Saturday, April 26, 2008

भावनाए ...

दिखाई नही येँ देती हैं
समझा बस इनको जाता है
बाँधी नही येँ जाती हैं
बंधा इनसे बस जाता है
जुबाँ कुछ होती नही इनकी
इन्ही से इनको समझा जाता है
जात- पात, धर्म-मजहब
इनको कुछ पता नही
रिश्तों की कोई ज़ंजीर नही
सरहदों से कहाँ येँ थम पाती हैं
चीर सरहदों को
दूर दिलो तक जाती हैं
नही कुछ और येँ
भावनाए हैं,
जो हर दिल में पाई जाती हैं ...
--- अमित २६/०४/०८

Friday, April 25, 2008

सोच ...

अक्सर मैं कुछ लोगो की
बातो पर बस मुस्काता हूँ
देख कर उनकी सोच समझ
ख़ुद सोच में पड़ जाता हूँ
ये कर देंगे, वो कर देंगे
ये ग़लत है, ये नही होने देंगे
नारे वो सब लगाते है
काम नही कुछ और उन्हें
बस बातों की वो खाते है
और बातों में ही वो जीते है
आए जब मौका कुछ करने का
दूर नज़र न ये आते है
कहना तब इन का होता है
हमने तो बस सोचा था
सोच से कहाँ कुछ होता है
हम तो अकेले ही है
अकेले जन से क्या होता है
अब मूढ़ों को कौन बताए
सोच से ही सब होता है
एक अकेला सोच अपनी बदले
देख उसे दूजा फिर सोचे
देख बदलता फ़िर दूजे को
तीसरा को लगता वो भी सोचे
सोच में वो ताकत
जब बढ़ कर रूप अपना लेले
सिहासन ख़ुद हिलने लगता है
और स्मिर्धि का फूल
हर तरफ़ खिलने लगता है ....
( अपने गुरु जी को समर्पित )
--- अमित २५/०४/०७

Monday, April 7, 2008

काश करता कोई हमे भी प्यार...

हमारे दिल में बस
हसरते पनपती रहती है
वो कोई और ही है
खुदा की रहमत
जिन पर बरसती है
उनको देखना और
देख कर आहे भरना
जिन्दगी अपनी यों गुजरती है
कौन जाने किस के पहलु में
श्यामें उनकी गुजरती होंगी
हम तो बस सोचते भर है
काश ऐसा होता
हमारे लिए भी
राहे कोई तकता
काश ऐसा होता
रूठे हुए हम होते
और कोई हमारी मनुहार करता
नित कर नये नये श्रृंगार
हमे भी कोई रिझाता
और होते जब हम उदास
होता वो हर दम पास
करते उससे हम अपनी
भावनाओं का इजहार
और होते उसे भी
हमारी भावनाओं से इकरार
काश,
काश करता कोई हमे भी प्यार ...
--- अमित ०७/०४/०८

Wednesday, April 2, 2008

अप्रैल फूल...

अप्रैल का महीना करीब आ रहा था

कैसे लोगो को बेवकूफ बनाये

यही ख्याल जहन मेबार-बार आ रहा था

रोज नई तरकीबे बन जाती थी

इस में ये कमी है , उसमे वो कमी हैं

ये सोच छोड़ दी जाती थी

एक नया विचार तव आया

ऑफिस वालो को अप्रैल फूल बनाने का

प्लान तव हमने बनाया

एक तारीख को ऑफिस जा हम ने

इस्तीफा अपना दे डाला

होंटों पर मुस्कान लिए

ऑफिस में हम घूमते जाते थे

मेनेजर साब का क्या ज़बाब आएगा

इस इंतज़ार में समय बिताते थे

थोडी देर में उनका कॉल आया

खुशी खुशी हमने भी फ़ोन उठाया

दहाड़ने की आवाज उधर से आती थी

साहब ने फरमाया ,

इस्तीफा हम मंजूर करते हैं

तुम हम से मिलने आओ

इसी बीच एकाउण्ट डिसेबल हम करते हैं

ये सुन हम सकते में आ गए

देख अपना एकाउण्ट डिसेबल और घबरा गए

मेनेजर साब के आगे " सॉरी सर "

यही दो शब्द जबान से बोले जाते थे

देख हमे परेशान हाल

मंद मंद वो मुस्काते थे

एक बार वो फ़िर से गरजे

क्या सोचते थे, अप्रैल फूल हमे बनाओगे

ये सब हथकंडे हमी पर अजमाओगे

मेनेजर हम यों ही नही हैं, सभी का ख्याल रखते हैं

"अप्रैल फूल" अब तुमबन चुके

और मजाक भी बहुत कर चुके

जाओ जा कर काम करो

एकाउण्ट तुम्हारा अनेबल हम कर चुके

जान मे तव जान हमारी आई

सोचा न था व्यस्त मेनेजर ध्यान इतना दे पायेंगे

"अप्रैल फूल" का मजाक यो पकड़ पायेगे

कान हम अब पकड़ते हैं ,

ऐसा "अप्रैल फूल" न अब किसी को बनाएगे

सीमाये अपने अब न भुलायेगे ,

मजाक हैं , मजाक तक हैं इस्तमाल में लायेंगे ...

--- अमित ०२/०४/०८