखें ...




प्यारी थी मगर ,
बहुत सहमी थी वोह आँखें ,
ज़ुबां सिली थी मगर
बहुत कुछ बोलती थी वोह आँखें,
साफ झलक पड़ता था
दर्द सीने का, उन आंखों में
बेबसी तो जैसे ,
ठहर गई थी उस चहरे
और आस के एक हलकी सी किरण
की तालाश में
पथरा चुकी थी वोह आँखें ,
अफ़सोस
दूर तलक दो हाथ भी ना थे
जो देते सहारा उसे ,
आख़िर हुआ वही जो होना था,
छीन गया था उससे
बचपन उसका ,
अब कुछ और नही था
वह नन्हा मासूम
दुनिया के हाथों का बस एक खेलौना था

--- अमित २१/०४/०५

मेरी ज़ुबां ...

हमेशा से ही मैं ज़रा
खामोश सा रहा,
अपने दिल कि बातों को
लोगो से कम ही कहा ,
जहाँ भी आया मोका
ज़ज्बात बयां करने का,
मैं हमेशा पीछे ही रहा,
मेरी जुबान से जायदा
मेरी कलम मेरा सहारा रही,
और मेरे ज़ज्बातों की
कागज़ - कलम से हमेशा अच्छी बनी ,
कागज़ के दिल ने दिया
उनको एक उंचा मुकाम ,
और दुनिया ने दिया
इन ज़ज्बातों को शायरी का नाम ,
शायरी कोई पेशा नही
यह तो बस एक ज़रया बनी,
जिस से मेरे ज़ज्बातों की
दुनिया में कुछ पहचान बनी ।

--- अमित ०६/०४/०५

क्या है यह ...

क्या है यह
हम दोनो के बीच,
प्यार तो हमे कभी था ही नही
और दोस्ती, शयद हमने कभी की ही नही,
और कोई "रिश्ता"
इस शब्द पर तो तुम्हे; यकीन ही नही
फिर भी कुछ तो है
जो तेरे दर्द से बेचैन
और तेरे गम से ग़मगीन करता मुझे,
तेरे हंसने से हंसाता
और तेरी ख़ुशी से हर्षित करता मुझे,
तेरी हार में हार
और तेरी जीत में जीत, समझाता मुझे,
जो तुझ से मिलने
तेरे साथ, को उकसाता मुझे
तुझको हर ख़ुशी देने को, ललचाता मुझे,
सदा तुझ को दिल के पास रखने
मगर तुझको पाने का ख्याल
कभी दिल मे ना लाने देता मुझे,
मुझको तो पता नही
हो सके तो तुम ही कुछ बतला दो मुझे
मगर सच कहू तो
"बेनाम" ही अच्चा लगता "यह" मुझे

--- अमित ०१/०१/०५

साझा मंज़िल ...



जाने क्यों करता हूँ
वो मैं,
जो पसन्द नही तुम्हे
ना जाने क्यों करती हो तुम
वो,
जो मुझे मंज़ूर नही
चाह एक है
मज़िल एक है हमारी
तो,
रास्ते जुदा क्यों,
क्यों टकरा जाती
एक दूजे से यों
इच्चाए हमारी,
क्यों नही होती
साझा
इच्चाए हमारी,
क्या नही हो सकता
एक ही रास्ता हमारा
जो जाता हो
साझा मंज़िल को हमारी

---- अमित ३१/०५/०५

चुप सी तुम ...

चुपके से आई
जिन्दगी में मेरी, तुम
और
हो छाई
हर पल मेरे ज़हन पर, तुम
रहती हो चुप सी तुम
कहती नही;
जुबान से कुछ
आंखों से ही
बस बोलती हो तुम
मैं भी तो निरा
दीवाना हू
सुनता हूँ तुम्हारे
लबों कि अनकही
--- अमित ३०/०५/०७

Wednesday, May 30, 2007

वो हसीं लम्हा...

बड़ा अच्छा लगता
जब चलती ठण्डी हवा
जब उठती काली घटा,
याद दिलाती मुझको
ना भूलने वाला एक हसीं लम्हा,
हवा के तेज झोंके से
दुपट्टे का तेरा उड़ना,
हड्बडा कर तेरा ;उसको पकड़ना,
जैसे दौड़ रह कोई हिरन
कस्तूरी कि भीनी महक पाकर,
एक अनछुआ सा एहसास हुआ
जब दुपट्टे ने तेरे; मेरे चहरे को छुआ ,
सहमे क़दमों से तेरा करीब आना
आकर करीब अपने में सिमटना,
शर्म से तेरा नज़रे झुकाना
और कापते लफ़्ज़ों से दुपट्टा मांगना,
तेरी इस सादगी पर मेरा बे-सुध हो जाना
हाँ; मझे याद है वोह हसीं लम्हा,
थम सी मेरी नब्ज़ गई
बदन ने भी एक सिर्हन भरी,
जब तेरे मखमली हाथ ने मेरा हाथ छुआ
तब तेरे ठंडे लम्स का मुझे एहसास हुआ,
देखा जब तुने मुझको पलटकर
थम सा गया था वो लम्हा,
जैसे मेरी आंखों मे सिमट कर
तब से ना जाने
कितनी बार मिले है हम,
जिए है कितने हसीं लम्हे
एक दूजे के संग,
मगर वो लम्हा कभी नही भूलता
मिले थे जब पहली बार हम।

--- अमित ०१/०४/05

इरादा-ए-यार ...

कयामत होने वाली है
इरादा-ए-यार अच्छा नही आज,
संभल-ए- मेरे दिल
इरादा-ए-यार अच्छा नही आज,
निकले है वो बे-नकाब
छिपा फिरता है महताब घाटों में आज
हुस्न-ए-यार का नही कोई सानी आज,
संभल-ए- मेरे दिल
इरादा-ए-यार अच्छा नही आज,
ठण्डी हवा भी महकना चाहती
इस लिये छूती वो जिस्म-ए-यार आज,
उसके बदन से उठती सिर्हन
करती दिल को बे-करार आज,
संभल-ए- मेरे दिल
इरादा-ए-यार अच्छा नही आज,
चांदनी भी मन्द पड़ती
गोरे बदन के आगे आज,
क़त्ल तो अपना मुक़र्रर है
कज़ा सामने खडी है अपने आज,
संभल-ए- मेरे दिल
इरादा-ए-यार अच्छा नही आज,
ग़र यही हसीं मंज़र है;मेरे क़त्ल का
तो कोई शिकवा नही,
खुदाया; तू क़त्ल करवा
हज़ारों हज़ार बार मुझको आज,
संभल-ए- मेरे दिल
इरादा-ए-यार अच्छा नही आज,
वो निकले है बे-नकाब आज
--- अमित १७/१२/04

Tuesday, May 29, 2007

मेरी कविताओं ...

मेरी कविताओं,
सोचता हूँ मैं
कभी कभी ,
ना जाने कितना निष्ठुर
लगता हूँ तुम को मैं,
सोचती हो तुम पागल है यह ,
जो बिगाड़ रहा
तुम्हारा सवरूप
ना जाने क्या सोचता
ना जाने क्या लिखता
और खुश होता,
जैसे कितना अच॒छा लिखा
मगर जानता नही
किया है खिलवाड़ तुम्हारे सोंदेर्य से,
जानती तुम भी नही
मैंने तो सदा अच॒छा ही प्रयास किया ,
जैसे कोई नादान बच्चा
कुछ नया बनाता
और अपनी अबोधता से
देता बिगाड़ रुप उसका ,
परंतु यही प्रयास एक दिन रंग लाता
और देता सोंदेर्य को नया आयाम
मैं भी वोही अबोध बालक हूँ,
मेरा भी तुम को वचन है ,
दूंगा एक दिन तुमको नया रुप,
नया सोंदेर्य
और नयी तरह से परिभाषित करुंगा तुम को,
तब तक तुमको धर्य रखना होगा
मुझको वचन दो,
जो भी हो
अंत तक तुम को मेरा
साथ निभाना होगा...
--- अमित १६/०३/०५

जाने क्या चाहता हूँ मैं ...

ए जिन्दगी ,
ना जाने क्या चाहता हूँ मैं
कभी तुझसे ज़फा
तो कभी वफ़ा चाहता हूँ मैं,
सपनो में तो बहुत जिया हैं
हक़ीकत में भी तुझे जीना चाहता हूँ मैं,
हर मोड पर हारा ही हूँ मैं
ना जाने क्यों तुझसे जीत जाना चाहता हूँ मैं,
कभी किसी से की नही मोह्बत
पर तेरे इश्क में डूब जाना चाहता हूँ मैं,
हर पल चली तू मुझसे आगे
तुझसे कदम मिलाकर चलना चाहता हूँ मैं,
गमो से तो बहुत खेला हूँ मैं
चन्द खुशियाँ भी पाना चाहता हूँ मैं,
दुश्मन तो ज़हान में किसी के कम नही
सब को अपना दोस्त बनाना चाहता हूँ मैं,
मरते है सभी गुमनामी कि मौत
ज़हान में रोशन करना अपना नाम चाहता हूँ मैं,
मिला है जनम कुछ करने को
जितना हो सके कर गुज़ारना चाहता हूँ मैं,
हज़ार ख्वाहिशे है दिल में
तुझे क्या क्या बतलाओं, क्या चाहता हूँ मैं,
बस तू साथ रह मेरे और देख
सितारों के आगे ज़हान बसाना चाहता हूँ मैं...

---- अमित १८/०७/05

समय ...

समय,
ना जाने कैसा है यह समय ,
दिखाता लाखों रंग , लाखों रुप
कभी हम को रुलाता तो कभी हंसाता, समय
कभी धुत्कारता, तो कभी दुलारता ,समय
एक पल में सब सिमेटता तो दूजे पल लाखों खुशियां बिखेरता, समय
इक राह बंद कर, संक्डों राह बनाता, समय
हर पर्यतन को सम्मान देता, समय
हाथ से फिसलता तो कभी बाहों में सिमटता, समय
मेरी भरसक कोशिशों के बाद
एक उन्सुल्घा रहस्य , समय
मगर कुछ भी समझो
मुझको तो बस इतना लगता
हर पल इक नया सबक सीखता, समय
हर पल खुशियाँ बाटाने, हर पल प्यार बढाने का संदेश देता, समय
गिरने के बाद उठने का साहस, हर हार के बाद जीत का
और हर रात के बाद , नए सुबह का संदेश देता, समय
--- अमित ०१/०१/05

वोह पेड...



वोह पेड,

खड़ा था
सड़क के कनारे

अकेला,

पास ना था कोई साथी,

पूरा बढ़ चूका था,

अपनी कोशिशों के बाद

और था तत्पर
देने को

अपनी छावं,

हमेशा से

आकर्षित किया उसने

ना जाने क्यों,

फिर भी कभी

पास ना गया उसके

और दूर से ही

देखा किया उसको

सोचा उसके बारे में,

फिरआज
क्यों लेगा ऐसा

जाओ वहाँ और बैठू

उसकी छावं में

और करु कुछ बात...

अमित --- २९/०५/२००७

Saturday, May 19, 2007

वोह ही हो तुम ...

वोह ही हो तुम
थी जिसकी धुंधली सी तस्वीर,
हमेशा से मेरे ख्यालों में.
जानता नही कोई
रह कितना बेचैन मैं,
जानता नही कोई
ढुंढा किया हर पल तुम को मैं,
जानता नही कोई
जागा किया रातों को मैं,
जानत नही कोई
तारे भी गिना किया मैं,
जानता नही कोई
जिया है कितनी मायूसी को मैने,
ना जाने किया है कैसे काबू अपने जज्बातों को,
जब पाया नही कहीँ तुम को मैने,
पर, देखा जब पहली बार तुम को मैने,
कहा धीमे से मुझसे
इस बेताब दिल ने मेरे
जा भर ले उसे बाहों में
वोह सामने खडी है मंज़िल तेरे ...

--- अमित १९ मार्च 07

Saturday, May 12, 2007

तेरा चेहरा ( मेरी पहली कविता)...


आज चांद रात है , पूरे चांद की रात
आसमान में सिर्फ, चांद नज़र आता है
छत पर बैठा चांद को निहार रहा
दूर से आती रात की रानी की महक, मदहोश कर जाती है
और यह हवा , यह पागल हवा, नश्तर सा चलती है
यह नश्तर है , तेरी याद का नश्तर
हवा कि रवानगी कुछ और ही बयान करती है
शायद आज तू बहुत खुश है
हवा में तेरी ख़ुशी साफ झलक पड़ती है
इस चांद को क्या कहूँ
यह आज कुछ खास नज़र आता है
और ऐसा क्यों ना हो
इसमे मुझे तेरा चेहरा नज़र आता है
ना जाने अब मैं क्या करु
हर आहट हर दस्तक
हर जगह तेरा चेहरा नज़र आता है
कितना बेबस हूँ ,
इक अश्क भी नही गिरा सकता ,उसे खो नही सकता
उस में भी तेरा चेहरा नज़र आता है
अब तो यह दुआ है , इस रात कि सुबह ना हो
ना जाने क्यों इस दुआ में असर नज़र आता है
तू ना जाने कब आयगी
मेरी सांस ना थम , येहि सोच कर दिल घबराता है
क्या करु मुझे हर सू तेरा चेहरा नज़र आता है...
---- अमित ०१/१०/०४

Monday, May 7, 2007

वोह इक दिन ...

जीना चाहता हूँ,
एक दिन,
हाँ, बस एक दिन,
मैं उसके साथ,
चाहता हूँ जिसे,
मैं सब से ज्यादा,
और जो चाहती है मुझे;
अपनी जिन्दगी से भी ज्यादा।
तब,
पहलू में एक दूजे के हम होंगे,
और वक़्त वही ठहरा होगा,
मेरे हाथं में,
उसका रोशन चहरा होगा,
एक दूजे के इतने करीब होगे,
कि दूरी का कोई निशां ना होगा,
हवा को भी; इजॉज॒त ना होगी.
वोह आये हमारे दरमियान ,
टकराती उसकी साँसों से मेरी सांसे होंगी,
वोह जिस दम मेरे आगोश में होगी,
लफ्जो का तब वहाँ काम ना होगा,
हर ज़ज्बात; बस आँखो से बयां होगा
जानता हूँ मैं,
होश मुझे; तब कुछ ना होगा,
शराबी सारा आलम,
किया उसकी नशीली आँखो ने होगा,
उसके बदन कि छुअन से; पिघला
हर ज़ज्बात मेरा होगा,
जिस दम चुमुंगा मैं उसकी पेशानी,
छुपा; आकर मेरे पहलू में मेरा महताब होगा,
पूरी दिलों के हो ; हर ख्वाहिश,
अरमान बस येही, दोनो दिलों में जवाँ होगा....
--- अमित २५/०४/०५

Saturday, May 5, 2007

अब दूरी ...

अब दूरी .....
सही जाये ना; दूर तुझसे रहा जाये ना .....
तेरी इक इक अदा मेरे दिल को भा गई,
दूर तालों में बंद था दिल मेरा,
जालिम उस पर भी नश्तर चला गई
ख़ून-ए-दिल जो अब बहा है,
उस से बस नाम तेरा लिखा है।
रहती है रूह प्यासी,
छायी है दिल पर उदासी,
आती जाती साँसे ,
बस तुझको ही हैं बुलाती,
आ भी जा अब; पास मेरे ,
दे दे करार; इस दिल को मेरे,
सच कहता हूँ मैं,
तुझसे अब एक पल कि दूरी; ना सही जाये मुझसे.....
--- अमित

उसकी गली ...

जादू सा कुछ होने लगता है,
गुजरते है जब भी; उसकी गली से हम
कदम कुछ रुके रुके से उठते है
साँसे कुछ भारी भारी चलती है
और दिल
यह तो पागल है ; रहता है बेचैन बड़ा,
गुजरते है जब भी; उसकी गली से हम
चहाते है ना गुजरे, उसकी गली से हम
कशिश कुछ उनमे ऐसी है
चल पड़ते है खुद; उसकी गली को हम
जादू सा है कुछ; उसकी बातों में
बिन डोर खीचे, हम जाते हैं
होश हवाश रहता नही
पता अपना भूल जाते हैं
गुजरते है जब भी; उसकी गली से हम
रहता है याद बस
उनके ही घर का रास्ता,
दीवानों सी हालत होती है
गुजरते है जब भी; उसकी गली से हम
बताते है; मुझको मेरे दोस्त
बेद्ब्दाते हैं नाम उसका,
सोते है आकर, जब भी उसकी गली से हम
ए दिल
वोह भी जालिम है बडे
लेते है मज़ा हमारा
गुजरते है जब भी; उसकी गली से हम
--- अमित ०५/०५/०५

Thursday, May 3, 2007

इन्तजार...

जोयं जोयं चांद बढ़ता गया
उम्मीद घठ्ती गई,
तू तो ना आई,
और मायूसी बढ़ती गई
वादा करना और ना आना,
यह तेरी नही;
हर हसीन कि अदा हैं।
आशिक़ का दिल तोड़ना,
तुम्हारी बस एक अदा हैं,
तुम हसीनो कि बातों में,
जफा, सिर्फ जफा हैं।
हम आशिको कि तो;
इस में भी रज़ा हैं,
तुम करो जफ़ा;
और हम करे वफा,
अज़ाब ही हैं इसका मज़ा।

कल फिर चांद निकलेगा,
कल फिर मैं आउंगा,
कल फिर तेरा इंतज़ार होगा,
कभी तो वफा रंग लायेगी,
मुझे यकीन है; एक दिन तू ज़रूर आएगी...
--- अमित १९ /१२/०४

Wednesday, May 2, 2007

चाहता हूँ मैं ...

इक गीत है तू मेरा
चाहता हूँ मैं तुझे
अपने होंठों पर सजाना...
एक साज़ हैं तू मेरा
चाहता हूँ मैं तुझे
अपनी ही धुन में बजाना...
इक विश्वास हैं तू मेरा
चाहता मैं तुझे
हर पल अपने दिल में बसाये रखना...
मेरी यादों में
हर पल बसर है तेरा
चाहता हूँ मैं भी
कभी तुझे याद आना...
आती है रोज तू
मेरे ख्यालों मे
चाहता हूँ मैं भी
नींदे तेरी चुराना...
इक नशा हैं तू मेरा
चाहता हूँ मैं
हर पल डूबा
तेरे खुमार में रहना...
अब तो आलम है
इश्क में तेरे पागल हूँ
चाहता हूँ तुझे
अपना बनाना...
--- अमित 30/०४/०५

सितमगर...

रूठे हुए है वोह; हमसे
ना जाने किस बात पर,
कहते हैं हमे जालिम
वोह बात बात पर,
यों ही ढ़हाते हैं सितम
वो बात बात पर,
उनका रूठना तो इक अदा ठहरी
जानते नही वोह ,
निकल जाती हैं; जान इस से हमारी,
जानता हूँ रूठना तो
हुस्न कि इक अदा,
आशिक को तद्पाने में
आता इनको बड़ा मज़ा हैं,
ढ़ूंनढ़तां है यह
इश्क को जलाने के बहाने,
हम भी मगर इश्क हैं
ऐसे पीछा ना छोड़े गे ,
तुम्हारे लिये दुनिया से क्या
खुदा से भी मुँह मोड लेंगे ,
तुम्हारे सितम , ये ना काम कुछ आएंगे
जिधर भी तुम जाओगे; बस हम नज़र आयेंगे...
--- अमित २०/०४/०५

Sunday, April 1, 2007

Woh, Ek Din

Jeena chahata hoon,
ek din,
haan, bus ek din,
main uske saath,
chahata hoon jisey,
main sab se jayada,
aur jo chahati hai mughey;
apni jindgi se bhi jayada.

tab,
pehloo mein ek duje ke hum hongey,
aur waqt wahi theraa hoga,
mere haathin mein,
uska roshan cheraa hoga,
ek duje ke itne kareeb hooney,
ke dooreyoon ka koi neshaan na hogaa,
hawa ko bhi; izzazat na hogi.
woh aaye humerey dermeeyan,
takraati uski saanson se meri saansey hongi,
woh jis dum mere aagosh mein hogi,
lufzoyn ka tab wahan kaam na hoga,
her zazbaat; bus aankhoyn se bayaan hoga

jaanta hoon main,
hosh mughey; tab kuch na hoga,
shraabi saara aalam,
keya uski nashilee aankhoyn ne hoga,
uske badan ke chuan se; pighlaa
har zazbaat mera hoga,
jis dum chumunga main uski peshaani,
chupaa; aaker mere pehloo mein mera mehtaab hoga,
poori dilon ke hoo; her khwahish,
armaan bus yehi, dono dilon mein jawaa hogaa....


--- 25 Apr'05

Mumkeen Nahi

Mumkeen hain ke main; tum ko bhool jaaon,
jindgi mein tera naam zuban per naa laaon,
kabhi saamne ho tu merey;
aur man kareeb se guzar jaaon.

magar kaise bhool jaaon,
teri zulfon ke saaye;
naa jaane kitne hasen khaawab,
jahan meri nazron ne paaye.

kaise bhool jaaon;
aankheyn teri gheel se gahri,
humaarey pyer ki naawo
umer bhar jis mein tairee.

kasie bhool jaaon,
teri woh muskaan,
aatey he hooton per jiske,
meet jaati thi saari thakaan,
aur aa jaata tha; dil ko mere karaar.

nahi ! ghoot kehtaa tha main,
mumkeen nahi tughko bhool paana,
mera, apni jindgi se
tera nishaan meetana.

such kehta hoon main,
aaj tu nahi; tera ehsaas toh mera hai,
tu batlaa kaise dikhlaaon; mere dil ka zakham abhi gehraa hain.


--- 02 Apr'05

Teri Aankheyn

tumhey ho na ho,
mughey toh ab bhi yaad hai
woh haseen manzar; mili thi jab pehli baar
tumse meri aankheyn.
huey ab baras; phir bhi legta,
jise meley ho hum kal perso,
mere dil mein kal ki yaad sa taaja,
woh haseen manzar; mili thi jab pehli baar,

tumse meri aankheyn.
badi haseen leg rehi thi
woh khoi khoi se ; teri aankheyn,
adhuri neend ki kumaar mein dobbi,
teri madhosh gulabhi aankheyn.
mughey toh ab bhi yaad hai
woh haseen manzar; mili thi jab pehli baar
tumse meri aankheyn.

dil pe woh bizli ka gernaa,
jab sharmaa ker jhuki thi; teri aankheyn,
aur ban ker kzaa; phir uthi thi aankheyn,
bina khanzer he dil per,
nashter chlaa gai thi, teer ke teri aankheyn.
mughey toh ab bhi yaad hai
woh haseen manzar; mili thi jab pehli baar
tumse meri aankheyn.

kehta hun such main,
bina kuch booley he; tere dl ka haal
byaan ker gai thi, teri aankheyn,
main toh khadaa tha saahil per,
tere payer ke saagar mein mughko;
dubaa gai; saagar se gahari teri aankheyn.
mughey toh ab bhi yaad hai
woh haseen manzar; mili thi jab pehli baar
tumse meri aankheyn.


--- 26 Mar'05